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हिंसा का वर्ग चरित्र

बिहार के खगड़िया जिले में सोलह व्यक्तियों की हत्या को नक्सली हिंसा भी बताया जा रहा है और जातिगत हिंसा भी। दरअसल भारत के जिन ग्रामीण इलाकों में नक्सलवाद का असर है, वहां इन दोनों के बीच सीमा-रेखाएं बेहद धुंधली हैं। भारतीय सामाजिक ढांचे में जिनकी स्थिति सबसे नीचे है, उन जातियों को नक्सलवाद ने संगठित प्रतिरोध और हिंसा के लिए आधार दिया है, लेकिन अक्सर जो जातियां उनके आतंक का शिकार होती हैं वे भी अक्सर उनसे बहुत ज्यादा बेहतर स्थिति में नहीं होतीं, बिहार की इस घटना में देखा भी जा सकता है।

जमीन और वर्चस्व की लड़ाई इस तरह के मामलों में विचारधारा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। भूमि सुधार, सामाजिक सुधार और लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार न होने से ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में लोग हथियार लेकर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। यह भारत के बहुत बड़े हिस्से का जटिल यथार्थ है, जहां जातिगत, वर्गगत और विचारधारागत समीकरण गड्डमड्ड हो रहे हैं। लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान आदतन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से त्यागपत्र मांग रहे हैं, लेकिन यह समस्या ऐसे आसान राजनैतिक लटकों से कहीं बड़ी है और तब भी मौजूद थी जब ये लोग सत्ता में थे। फिलहाल भारत सरकार नक्सलियों के खिलाफ जोरदार सशस्त्र मुहिम छेड़ने की तैयारी में है और यह जरूरी भी है, लेकिन इन जटिलताओं को भी नज़र में रखा जाना चाहिए।
  
यह भी सच है कि नक्सलवाद का कोई गहरा राजनैतिक व विचारधारात्मक रूप इस समाज में नहीं रचा बसा है। बल्कि पुराने और शुरुआती दिनों के नक्सलवादी नेता यह मानते हैं कि चूंकि इन संगठनों की जड़ें बहुत व्यापक नहीं हैं, इसलिए ये लगातार सनसनीखेज वारदातें करके अपनी मौजूदगी दर्ज करवाते रहते हैं। लेकिन अब यह दुष्चक्र बन गया है कि नक्सली हिंसा की वजह से विकास कार्य नहीं हो सकते और विकास न होने से नक्सलवाद मजबूत होता है। नक्सलवादियों का दुस्साहस इतना हो गया है कि वे वायुसेना के हेलिकॉप्टरों पर गोलीबारी कर रहे हैं और इसीलिए वायुसेना ने जवाबी गोलीबारी के लिए सरकार से इजाजत मांगी है। ये नक्सलवाद के दो पहलू हैं, एक बिहार में दो जातियों के बीच हिंसा का और दूसरा वह, पहले जहां वह भारतीय वायु सेना को चुनौती दे रहा है और बिहार के मुख्यमंत्री की हत्या की धमकी दे रहा है। इसीलिए नक्सलवाद के खिलाफ मुहिम काफी लंबी ओर रक्तरंजित होगी, ऐसा लगता है।

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