DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कब आयी कब गयी..

कब आयी कब गयी..

बीते कुछ सप्ताह या कहिये कि पिछले दो-तीन महीनों में कुछ ऐसी फिल्में रिलीज हुईं, जिनके नाम रिलीज से एक-दो दिन पहले ही सुनने को मिले। रिलीज के दिन पता चला कि वह फिल्म शहर के केवल एक ही थियेटर में लगी थी, वो भी मल्टीप्लेक्स में, जहां उसके केवल दो शो थे। बाकी जगह से खबर आयी कि उस फिल्म के कई जगह तो शो रद्द करने पड़े, क्योंकि दर्शक ही नहीं थे। मामला ऐसी फिल्मों की स्टार वल्यू या उनकी गुणवत्ता का नहीं है, क्योंकि इन फिल्मों में कई चर्चित सितारे भी थे। मुद्दा यह है कि आखिर ऐसी फिल्में कौन से दर्शक वर्ग के लिए बनाई जती हैं? अगर इन फिल्मों का कोई टारगेट ऑडियंस है तो मुट्ठीभर सिनेमाघरों में रिलीज होने के बावजूद इन फिल्मों को देखने कोई क्यों नहीं आता।  

इसी साल अप्रैल से लेकर जून तक करीब ढाई महीने निर्माताओं और सिनेमा मालिकों के बीच चली हड़ताल ने दर्शकों के सामने ऐसी फिल्मों की बौछार सी कर दी। एक बार लगा कि रुटीन ठीक हो जने पर इन फिल्मों का आना रुक जएगा, लेकिन सिलसिला जरी रहा। ‘करमा-क्राइम पैशन रि-इनकारनेशन’, ‘फ्रोजन’, ‘आई कान्ट थिंक स्ट्रेट’ ‘सनम तेरी कसम’, ‘संकट सिटी’, ‘देख रे देख’, ‘चल चलें’,  ‘फास्ट फॉरवर्ड’, ‘स्कूल डेज’, ‘कॉफी हाउस’ और ‘वाईएमआई : ये मेरा इंडिया’ सरीखी फिल्मों के नाम क्या आपने सुने हैं? आज हम ऐसी ही फिल्मों के बारे में बात कर रहे हैं, जिनके नाम शायद ही किसी ने सुने हों। ऐसी फिल्में कब आती हैं और कब चली जती हैं, पता ही नहीं चलता। हो सकता है कि इनमें से किसी एक-दो फिल्मों का नाम आपने सुना हो। अगर सुना भी है तो जरा इन फिल्मों के किसी   सितारे का नाम तो जेहन में लाकर देखिये। क्या आपको इनमें से किसी फिल्म का गीत याद है? बेशक नहीं याद होगा। थोड़ा और दिमाग पर जोर डाल कर देखिये कि क्या आपको याद है कि आपने इनमें से किसी फिल्म का प्रोमो टीवी पर देखा हो या शहर में पोस्टर आदि पर आपकी नजर गयी हो। हां, आपको ‘शैडो’ फिल्म जरूर याद होगी, क्योंकि इस फिल्म के मुख्य नायक नासिर खान के गीतों और एक्शन के प्रोमो टीवी पर जोरदार तरीके से दिखाए गये थे। छोटे शहरों में इस फिल्म ने अच्छा खासा बिजनेस भी कर लिया था। तो क्या यह समझ जए कि ऐसी फिल्मों को जबरदस्त प्रोमोज और प्रचार के माध्यम से थोड़ा बहुत कमाने लायक बनाया ज सकता है। जवाब है, नहीं, क्योंकि अगर ऐसा होता तो उपरोक्त जिन फिल्मों का जिक्र हम कर चुके हैं, उनकी कमाई की हालत शर्मनाक नहीं होती और ‘सनम तेरी कमस’ में तो सैफ अली खान और पूज भट्ट थे। स्टार कास्ट सुन कर आपकी समझ में आ गया होगा कि यह दशकों से लटकी कोई फिल्म होगी, क्योंकि सैफ के साथ पूज भट्ट की जोड़ी आज के युग की तो नहीं लगती। और उधर, ‘न्यूयॉर्क’ के साथ रिलीज हुई फिल्म ‘संकट सिटी’ में तो केके मेनन, चंकी पांडे और रिमी सेन जसे सितारे थे। इस फिल्म को तो फिल्म समीक्षकों ने भी सराहा था। पर क्या हुआ? फिल्म कब आयी और गयी, पता ही नहीं चला। फिलहाल इसके किसी चैनल पर भी आने की संभावना नहीं है, क्योंकि चैनल्स पर ऐसी फिल्मों की मार्केट वल्यू न के बराबर है। खैर, छोड़िये थोड़ा आगे बढ़ते हैं।

क्या आपने ‘बैचलर पार्टी’ नामक किसी फिल्म का नाम सुना है? इसमें जिमी शेरगिल और अरबाज खान ने मुख्य भूमिकाएं की हैं। रिलीज हुए यही कोई दो-तीन हफ्ते ही हुए होंगे। चलिये जने दीजिए। ‘कॉफी हाउस’ में तो टीवी की टॉप आदाकार साक्षी तंवर और आशुतोष राणा थे। देश की मौजूदा हालत और राजनीति के ताने-बाने में बुनी यह फिल्म शायद ही किसी को याद हो। पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘आमरस’ भी इनमें से एक है। मल्टीप्लेक्स दर्शक वर्ग के टेस्ट की इस फिल्म के कई जगह शो रद्द करने पड़े। ‘फ्रोजन’ जसी फिल्म में डैनी थे। इसके बारे में तो डैनी के प्रशंसकों को भी शायद खबर न हो। हां, उन्हें डैनी की अंतिम फिल्म ‘लक’ ही याद होगी, जिसमें उनके और इमरान खान के बीच मशहूर संवादों की झड़ी सी लग जती है। मशहूर सितारों की गुमनाम फिल्मों की लिस्ट में रणदीप हुड्डा भी हैं। हाल ही में रिलीज उनकी फिल्म ‘लव खिचड़ी’ और साल के शुरू में रिलीज हुई ‘मेरे ख्वाबों में जो आए’ ऐसी ही फिल्में हैं, जिसका औसत प्रति प्रिंट कलेक्शन साढ़े पांच लाख रुपये को भी पार न कर पाया। लेकिन ‘बारह आना’ में तो नसीरुद्दीन शाह थे। इसका भी कहीं अता-पता नहीं है। श्रषि कपूर की ‘चिंटू जी’ भी इसी श्रेषी में आती है। रंगमंच के दिग्गज रंजीत कपूर की यह पहली निर्देशित फिल्म थी, यह फिल्म कब आयी और कब गयी, किसे याद होगा। दिग्गजों का मानना है कि ऐसी फिल्मों से बड़ी फिल्मों को कई नुकसान नहीं होता, बल्कि ऐसी फिल्म सूने सप्ताह में थियेटर भरने के लिए होती हैं। या फिर उन सिंगल स्क्रीन थियेटरों के लिए होती हैं, जिन पर बड़ी फिल्में नहीं लगतीं। हाल ही में रिलीज ‘टॉस’, ‘चल चलें’, ‘फास्ट फॉरवर्ड’, ‘थ्री’ सहित दजर्नों फिल्में गुमनामी की शिकार फिल्मों की श्रेषी में ही रखी ज सकती हैं। देखा जए तो यह साल ऐसी दजर्नों फिल्मों के लिए याद किया जएगा, जिनके नाम लोग शायद कभी याद भी न रख पाएं। पर ऐसी फिल्मों का आना जारी है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:कब आयी कब गयी..