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का कहत हो, सोलह साल की पढ़ाई दुइ मिनट में..

का कहत हो, सोलह साल की पढ़ाई दुइ मिनट में..

जब किताबें ईजाद हुईं, तब कहते हैं कि विद्वानों को भारी चिंता सताने लगी थी। उस जमाने के विचारकों को डर था कि ज्ञान सहेजने की महान वाचिक परंपरा किताबों से नष्ट हो जाएगी। अब किताबों का अंत समय निकट बताया ज रहा है। वह दिन दूर नहीं जब हर किस्म का ज्ञान दिमाग में सीधे डाउनलोड किया जा सकेगा। आने वाली पीढ़ियों को पढ़ाई-लिखाई में 15-20 साल ‘बरबाद’ नहीं करने पड़ेंगे। मुश्किल से मुश्किल कौशल पलक झपकते ही दिमाग में उतारा ज सकेगा और नैनो-मैटीरियल से बनी कृत्रिम तंत्रिकाएं दिमाग की रफ्तार व याददाश्त को लाखों गुना बढ़ा देंगी। यही नहीं, इंसान अपनी भावनाओं को कंप्यूटर के साथ बांटने लगेगा और मशीनें उसकी मनोवज्ञानिक उलझनों का हल पेश करेंगी। कल्पना कीजिए उस दिन की, जब कंप्यूटर कविताएं लिखा करेगा या किसी इंसान प्रेमिका की खूबसूरती पर फिदा होकर दीवानों की तरह बौराया नजर आएगा? अमूमन हॉलीवुड की विज्ञान फिल्मों में दिखाई जने वाली ये फंतासियां, हकीकत बनने के काफी करीब पहुंच चुकी हैं।आज के कंप्यूटर खास किस्म की मशीनी भाषा में लिखे निर्देशों के हिसाब से तयशुदा काम करते हैं। फिलहाल उनमें इंसानों जसी संवेदनशीलता नहीं है और न ही वे आंख-कान जसे कुदरती औजरों द्वारा ग्रहण किए जाने वाले संकेतों के आधार पर खुद निर्णय लेने में समर्थ हैं। हारमोनों की घट-बढ़ से इंसानी दिमाग में उठने वाले जजबाती तूफानों से भी उनका वास्ता नहीं पड़ता। लेकिन, क्या निकट भविष्य में ऐसा होने लगेगा? क्या आदमी और मशीन के बीच विभाजन-रेखा धुंधली पड़ जाएगी?

नकली दिमाग की खोज में
इंसानी दिमाग की तर्ज पर काम करने वाले ज्ञानसंवेदी कंप्यूटर (कॉग्नीटिव कंप्यूटिंग) के निर्माण का सपना लगभग 50 साल पुराना है। इतने वर्षो में वज्ञानिकों ने कृत्रिम बुद्धि, कुतर्क (फजी लॉजिक) और तंत्रिकीय जल (न्यूरल नेटवर्क) के विकास की मंजिलें पार की हैं, लेकिन कंप्यूटर को आंख-कान और दिल दे पाने में कामयाबी मिलना अभी बाकी है।

ज्ञान संवेदी कंप्यूटर बनाने की शुरुआत बुद्धिसंपन्न कंप्यूटर सिस्टम (इंटेलीजेंट कंप्यूटर) की अवधारणा से शुरू हुई। इन प्रारंभिक प्रयासों की अपनी सीमाएं थीं क्योंकि ये सिस्टम अपने अनुभवों से सीखना नहीं जानते थे। हालांकि शुरुआत में कंप्यूटर को कुछ बौद्धिक प्रक्रियाएं सिखाने में सफलता मिली लेकिन इनमें खुद फैसला ले पाने की सामर्थ्य नहीं थी। न ही ये आसन्न परिस्थितियों का विश्लेषण कर कोई हल पेश कर पाते थे। कृत्रिम बुद्धि विकसित करने का उत्साह शुरुआती असफलताओं के साथ ठंडा पड़ने लगा। एक बारगी ऐसा लगने लगा कि इंसानी दिमाग जसे कंप्यूटर का विचार खयाली पुलाव से ज्यादा कुछ नहीं है।

मगर जैसे-जसे इंसानी दिमाग की कार्यप्रणाली की परतें खुलने लगीं, कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस) की खोज में जुटे शोधकर्ताओं के हौसले बुलंद होते दिखाई दिए। 1990 के दशक में कृत्रिम बुद्धि को ज्ञान संवेदी कंप्यूटरी का नया नाम दिया गया। अब तक वज्ञानिक इंसानी दिमाग के मुकाबले बेहद तेज गति से काम करने वाले कंप्यूटर बना चुके थे। और अब तो उन्होंने इंसानी दिमाग की रिवर्स इंजीनियरिंग का रास्ता पकड़ लिया है।दरअसल आज ऐसे कंप्यूटरों को तैयार करने कोशिश की ज रही है, जो इंसानी दिमाग की तरह तंत्रिकीय जल की मदद से घटनाओं व अनुभवों की श्रंखला का विश्लेषण कर सही फैसला ले सकें। तंत्रिकीय जल कंप्यूटर की जनकारी में अनवरत बढ़ोतरी करेगा ताकि वह किसी तर्कसंगत विकल्प को चुनने के स्तर पर पहुंच सके और कोई मुश्किल या अड़चन आने पर सही फैसला ले सके। ज्ञान संवेदी कंप्यूटर के विकास से जुड़े वज्ञानिक दलील देते हैं कि इंसानी दिमाग भी, चूंकि एक तरह की मशीन ही है, इसलिए इसकी नकल तैयार करना असंभव नहीं है। तंत्रिकीय जल के विकास को कृत्रिम मस्तिष्क निर्माण की राह में एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। जैसे-जैसे वज्ञानिकों के बीच मस्तिष्क की बनावट और कार्यप्रणाली की समझ बढ़ रही है, कृत्रिम बुद्धि के विकास में जुटे इंजीनियरों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। स्मार्ट कंप्यूटर इस कड़ी का ताज उदाहरण है, जो ध्वनि निर्देशों को ग्रहण कर उनका अनुपालन करता है। आज अनेक अत्याधुनिक कारपोरेट फोन प्रणालियां स्मार्ट कंप्यूटरों का इस्तेमाल कर रही हैं। इसके अलावा ज्ञान संवेदी प्रणालियां नई पीढ़ी के वायुयानों व जलयानों के दिशासूचक उपकरणों का हिस्सा बन चुकी हैं, जो फिलहाल सामान्य परिस्थितियों में इन वाहनों को खुद ब खुद कंट्रोल करती हैं।

वज्ञानिकों को उम्मीद है कि 21वीं सदी के बीतते-बीतते कंप्यूटर के रूप में दिमाग की सौ फीसदी नकल बनाई ज चुकी होगी। यह तकनीकी उपलब्धि हमारी जीवन स्थिति में क्रांति ला देगी और हम मस्तिष्क को नियंत्रित करने वाली जविक प्रक्रियाओं को ठीक से समझने लगेंगे।

जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै .. और वो भी पलक झपकते
आदमी ऐसे कई मुश्किल काम पहले ही प्रयास में कर पाएगा जो उसने कभी सीखे ही नहीं थे कल्पना कीजिए दिमाग से जुड़ी एक हार्ड ड्राइव का, जिसके जरिए इंसानी ज्ञान व कौशल में इजफा करने वाली तमाम जनकारियां सीधे दिमाग में डाउन लोड की ज सकेंगी। यही नहीं, आदमी ऐसे कई मुश्किल काम पहले ही प्रयास में कर पाएगा जो उसने कभी सीखे ही नहीं थे। बिना लिखे-पढ़े वह मुश्किल से मुश्किल भाषा फर्राटे से लिख-पढ़ और बोल सकेगा।

आने वाले दशकों में हम यह भी देखेंगे कि मशीनें इंसानों के जसा बर्ताव कर रही हैं। या यूं भी कह सकते हैं कि मशीनों की ताकत को आत्मसात कर इंसान मशीनी रफ्तार से काम कर रहे हैं। आदमी और मशीन का यह कायांतरण उन्हें कहां ले जाएगा, फिलहाल इसे भविष्य पर ही छोड़ना होगा।

टेक्नोलॉजी के भविष्य वेत्ता की सुनिए

नया दिमाग यूं तो हमारी शख्सियत की हूबहू नकल होगा, लेकिन उससे लाखों लाख गुना ज्यादा तेजी से काम करेगा नैनोटेक भविष्यवेत्ता जॉन बर्च इंसानी दिमाग में ज्ञान संवेदी कंप्यूटरी के प्रवेश को दूर की कौड़ी नहीं मानते। वह कहते हैं, ‘सन् 2030 के आसपास गैर-जैविकीय नैनो मैटीरियल दिमागी कोशिकाओं की जगह लेने लगेंगे। इनकी मदद से दिमागी ताकत को कई गुना बढ़ाया जा सकेगा।’

बर्च कहते हैं, ‘नया दिमाग यूं तो हमारी समूची शख्सियत की हूबहू नकल होगा, लेकिन यह उससे लाखों लाख गुना ज्यादा तेजी से काम करेगा। यह हमारी याददाश्त को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा देगा। इसके अलावा भविष्य के दिमाग में विचारों की रफ्तार तेज की ज सकेगी। जैविक कोशिकाओं का प्रतिक्रिया व्यक्त करने का मौजूदा समय 0.1 सेकेंड से घटकर 0.00000005 सेकेंड (50 नैनो सेकेंड) यानी 2 करोड़ गुना कम हो जाएगा।’
बर्च यह भी बताते हैं कि किस तरह हम अपने दिमाग को हाइटेक दिमाग में बदल सकेंगे। उनके मुताबिक नैनो मैटीरियल की रोजना एक गोली के जरिए शरीर के भीतर नई तंत्रिकाओं का निर्माण करने वाले आवश्यक नैनोबोट्स भेजे जएंगे। ये कृत्रिम तंत्रिकाएं धीमे-धीमे पुरानी जविक तंत्रिकाओं की जगह लेती जएंगी। दिमाग को इन बदलावों का पता भी नहीं चलेगा लकिन छह महीन के भीतर नए दिमाग की ताकत का अहसास होने लगेगा।
साइबरनेटिक्स विशेषज्ञ क्रिस्टॉफ कॉक का अंदाज है कि ज्ञान संवेदी कंप्यूटरी मस्तिष्क और मशीन के रिश्ते को सजह बना देगी और अगले एक दशक के भीतर दिमाग के इशारे पर काम करने वाले कृत्रिम अंगों में इसका इस्तेमाल आम हो जएगा। उन्हें उम्मीद है कि दिमाग की ताकत में अभूतपूर्व इजफा करने वाली टेक्नोलॉजी का 2050 तक व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगेगा।

अब तक हासिल
जरा देखें, ज्ञान संवेदी कंप्यूटरी ने अब तक कौन-कौन से मुकाम तय किए हैं-
मस्तिष्क की नकल
स्विस सरकार और जानी-मानी कंप्यूटर कंपनी आईबीएम की एक संयुक्त परियोजना ‘ब्लू ब्रेन प्रोजेक्ट’ में 2008 तक दिमाग के एक छोटे से हिस्से की और अगले एक दशक के भीतर मस्तिष्क के अधिकांश हिस्सों की अनुकृति बनाने का लक्ष्य रखा गया।  इस परियोजना से जुड़े वज्ञानिकों को अब तक इकलौती तंत्रिका की कार्यप्रणाली को कंप्यूटर में उतारने में सफलता मिली है। उन्हें उम्मीद है कि इसकी मदद से क्षतिग्रस्त मस्तिष्क का उपचार संभव होगा और निकट भविष्य में इंसान की तरह सोचने वाले रोबोट नजर आने लगेंगे।

स्मार्ट कारें
इस वक्त कार निर्माता ऐसी प्रणालियों के विकास में जमकर निवेश कर रहे हैं, जो सोचने-समझने वाले चालक विहीन वाहनों को हकीकत में बदल देंगी। ऐसी कारों में आज के मुकाबले दुर्घटना ग्रस्त होने की संभावना बहुत कम हो जाएगी।

स्वचालित युद्ध
रक्षा उपकरणों के विकास में जुटे अग्रणी वज्ञानिकों का दावा है कि सन् 2015 तक दुनिया के अगड़े देश जंग के मैदान में इंसानी सैनिकों को भेजना बंद कर देंगे। स्वचालित ड्रोन विमान व रोबो सैनिक उनकी जगह दुर्गम मोर्चो पर जंग लड़ते दिखाई देंगे।

बुढ़ापे को अलविदा
सदर्न कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के वज्ञानिकों ने शरीर में प्रत्यारोपित की ज सकने वाली ऐसी इलेक्ट्रानिक प्रणालियां तैयार की हैं, जो भविष्य में बूढ़ी हो चुकी कुदरती तंत्रिकाओं की जगह लेंगी। वह दिन दूर नहीं जब बुढ़ापे से पैदा होने वाला दिमागी क्षरण किस्से-कहानियों का हिस्सा बन जाएगा।

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