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जिंदगी की ठोकरों से सीखते थे बापू

जिंदगी की ठोकरों से सीखते थे बापू

'आज से दशकों बाद शायद ही किसी को यह विश्वास हो कि हाड़-मांस का यह व्यक्ति कभी इस दुनिया में आया था', यह बापू के बारे में महान वैज्ञानिक एल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था। आज जब हम बापू का 140वां  जन्मदिवस मना रहे हैं तो उनके द्वारा कही गई ये लाइनें याद आती हैं।

बापू ने जिस सादगी से अपने जीवन को जीते हुए भारत की आजादी का वह कठिन व्रत पूरा किया वह किसी महान व्यक्तित्व द्वारा ही संभव था। 1942 में जब भारत का जनमानस मिलने वाली आजादी की खुशबू को पहले से ही महसूस कर रहा था, उस वक्त गांधीजी ने अपने पुत्र को जेल से पत्र में लिखा था, " बेटे, जब मैं जेल से बाहर आउंगा तब तक तुम खेत में काम आने वाले औजार साफ करके रखना, हम दोनों बाप-बेटे खेती करते हुए ही अपनी आने वाली जिंदगी को जिएंगे। मैंने अब तक जितनी भी दुनिया देखी है, उसको देखकर मैं यही मानता हूं कि सबसे सच्चा और सादगी पूर्ण जीवन एक किसान का ही जीवन  है।"

उनमें जो एक खास बात यह थी कि वह अपनी जिंदगी की ठोकरों से बहुत कुछ सीखते थे और उसे अपनी जिंदगी में उतारते भी थे। चाहे वह बचपन में की गई चोरी के बाद खुद को पूरी तरह से बदल देना हो, चाहे मांसाहार को छोड़ने का प्रण लेना हो। उनकी जिद के आगे हर कठिन परिस्थितियां हार गईं।

मांसाहार व मद्य निषेध तो कई बार अपनी सीमा को भी लांघ जाता था। बैरिस्टर की पढ़ाई के दौरान ब्रिटेन के ठंड भरे मौसम में जब जीवन रक्षा के लिए ही उनके मित्रगण उनसे मांसाहार या मद्यपान के लिए कहते थे तो वे हमेशा इसका विरोध करते थे। कई बार तो उन्हे अपने दोस्तों से सार्वजनिक विरोध भी सहना पड़ा। शाकाहार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी अधिक थी कि वह शाकाहारी खाने के लिए 10 किमी प्रतिदिन पैदल चलकर जाते थे। वो वहां शाकाहार के समर्थन में चल रहे आंदोलन में भी शरीक हुए।

दक्षिण अफ्रीका में भी जब उनको रेलगाड़ी से फेंक दिया गया तो इसके खिलाफ भी वो चुप नहीं बैठे, बल्कि इसके खिलाफ उन्होंने आंदोलन चलाया और इस अमानवीयता के खिलाफ अंततः सफलता पाई। इसके बारे में अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके बारे में हर किसी को पता है।

एक अन्य चीज जो उन्होंने जिंदगी में मिली ठोकर से सीखी वह यह थी कि उन्होंने यह तय किया था कि वह कभी भी किसी की पैरवी नहीं करेंगे। बात उस वक्त की है जब वह ब्रिटेन वापस आए थे और राजकोट में वकालत की कोशिश में थे। उस समय उनके बड़े भाई पर कोई केस चल रहा था। राजकोट का जो मजिस्ट्रेट था वह कभी गांधी जी के साथ ही ब्रिटेन में पढ़ाई करता था। गांधी जी के भाई ने उन्हें गांधीजी को मजिस्ट्रेट से मिलकर पैरवी करने को कहा। गांधीजी के बार-बार मना करने के बाद भी जब वह नहीं माने तो गांधीजी अनमने ढंग से ही मजिस्ट्रेट के पास गए। वहां जाते ही उन्हें एहसास हो गया कि यहां वह किसी दोस्त से मिलने नहीं आए हैं, बल्कि एक अफसर से मिलने आए हैं। पहले तो उन्हें बहुत देर तक इंतजार करना पड़ा  और जब अफसर को गांधीजी के आने का कारण पता चला तो उन्हें उस अफसर से बहुत भला-बुरा सुनना पड़ा। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि उन्हें उस दिन बहुत ही बेइज्जती महसूस हुई। उसी दिन उन्होंने यह तय कर लिया कि वह किसी की पैरवी नहीं करेंगे। कानूनी लड़ाई कानूनी तरीके से लड़ी जानी चाहिए।

इस वाकये को उस घटना से जोड़ा जा सकता है, जिसके लिए गांधीजी को सबसे अधिक विरोध का सामना करना पड़ता है। गांधीजी की आलोचना की जाती है कि उन्होंने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की, यहां तक कि इरविन से बात भी नहीं की। उन्होंने बात की या नहीं यह तो एक ऐतिहासिक रहस्य है। लेकिन अगर उन्होंने भगत सिंह को बचाने के लिए सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा तो इसके पीछे शायद उनकी वही जिद थी कि कानूनी लड़ाई कानूनी तरीके से लड़ी जानी चाहिए। कानून के प्रति उनकी निष्ठा को तो इस रूप में भी देखा जा सकता है कि वह कानून का विरोध भी गैरकानूनी तरीके से नहीं करते थे।

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