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...नहीं तो किस्सों-कहानियों में रह जाएंगी कई प्रजातियां

...नहीं तो किस्सों-कहानियों में रह जाएंगी कई प्रजातियां

पशुओं के संरक्षण के बड़े-बड़े दावों के बावजूद उनके प्रति क्रूरता बरतने का सिलसिला जारी है, जिसकी वजह से कई दुर्लभ प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो कई प्रजातियां किस्से कहानियों में ही रह जाएंगी।

पशुओं के संरक्षण के कार्य में जुटे संगठन पेटा के अरुण नायर कहते हैं अपने स्वार्थ के लिए पशुओं को मारना या उन पर अत्याचार करना गलत है। बार-बार मांसाहार के दुष्प्रभावों के बारे में बताया जा चुका है फिर भी मांसाहार का सेवन जारी है। बड़े आयोजनों में मांसाहार लगभग अनिवार्य हो गया है। इसके लिए कई पशु मार दिए जाते हैं।

उन्होंने कड़ा कानून बनाने की वकालत करते हुए कहा बाघों का शिकार बेरोकटोक जारी है जबकि अब बाघों की संख्या बहुत ही कम रह गई है। शिकार का कारण इस पशु के अंगों की बाजार में भारी कीमत मिलना है। खाल, हडि्डयां, दांत आदि के लिए बाघ मारे जा रहे हैं। गैंडा, बारहसिंगा अपने सींग के लिए मारे जाते हैं। न जाने कब थमेगा यह सिलसिला।


नायर कहते हैं कि घरों में पाले जाने वाले पशुओं को कभी कभार पूरे जतन से रखा जाता है तो कभी बूढ़े होने पर उन्हें बेकार समक्ष कर बाहर कर दिया जाता है। राजधानी में बेघर कुत्तों को शरण देने के लिए फ्रेंडिकोज नाम का गैर सरकारी संगठन चला रहे गौतम बरात बताते हैं कि यह समस्या दिल्ली में अत्यधिक तेजी से बढ़ रही है। हर रोज कम से कम एक कुत्ते को छोड़ दिया जाता है। सालाना औसतन यह संख्या 300 तक पहुंच जाती है। कुत्तों के मालिक पोम्स, एप्सोज, लैब्राडोर्स, जर्मन शेफर्ड, डोबरमैन, डलमैटियंस, बाक्सर और सैंट बर्नार्ड जैसे कुत्तों को भी कहीं छोड़कर चलते बनते हैं।

नायर कहते हैं कि वनों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप और जंगलों के घटते दायरे के कारण पशु भटक कर रिहायशी इलाकों में आ जाते हैं और फिर मानव पशु का टकराव होता है। यह बेजुबान जानवर बेवजह मारे जाते हैं। सर्कस में जानवरों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। लेकिन फिल्मों में यह सिलसिला जारी है। कभी अनुमति ली जाती है कभी नहीं ली जाती।

हर साल चार अक्टूबर को विश्व पशु दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत इटली के फ्लोरेंस में 1931 में आयोजित पारिस्थितिकी विशेषज्ञों के एक सम्मेलन से हुई थी। धीरे-धीरे अन्य देशों में भी इसकी शुरुआत होने लगी। कछुओं के लिए स्वैच्छिक संरक्षण अभियान चला रहे संगठन थीरम के सदस्य कछुओं की संकटग्रस्त प्रजाति ओलिव रिडले के नवजात कछुओं को बचाकर उन्हें सुरक्षित समुद्र में छोड़ने का काम कर रहे हैं।

थीरम के सदस्य कोझीकोड के कोडाइक्कल और कोट्टापुज्ज के बीच के रेतीले तट पर निगरानी रखे हुए हैं, ताकि कछुओं के प्रजनन काल में नवजात कछुओं को समुद्र में सुरक्षित पहुंचाया जा सके।
 थीरम के संयोजक सुरेश बाबू ने ईमेल के माध्यम से बताया कि तटों पर रेत के लिए होने वाली खुदाई कछुओं के लिए खतरा है। उनकी यह भी शिकायत है कि स्थानीय लोग इन कछुओं के अंडों को बेच देते हैं और कछुए पकड़ कर उनका मांस खाने के इस्तेमाल में लाते हैं।

ओलिव रिडले कछुए सामूहिक तौर पर अंडे देने के लिए संकरे समुद्र तटों, नदी के मुहानों और खाड़ियों में आते हैं। इन कछुओं के अस्तित्व को तटों के अतिक्रमण, लगातार निर्माण कार्य और स्थानीय लोगों द्वारा भोज्य पदार्थों के रूप में अंडों का उपयोग करने से संकट पैदा होना शुरू हो गया।

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