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मुनाफे में मेट्रो

हर रोज एक करोड़ रुपये से ज्यादा की आमदनी का रिकॉर्ड बनाकर दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने एक और मिथक को तोड़ दिया है। यह सोच कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था घाटे का सौदा ही हो सकती है, दिल्ली मेट्रो की कामयाबी के आगे दम तोड़ चुकी है। दिल्ली मेट्रो की पटरियों पर टूटने वाला यह पहला मिथक नहीं है। सात साल पहले जब मेट्रो परियोजना शुरू हुई थी तो डर यह था कि इतना बड़ा निवेश करके कहीं हम एक नया सफेद हाथी तो नहीं तैयार कर रहे हैं।

दिल्ली मेट्रो ने यह मिथक तो बहुत शुरू में ही तोड़ दिया था कि भारत में विश्वस्तरीय गुणवत्ता की शहरी परिवहन सुविधा नहीं दी जा सकती है। यह गुणवत्ता जब टिकाऊ दिखी और उसके चर्चे फैले तो यह मिथक भी टूटने लगा कि सार्वजनिक परिवहन चाहे जितना भी अच्छा क्यों न हो जाए, निजी वाहनों की सुविधा-असुविधा में सफर करने वाले इसके स्टेशन पर पैर रखना भी न पसंद करेंगे। आज हालत यह है कि मेट्रो स्टेशन की पार्किग सुबह 11 बजते-बजते फुल हो जाती हैं। निजी वाहन वालों को भी अब ट्रैफिक जाम में धुंआ सूंघने के मुकाबले मेट्रो की बाधारहित सवारी ही भाने लगी है। इन हालात में आमदनी और मुनाफे के रिकॉर्ड का बनना कोई हैरत की बात नहीं है। इसका श्रेय मेट्रो कॉर्पोरेशन और उसके कर्मचारियों की कुशलता को भी देना ही होगा।

लेकिन इससे कहीं ज्यादा यह हमारे उस शहरी मध्यवर्ग की कामयाबी है, जिसने एक अच्छी सुविधा के आते ही न सिर्फ उसे अपनाया, बल्कि उसे कामयाब भी बनाया। यह वही मध्यवर्ग है, जिसकी मेहनत ने अभी चंद रोज पहले ही मंदी और महामंदी जैसी आशंकाओं को बेमतलब बना दिया था। जो आर्थिक मंदी तूफान बनकर एक के बाद एक दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को अपनी चपेट में ले रही है थी, उसने भी हिंद महासागर तक आते-आते दम तोड़ दिया। पर विपरीत हालात में भी जीतने का जीवट रखने वाला यह मध्यवर्ग सिर्फ दिल्ली या महानगरों में ही नहीं है।

वह देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में फैला हुआ है और कहीं भी मेट्रो जैसी परियोजना को कामयाब बनाने का माद्दा रखता है। महानगरों के लोगों को छोड़कर बाकी सब को टूटी सड़कों और खटारा बसों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यह मेट्रो जैसी सुविधा को पूरे भारत में विस्तार देने का समय है, जरूरत तो खैर यह है ही।

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