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पंद्रह साल बाद भी अनसुलझा है रामपुर तिराहा कांड

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा कांड को 15 साल बीत गये लेकिन अभी तक यह मामला अदालत में लंबित है।

गौरतलब है कि दो अक्तूबर 1994 को मुजफ्फरनगर में उत्तराखंड के गठन की मांग को लेकर किये जा रहे आंदोलन के दौरान पुलिस ने फायरिंग की थी और महिलाओं के साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया था। यह मामला 15 साल बाद भी अदालत में लंबित है, जबकि न्याय की प्रतीक्षा में तीन आरोपियों सहित करीब एक दजर्न लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

सूत्रों के अनुसार, आठ मामले मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई अदालत में भेज दिए गए थे, जिसमें जिले के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट सहित पांच वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ विभिन्न आरोपों के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।

इस मामले के आरोपियों में शामिल दो पुलिसकर्मी व चिकित्सा अधिकारी प्रीतम सिंह की मृत्यु हो चुकी है। डॉक्टर पर आरोप था कि उसने कथित रूप से पांच पुलिस कर्मियों का आपरेशन कर उनके शरीर में छर्रे डाल दिए थे।

सूत्रों ने बताया कि सीबीआई जांच में इस बात का खुलासा हुआ कि पुलिस कर्मियों के शरीर से निकाले गये छर्रे बंदूक से नहीं निकले थे।

उन्होंने बताया कि इसके बाद सीबीआई ने उत्तराखंड आंदोलनकारियों के खिलाफ फर्जी मुठभेड़ दर्शाने वालों को आरोपी बनाया था और अभी भी चार थाना प्रभारियों सहित नौ पुलिसकर्मियों पर अदालत में मामला चल रहा है, जबकि दो मामलों में पांच वरिष्ठ अधिकारियों को तकनीकी कारण के चलते आरोपों से मुक्त कर दिया गया।

गौरतलब है कि दो अक्तूबर 1994 में मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा कांड में पुलिस फायरिंग के दौरान कई लोग मारे गये थे और 17 महिलाओं के साथ कथित रूप से दुराचार किया गया था।

12 जनवरी 1995 में दायर याचिका के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मामले की सीबीआई से जांच कराने के आदेश दिए थे और जांच के बाद सीबीआई ने आरोपपत्र दाखिल किया था।

इस वक्त नैनीताल में उत्तराखंड उच्च न्यायालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इससे जुडे कई मामले लंबित है। 1999 में उत्तराखंड राज्य का गठन भी हो गया लेकिन रामपुर तिराहा कांड के पीड़ितों के परिजन अभी भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

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