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शरद चांदनी बरसी..

साल के इन दिनों में अक्सर अज्ञेय जी की कविता को गुनगुनाता रहता हूं। ‘शरद चांदनी बरसी, अंजुरी भर कर पी लो।’ शारदीय नवरात्र आते हैं तो चांद की यात्रा देखने को मन मचल उठता है। दूज से ही उसका रोमांच शुरू हो जाता है। और पूर्णिमा पर तो उसके क्या कहने! ऐसा शायद ही साल में कभी होता हो। नवरात्र के साथ ही हल्की सी सर्दी का एहसास शुरू हो जाता है। पूर्णिमा आते-आते तो शरद और चांदनी का ऐसा मेल होता है कि मन आनंद भाव में डुबकी लगाने लगता है। लेकिन इस बार तो शरद कहीं ठिठका रह गया है। गरमी ने उसे कहीं उलझा दिया है। और चांदनी है कि महानगर पर पूरी तरह बरस ही नहीं पाती। शायद चांदनी तो बरसती है, लेकिन महानगर..!
 
हर साल तो ऐसा नहीं होता। और महानगर ही तो दुनिया नहीं है। अब भी शरद पूर्णिमा हमारी स्मृति भर का ही हिस्सा नहीं है। जहां से भी हम उसे महसूस करते हों, वह हमें भीतर तक भिगो जाती है। आमतौर पर इस पूर्णिमा को चांदनी बरसती है। अब हमारी जितनी अंजुरी है, उतना ही हम उसे पी पाते हैं। हर पूर्णिमा पर चांद भरा-पूरा होता है। लेकिन कहते हैं कि साल में इसी दिन चंद्रमा अपनी पूर्णता में होता है। वह सोलह कलाओं वाला होता है। इसीलिए अमृत की वर्षा करता है चांद। उसी चांदनी में सोलह कलाओं वाले पूर्ण अवतार कृष्ण महारास करते हैं। चांदनी की रात में कृष्ण रुक ही नहीं पाते। परम अपने जीव के साथ एकाकार होना चाहता है। अपनी लीला में हिस्सेदार बनाना चाहता है। फिर परम जब लीला करता है, तो चांदनी बरसेगी ही। अमृत बरसेगा ही।
  
इस पूर्णिमा को कोजागरी भी कहते हैं। इस रात को नारायण ही नहीं, नारायणी भी धरती पर उतरती हैं। कौन जगा है? इसी जगार पर वह खुश हो कर खुशहाली बरसाती हैं। क्या रूपक है? भई, जागो तो अमृत मिलेगा? अगर हम सोए हैं, तो दिन में भी अंधेरा है। और हम जाग गए हैं, तो रात में भी उजेरा है। शरद की चांदनी इसी उलटबांसी का इशारा करती है। तो जागना बहुत जरूरी है। उसके बिना हम ब्रह्मांड के महारास का हिस्सा नहीं हो सकते।

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  • Web Title:शरद चांदनी बरसी..