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तमाशा चालू आहे

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बेशक यह ज्यादा लंबा नहीं खिंचा। खिंचा क्या? न ही  किसी ने इसे बहुत गंभीरता से लिया। लेकिन हमारे बीच के कट्टर से कट्टर छिद्रान्वेषियों ने भी इसके इतनी जल्दी निपट जाने की उम्मीद नहीं की होगी। जी हां, एनडीटीवी इमेजिन पर आयोजित स्वयंवर के जरिए ईलेश .... को अपना जीवनसाथी चुने राखी सावंत को अभी चंद महीने भी नहीं बीते थे कि नवगुंफित युगल ने इसका पटाक्षेप करने का फैसला ले लिया। आखिर बॉलीवुड की आइटम गर्ल और रियलिटी टीवी स्टार के बतौर राखी का कैरियर जो दांव पर लगा हुआ था। और कम से कम राखी अपनी शोहरत को तिलांजलि दे ईलेश के पीछे-पीछे टारंटो जकर औसत कनाडाई गृहणी के ढेर में बदलने को तैयार नहीं थी। इसलिए उदासी की ओट लेकर राखी ने कहा, ईलेश को दरअसल भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं। पता भी कैसे होगा, इतने दिनों से बाहर रह रहा है। इसलिए इतने थोड़े दिनों में ही दोनों के रिश्ते में ऐसी गांठ पड़ गईं जिन्हें सुलझना पाना असंभव था।

तो जनाब, सगाई शहीद हो गई और राखी आदर्श आशिक की खोज में एक बार फिर बाजर में उतर आई। स्वयंवर के अगले संस्करण के लिए पूरी शिद्दत और कायदे से कतार में खड़ी। लेकिन जरा ठहरिए। स्वयंवर का दूसरा संस्करण तो पहले ही बुक हो चुका है। राखी को थोड़ा और इंतजार करना होगा, जबकि राहुल महाजन बिग बॉस में नाम कमाने के बाद एनडीटीवी इमेजिन में अपना स्वयंवर रचाने पहुंच रहे हैं। जी हां, रियलिटी टीवी का नशेड़ी, पत्नी-प्रताड़क सितारा जल्द ही प्लाज्मा स्क्रीन पर आपके सामने मौजूद होगा.. दूसरी बार श्रीमती राहुल महाजन की तलाश में जबकि समूचा देश कौतुक के साथ उसे देखता नजर आएगा।और आप चाहें तो शर्त लगा सकते हैं कि हर आदमी उसे देख रहा होगा। मेरी तरह आप भी इस बात को अच्छी तरह जनते हैं कि इसी तरह के कार्यक्रम हम भारतीय दर्शकों की नसों में हरकत पैदा करते हैं। ‘ठीकपने’ से पगी हुई तमाम आवाजें कि किस तरह टीवी हमारी आधुनिक सभ्यता का नाश कर रहा है, धरी रह जाएंगी। बार-बार आजमाए और एक बार फिर मसाला मार के आजमाए जा रहे रियलिटी टीवी के इस फार्मुले के सामने आते ही अंतत: हमारी लार टपकने लगेगी। हम जनते हैं इस तरह के कार्यक्रमों से भारतीय संस्कृति का अंत हो जाने की हमारी शिकायतें भी बदस्तूर जरी रहेंगी। लेकिन जैसे ही टीवी में स्वयंवर की शहनाइयां बजती दिखेंगी हम इस कचरे को आंखें फाड़-फाड़कर घूरते नजर आएंगे।

अगर हम सचमुच न देखें तो यकीनन ऐसे कार्यक्रम टीआरपी के मैदान में औंधे गिरे नजर आएं। मगर हम लाख शिकायत करें, बड़बड़ाएं या इनका उच्चटन कर लें, अंतत: हमारी उंगलियां रिमोट के उस बटन पर जा पहुंचेंगी, जिसके दबते ही रोजना यह कबाड़ हमारी आखों के सामने झिलमिलाने लगेगा। यही वह कुंजी है जो बताती है कि किस तरह बेहद तकलीफदेह बिग बॉस या भयंकर रूप से शापित स्पिल्ट्सविला जसे टीवी शो चल निकलते हैं। क्योंकि ये हम और आप जसे सबसे साधारण दर्शकों को अपनी ओर खींचते हैं। और जहां तक आंखें फाड़-फाड़कर दिखवा ले जने की बात है तो यह रणनीति पूरी तरह कभी न पिटने वाली साबित हुई है।

जरा इस ओर गौर कीजिए। उन सब लोगों में कौन सी बात समान है, जो सच का सामना के खिलाफ लगातार बोलते रहे, संसद में सवाल खड़े करते रहे, अखबारों में नाराजगी भरे पत्र लिखते रहे और फेसबुक या ट्विटर जसे सोसल मीडिया में इसके खिलाफ जहर उगलते रहे। यही कि सभी ने इस शो को देखा और अधिकांश इसके कई एपीसोडों को देखकर इसके कॉनसेप्ट व हिस्सा लेने वालों से पूछे गए सवालों से पूरी तरह वाकिफ थे। क्या इससे सहज ही एक सवाल पैदा नहीं होता? अगर आपको इस शो से इतनी नफरत है तो भगवान के लिए यह बताइए कि आप रोज ब रोज इसे क्यों देखते हैं? क्या आपके पास इससे बेहतर कुछ करने के लिए नहीं है? क्या आपका रिमोट कंट्रोल कहीं खो गया है? क्या आप ऑफ बटन को भूल गए हैं? या फिर किसी ने आपको इसे देखने की सजा दे रखी है?

अगर आप मुझसे यह सवाल पूछें तो मैं कहूंगी, इनमें से एक भी बात सही नहीं। सच तो यही है कि हममें से अधिकतर रियलिटी टीवी देखना पसंद करते हैं। ठीक वसे ही जसे ज्यादातर लोग चटाखेदार खबरों वाले अखबारों के दीवाने हैं। ऐसे शोज और अखबारों के टिके रहने और बेशक फलने-फूलने की ठोस वजह है। क्यों कि हम सब इनके उपजए कचरे को न सिर्फ गड़पना पसंद करते हैं बल्कि पूरी श्रद्धा के साथ और ज्यादा की इच्छा के साथ उनके पास लौट आते हैं। हम अपनी सांस फूल जाने तक इनसे नफरत करने की कसमें खा सकते हैं लेकिन सच्चाई यही है कि इनके साथ रंगरेलियां मनाने के शौकीन हैं।

लेकिन इस किस्म का ढोंग तब स्वाभाविक प्रतीत होने लगता है जब जनता की पसंद और मास मीडिया की बात होती है। प्रिंसेस डायना की मौत को भला कौन भूल सकता है। सनसनी के भूखे फोटोग्राफरों ने राजकुमारी का दम निकलने तक उनका पीछा किया। शायद ही कोई होगा जिसने पापाराजी की इस हरकत को पानी पी-पी कर नहीं कोसा। यकीनन इन क्रूर, हमलावर और अकसर मालिकों को खुश करने के लिए खींची जाने वाली तस्वीरों को कोई घास नहीं डालता, अगर इस दुर्घटना के बाद उन्हें छापने वाली पत्र-पत्रिकाओं की लाखों प्रतियां हाथों-हाथ नहीं बिकतीं। कहने का मतलब है कि अगर लाखों लोग इन तस्वीरों के लिए लाइन लगाकर खड़े नहीं होते और न्यूजपेपर स्टैंड पर उन्हें धूल फांकने देते।

जानी-मानी हस्तियों की निजी और सनसनीखेज तस्वीरों पर टिकी सेलेब्रिटी पत्रकारिता के फलने-फूलने की यही एक वजह है। किसी भूतपूर्व हसीना के ढलकते पेट को मुंह फाड़कर ताकने का विचार हमें जंचता है। उसका वजन बढ़ने-घटने की खबरों पर हमारी नजर टिकती है। या उनके बनते-बिगड़ते प्रेम संबंधों पर हम चटखारा लेने से बाज नहीं आते। ऐसी बातें हमारे कलेजे को ठंडक पहुंचाती हैं और इन सबके भीतर हम खुद अपने लिए तसल्ली ढूंढ़ लेते हैं। यही बात कचरा टीवी पर भी लागू होती है। इसके भदेसपन पर हम रस्मी हो-हल्ला मचाते हैं। टीवी चैनलों के स्वयंवर आयोजनों पर उनका मजक उड़ाते हुए स्यापा करते हैं कि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। राष्ट्रीय टीवी पर लोगों से निहायत निजी और आक्रामक सवाल पूछे जने पर हम हतप्रभ होने का नाटक करते हैं। जताते हैं कि गलती से भी ऐसे कार्यक्रम पर नजर पड़ गई तो शायद हमारी जन ही निकल जएगी। ..फिर भी, आखिर हैं तो हम ही। बंद दरवाजों के भीतर पूरी तरह से सुरक्षित। सामने चिप्स का कटोरा और डाइट कोक हाथ में थामे आराम से सोफे पर पसरकर रियलिटी टीवी के ताज मसाले का पूरी तसल्ली के साथ मज लेते हुए। क्यों यही बात है न? अरे.अरे. शरमाइए नहीं!

हम लाख भुनभुनाएं, कुढ़ें या शिकायत करें; मगर दिल है कि रियलिटी टीवी देखे बिना मानता ही नहीं। दरअसल इस किस्म का ढोंग हमारी तहजीब का हिस्सा है।

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