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सेवा में लगी एक मूक फौज

मुंबई की जिस बहुमंजिली इमारत में मैं रहती हूं, वहां हर सुबह लोगों के सो कर उठने से पहले लोगों की एक मूक फौज अपने काम में जुट जाती है। एक युवा छात्र सुबह-सुबह अखबार बांटता है, हमारे घरों के बाहर रखा कूड़े का थैला उठा दिया जाता है और जमादार गैलरी में झाड़-पोछा कर जाता है। दूध वाला दीवार या दरवाजे पर टंगे थैले में दूध के पैकेट रख कर चला जाता है। और जब तक हम उठते हैं, ब्रेडवाला ताजा ब्रेड व अंडे दे जाता है। सब्जीवाला सब्जी और फलवाला आपकी पसंद के चुनिंदा फल दे जाता है।

स्त्रीवाला आकर प्रेस के कपड़े ले जाता है और प्रेस करे हुए कपड़े दे जाता है। किराने वाला फोन पर बताया गया सामान पहुंचा जाता है। घरेलू कामगार आकर घर में झाड़-पोछा करते हैं, कपड़े धोते हैं, खाना पकाते और बरतन धोते हैं। इनके अलावा बिल्डिंग के गेट पर रहने वाले सुरक्षा कर्मचारी भी हमारी मदद करते हैं। वे बिल्डिंग में प्रवेश करने वाले हर शख्स की जांच करते हैं, ताकि कोई अजनबी आकर समस्या न पैदा करे।

कौन हैं ये लोग? क्या हम उनके नाम जानते हैं? वे कहां से आते हैं? मुंबई में वे किस तरह गुजर-बसर करते हैं? वे कहां रहते हैं? क्या हम उनकी परवाह करते हैं?  मुंबई के मध्य और समृद्ध वर्ग के घरेलू काम-काज में मदद करने वाली महिलाओं की जिंदगी पर लक्ष्मी और मैं शीर्षक से निष्ठा जैन ने एक प्रभावशाली फिल्म बनाई है। उन्होंने अब इस महानगर की जिंदगी को ढर्रे पर बनाए रखने में मदद करने वाले कामगारों की फौज पर एक और फिल्म का निर्माण किया है। एट माई डोर स्टेप नामक यह फिल्म सुरक्षा कर्मचारियों, कपड़े प्रेस करने वाले लोगों, प्रतिदिन घरों में समाचार-पत्र डालने वाले लड़कों, कूड़ा बीनने वालों और बहुमंजिली इमारतों में रहने वालों के घरों में जरूरी सामान पहुंचाने वाले लोगों की जिंदगी से जुड़ी दास्तान है।

जैन की फिल्म बताती है कि रोजगार की तलाश और फिल्मी दुनिया की चमक से आकर्षित होकर मुंबई आने वाले लाखों लोग कैसी दयनीय स्थिति में रहते और जीते हैं। झारखंड के बोकारो शहर से मुंबई आकर सुरक्षा गार्ड का काम कर रहे, कवि दयानंद के माध्यम से उन्होंने ऐसे लोगों की सोच और जीने की शक्ति को दर्शाया है।

दयानंद के मुंबई आने की कहानी कठिन संघर्ष से शुरू होती है। उसने सामान्य टिकट पर एक्सप्रेस रेलगाड़ी में सफर किया, जिस कारण कलेक्टर ने जुर्माना ठोक दिया। जुर्माना न भरने पर दयानंद को पहली रात हवालात में काटनी पड़ी। इसके बाद उसे मुंबई में काम तो मिल गया, पर घर नहीं था। एक झुग्गी उसका आशियाना बनी। इस झोंपड़ी की टूटी-फूटी दिवारों पर पोस्टर और कविताएं चस्पा हैं। 

इस फिल्म के जरिए अनेक सवाल उठाए गए हैं। मसलन उस लड़के की जिंदगी दर्शायी गई है, जो प्रतिदिन घर-घर जाकर प्रेस के लिए कपड़े इकट्ठे करता है और फिर उन्हें वापस पहुंचाता है। फिल्म में इस लड़के के साथी को भी दिखाया गया है, जो भट्टी जैसे कमरे में पूरा दिन प्रेस करता है। यह काम करने वाले का कहना है कि यदि वह साल में आठ महीने से ज्यादा काम करेगा तो बीमार पड़ जाएगा। जिस छोटे से कमरे में पूरा दिन प्रेस का धंधा चलता है, शाम को उसी में दाल-भात पकाया जाता है। खाना खाकर काम करने वाले लोग इसी कमरे में सो जाते हैं। जो सौभाग्यशाली होता है, उसे प्रेस वाली मेज पर सोने का अवसर मिल जाता है। बाकी लोग नीचे सोते हैं।

दुकान से घर का सामान पहुंचाने वाले की जिंदगी भी उतनी ही कठिन है। वह बहुमंजिली इमारतों की अनगिनत सीढ़ियां चढ़कर मुस्कुराते हुए सौदा पहुंचाता है। सभी लोग उसे बिल का पूरा पैसा नहीं देते। पैसे के लिए अक्सर लोग उसे दोबारा आने के लिए कह देते हैं। यह जानकर आश्चर्य होता है कि सुरक्षित नौकरी और नियमित आय वाले लोग भी इस लड़के से उधार करते हैं, जो बहुत कम मुनाफे पर काम करता है। इस लड़के को बख्शीश देने की परवाह तो शायद ही किसी को होती है।

सुरक्षा गार्ड सोनू की भी कोई जुदा कहानी नहीं है। वह सारे दिन बिल्डिंग में आने-जाने वाली कारों के लिए दरवाजा खोलता और बंद करता है। उसे बिल्डिंग के ऊपर बनी टंकियों में पानी भरने के लिए पंप भी चलाना पड़ता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि टंकियां भर गईं, उसे छत पर जाकर ढक्कन हटा कर देखना पड़ता है कि टंकी कहां तक भरी। यदि टंकी भरने के बाद पानी बाहर बहने लगे तो उसे कड़ी फटकार पड़ती है। पानी भर जाने के बाद ढक्कन पर ताला लगाकर ही वह नीचे आता है। धूप हो या बारिश उसे रोज यह काम करना पड़ता है। मुंबई के भीषण मानसून में उसे बिना छतरी या बरसाती पहने यह डय़ूटी निभानी पड़ती है।

सभी बड़े नगरों में, जो निरंतर फैल रहे हैं, ऐसे लोगों की बड़ी फौज है। शहरों में हाउसिंग सोसाइटी या निजी कोठियों में रहने वाले लोगों के रोजमर्रा के काम करने के लिए ऐसे लाखों अज्ञात कामगार हैं, जिनकी सेवाओं को मान्यता भी नहीं मिलती।
 
निश्चय ही जब हम बदलती अर्थव्यवस्था का जिक्र करते हैं तो ऐसे लोग उसमें शुमार होते हैं। औद्योगिक से सेवा क्षेत्र की ओर सफर कर रही व्यवस्था में ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जो असंगठित हैं। संगठित क्षेत्र में श्रमिकों की कुल आबादी का नन्हा सा प्रतिशत शामिल है।

घरेलू कामकाज से जुड़े असंगठित श्रमिक झुग्गी-झोंपड़ियों में रहते हैं या बेघर हैं। उनका रोजगार भी सुनिश्चित नहीं होता। अनेक को तो न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। उनकी सुरक्षा सामाजिक रिश्तों पर टिकी है। रिश्तों के बल पर ही उन्हें काम और सिर छुपाने का ठिकाना मिलता है। मुंबई में आधी से ज्यादा आबादी स्लम बस्तियों में रहती है।

भारत में 85 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। इन लोगों के बिना मुंबई का जीवन थम जाएगा। इसके बावजूद ये लाखों श्रमिक असंगठित हैं। वे काम की बेहतर परिस्थितियों और अच्छे वेतन की मांग नहीं कर सकते। वे एक दिन के लिए भी काम से छुट्टी नहीं पा सकते। शायद हम इस कड़वे सत्य को बदलने की शक्ति नहीं रखते। दयानंद जैसे लोगों के लिए मुंबई शहर का भारी आकर्षण है, क्योंकि यहां उसे कई किस्म के काम करने का मौका मिलता है। हम जैसे लोगों को, जिनकी सेवा में यह मूक फौज दिन-रात लगी रहती है, उनके काम का सम्मान करना चाहिए। यह स्वीकार करना चाहिए कि उनके बिना हमारा शहरी जीवन चरमरा जाएगा। 

kalpu.sharma@gmail.com

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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