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क्या कहते हैं वे जिन्होंने जिंदा रखा गांधी को

आज ही क्यों याद आता है गांधी?
गांधीवादी विचारक लक्ष्मीचंद जैन ने देश की आजादी के आंदोलन से जुड़े केंद्रीय अभियान को बहुत करीब से देखा है। वे गांधी के आदर्शो से प्रभावित हुए। उन्होंने देश में सहकारिता अभियान चलाने के साथ ही हस्तशिल्प व कॉटेज इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने के लिए खूब काम किया। आइए देखें कि वे बापू की प्रासंगिकता को किस रूप में देखते हैं?

आज हम गांधी को याद कर रहे हैं। मुझे समझ नहीं आता कि आज हम क्यों तंग कर रहे हैं उस बुड्ढे को? राज घाट पर हमने उसे दफनाया ही नहीं, ऊपर से मार्बल भी करा दिया था। क्या आज वाकई देश को गांधी की जरूरत है? इस पर मेरा कहना है कि हां, आज हमें गांधी की कहीं ज्यादा जरूरत है। गांधी कैसे बना गांधी, इसे भी समझने की जरूरत है। दक्षिण अफ्रीका से जब गांधी लौटे ‘यंग इंडिया पीपल’ के एडिटर बने तो देश भर के दुखदर्द उनके सामने आए। तब उन्हें लगा कि जब तक हम आजाद नहीं होंगे, तब तक हम कुछ कर नहीं पाएंगे। उन्होंने बहुत सोच समझकर रचनात्मक कार्यक्रम सामने रखे इनमें चरखा कातने और खादी को अपनाने जैसे रास्ते सुझाये। आजादी के बाद तो वो छह महीने से ज्यादा भी नहीं जिए। लेकिन बेरोजगारी, अशिक्षा और गरीबी का खत्म करने को वे प्राथमिकता दिए जाने के पक्षधर थे। इसके लिए ही दूसरी क्रांति की बात सामने आई।

हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हमने ऐसी कोई करामात की है कि आज गांधी को फोन करके बुलाएं और अपने किए से उन्हें कोई तसल्ली दिला सकें। गांधी का सम्मान बचाने के लिए हमने किया क्या है। आर्टिकल 45 पास कर दिया। लेकिन कब? जो काम आजादी के 10 साल के भीत हो जाना चाहिए था उस हक को देने में हमने 60 साल लगा दिए। प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने का काम तो संविधान के दिशा निर्देशक सिद्धांतों में शामिल था, फिर इतना विलंब क्यों हुआ? क्या हमारे वित्त मंत्री संविधान के मुताबिक काम कर रहे हैं। जो सिस्टम बेरोजगारी को दूर नहीं कर सकता वह क्या मॉडल पेश कर रहा है? जब तक बेरोजगारी खत्म नहीं होती मशीनरी को चलाना बेमानी है। ये जो काम कर रहे हैं अपनी खुशी के लिए न कि लोगों की भलाई के लिए।

आज नरेगा की खूब बात होती है। नरेगा के बारे में एक बात कहूंगा। पहले सरकार बेरोजगारी पैदा करने वाली नीतियां लाएं और फिर नरेगा जैसी स्कीमें लाएं, इसकी क्या तुक है? अरे नरेगा को कामयाब ही करना था तो तमाम पार्टियों से कहते कि सब मिलकर ठीक से इसकी निगरानी करो। यह सबका काम है। तो क्या हम इनकी तरफ देखते रहें जो कहते हैं कि हमारे बाद हमारा बेटा या बेटी देश चलाएंगे। ये वंशवाद कहां तक जायज है? मेरे जैसे कुछ लोग गांधीवादी माने जाते हैं लेकिन मुझे लगता है कि गांधी की बात करने वालों गांधी के साथ ही मर जाना चाहिए था।

आज जो लोग सही मायने में गांधी के आदर्शो को लोकजीवन में आगे बढ़ा रहे हैं उनमें अन्ना हजारे हैं। जो मेडिएथ हैं, जिन्होंने उड़ीसा में अथक काम किया है। लोगों को तैयार किया है। ऐसे ही लोगों में इला भट्ट हैं जिन्होंने गांधी पीस फाउंडेशन के जरिए महत्वपूर्ण काम किया है। इनके अलावा सुंदर लाल बहुगुणा का भी नाम ले सकते हैं। मेधापाटकर हैं, प्रकाशआमटे, बंकर एंड अरुणा राय जैसे कई और लोग भी हैं, जो अच्छा काम कर रहे हैं। 

गांधीवादी सच्चाई की ओर सबको लौटना ही होगा
चुनी भाई वैद्य (गांधीवादी विचारक)

महात्मा गांधी के आदर्श पत्थर की लकीर जैसे हैं। कोई कुछ भी कह ले, उन्हें गालियां देने में अपनी शान समझे या देश की बरबादी के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने की नाजायज हिमाकत दिखाए, पर सच यह कि आज पहले से भी कहीं ज्यादा दुनिया को बापू के सिद्धांतों पर अमल करना जरूरी लगने लगा है। यदि सही मायने में दुनिया में अमन-चैन की जरूरत है तो गांधीवादी सच्चई की ओर सबको लौटना ही होगा। यदि आतंकवाद के खतरों का सामना करना है तो शांति और अहिंसा की बुनियाद मजबूत करनी ही होगी।

सच्चे मानव धर्म और बेहतर समाज की जरूरत है तो बालपन से ही अहिंसा और सत्य का बीजारोपण करना होगा। मेरा मानना है कि आज यदि आतंकवाद और सांप्रदायिकता जैसी समस्याएं सिर उठा रही हैं तो उसके मूल में कमजोरी यही कि गांधीवादी शक्तियां कमजोर पड़ गई हैं।

खेद की बात है कि आज गांधी जी का नाम लेने वाले और उनकी पूजा करने वाले तो बहुत नजर आने लगे हैं परंतु बापू की नीतियों का वास्तविक अनुसरण करने वाले घटते चले जा रहे हैं। गांधी के काम को आगे बढ़ाने के लिए खादी और चरखा ही काफी नहीं है, बल्कि इस मूल भावना से जुड़ना होगा कि आज भी हर समस्या का समाधान गांधीवादी सिद्धांतों को अपना कर किया जा सकता है।  मेरा मानना है कि आतंकवाद और भ्रष्टाचार के इस दौर में गांधी जी बताए सत्य और अहिंसा के रास्ते को समझने और अपनाने की सबसे ज्यादा जरूरत है।

आतंकवाद पर हम अहिंसा का सबक सीखकर और भ्रष्टाचार पर सत्य को अपना कर निश्चित विजय हासिल कर सकते हैं। आज अगर किसी बात की प्रासंगिकता है तो वह है जीवन में सत्य की स्थापना और अहिंसक प्रवृत्ति का प्रसार करना। इनसे सुखद और विकसित भविष्य का उम्मीद की जा सकती है। बापू के बताए रास्तों पर चलना बेहद कठिन चुनौती भरा लग सकता है, पर जो इस मार्ग पर चलते हैं उन्हें कोई भय नहीं सताता और वे हर तरह के तनाव और बीमारियों से भी मुक्त रहते हैं।

सादा जीवन उच्च विचार रखने से झूठे लालच आपको जीवन में गिरने, झुकने और कमजोर पड़ने नहीं देते। यह भौतिक सुख साधनों से ज्यादा संतोष प्रदान करने वाली जीवन पद्धति है। अपनाकर तो देखिए।

सारी दुनिया को अहिंसा का रास्ता अपनाना होगा
नारायण देसाई गांधी जी के निजी सचिव रहे महादेव देसाई के 85 वर्षीय पुत्र हैं। वे करीब 23 वर्षो तक बापू के सान्निध्य में रहे। अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में उनका लालन-पालन हुआ। न सिर्फ वे साबरमती के तट पर बापू के संग खेले बल्कि वे उनसे आश्रम में पढ़े भी।

महात्मा गांधी के आदर्श पत्थर की लकीर जैसे हैं। कोई कुछ भी कह ले, उन्हें गालियां देने में अपनी शान समङो या देश की बरबादी के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने की नाजायज हिमाकत दिखाए, पर सच यह कि आज पहले से भी कहीं ज्यादा दुनिया को बापू के सिद्धांतों पर अमल करना जरूरी लगने लगा है।

यदि सही मायने में दुनिया में अमन-चैन की जरूरत है तो गांधीवादी सच्चई की ओर सबको लौटना ही होगा। यदि आतंकवाद के खतरों का सामना करना है तो शांति और अहिंसा की बुनियाद मजबूत करनी ही होगी। सच्चे मानव धर्म और बेहतर समाज की जरूरत है तो बालपन से ही अहिंसा और सत्य का बीजारोपण करना होगा। मेरा मानना है कि आज यदि आतंकवाद और सांप्रदायिकता जैसी समस्याएं सिर उठा रही हैं तो उसके मूल में कमजोरी यही कि गांधीवादी शक्तियां कमजोर पड़ गई हैं।

खेद की बात है कि आज गांधी जी का नाम लेने वाले और उनकी पूजा करने वाले तो बहुत नजर आने लगे हैं परंतु बापू की नीतियों का वास्तविक अनुसरण करने वाले घटते चले जा रहे हैं। गांधी के काम को आगे बढ़ाने के लिए खादी और चरखा ही काफी नहीं है, बल्कि इस मूल भावना से जुड़ना होगा कि आज भी हर समस्या का समाधान गांधीवादी सिद्धांतों को अपना कर किया जा सकता है।  मेरा मानना है कि आतंकवाद और भ्रष्टाचार के इस दौर में गांधी जी बताए सत्य और अहिंसा के रास्ते को समझने और अपनाने की सबसे ज्यादा जरूरत है।

आतंकवाद पर हम अहिंसा का सबक सीखकर और भ्रष्टाचार पर सत्य को अपना कर निश्चित विजय हासिल कर सकते हैं। आज अगर किसी बात की प्रासंगिकता है तो वह है जीवन में सत्य की स्थापना और अहिंसक प्रवृत्ति का प्रसार करना। इनसे सुखद और विकसित भविष्य का उम्मीद की जा सकती है। बापू के बताए रास्तों पर चलना बेहद कठिन चुनौती भरा लग सकता है, पर जो इस मार्ग पर चलते हैं उन्हें कोई भय नहीं सताता और वे हर तरह के तनाव और बीमारियों से भी मुक्त रहते हैं। सादा जीवन उच्च विचार रखने से झूठे लालच आपको जीवन में गिरने, झुकने और कमजोर पड़ने नहीं देते। यह भौतिक सुख साधनों से ज्यादा संतोष प्रदान करने वाली जीवन पद्धति है। अपनाकर तो देखिए।


गांधीजी की सोच के प्रतिकूल चलने से भला नहीं हो सकता
अन्ना हजारे (गांधीवादी समाजसेवक)

गांधी आज भी प्रासंगिक हैं। तभी तो हम गांधी को याद करने के लिए मजबूर हैं। अमीरी-गरीबी का फासला बढ़ रहा है। गांव में हर किसी को रोटी नहीं मिल रही है। भूखे पेट शान की बातें नहीं की जा सकतीं। मानव के साथ प्रकृति का भी शोषण हो रहा है। इससे लग रहा है कि एक दिन विनाश होगा। पेट्रोल-डीजल खत्म हो रहे हैं। सिर्फ शोषण करके हम तरक्की की बात नहीं कर सकते। गांधीजी की सोच थी कि प्रकृति ने जो हमें दिया है उसका इस्तेमाल करना चाहिए, न कि उसे नष्ट करना। लेकिन हम उनकी सोच के विपरीत चल रहे हैं।

यह सच है कि हम गांधीजी के बताए रास्ते को अपना रहे हैं। लेकिन ईमानदारी की बात यह है कि हम भी शत-प्रतिशत उनकी राह पर नहीं चल सकते। उन्होंने बहुत बड़ा त्याग किया था। मगर हम कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने जो रास्ता बताया था, उस पर चल सकें। हम समाज के लिए थोड़ा बहुत कर रहे हैं। वो सोच समाज और देश के लिए जरूरी है। गांधीजी के रास्ते पर चलकर और समाज-देश के लिए काम करके हम पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं। हम लोगों ने जिस मेहनत से काम किया है उससे 80-85 स्वावलंबी गांव खड़े हो गए हैं। लेकिन देश में पूरे गांव ऐसे होने चाहिए। गांधीजी ने कहा था कि कर्म करते रहो। यह भगवान की पूजा है। इसका आनंद मिलेगा। इसकी अनुभूति हम करते हैं। कर्म करते रहने से ही संतुष्टि मिल सकती है।

ईमानदारी और सच्चाई से ही मिलती है संतुष्टि
तुषार गांधी का परिचय इतना ही नहीं कि वे महात्मा गांधी के पत्रकार पोते अरुण मणि लाल गांधी के बेटे हैं। बल्कि उनका असली परिचय यह है कि बापू के काम को देश-विदेश में आगे बढ़ाने की खातिर लगातार सक्रिय हैं।

जिंदगी प्रासंगिक है तो बापू अप्रासंगिक नहीं हो सकते। सत्य, अहिंसा जरूरी है तो बापू भी प्रासंगिक हैं। आज हम जिस माहौल में जी रहे हैं उसमें बापू को याद करना जरूरी ही नहीं है बल्कि उनके बताए रास्तों पर चलना भी जरूरी है। हिंसा और आतंक बढ़ रहे हैं। परिवार, समाज, गांव, शहर, राज्य और देश में एकता का अभाव है। रोजगार की कमी है। महंगाई है। इंसानों के बीच दूरियां बढ़ी हुई है। भाषावाद और प्रांतवाद को लेकर झगड़े हो रहे हैं। प्रकृति का शोषण हो रहा है। अमीरी-गरीबी का फासला बढ़ा हुआ है। गांवों का विकास नहीं हो रहा है।

आज जरूरी है कि हम बापू के विचारों के साथ चलें, तभी हमारे साथ देश का भी विकास होगा। आज जिंदगी के हर पहलू के बेहतर के लिए बापू व्यक्ति की जरूरत नहीं है। लेकिन उनके विचार और सिद्धांत की जरूरत है। अगर हम उस पर चलें और वही कर्म करें तो हमें उनके सपनों का देश और रामराज्य मिलेगा। 

संतुष्टि सब चीज में मिलती है। ईमानदारी से काम किया जाए तो संतुष्टि होती है। जीवन में हार-जीत तो होती ही रहती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ मंजिल को प्राप्त करना महत्व है। महत्व यह है कि हम बापू के विचारों के साथ कितना चलते हैं। उनके विचारों के साथ चलने में कष्ट नहीं है बल्कि एक अलग आनंद और अनुभूति मिलती है। बापू ने गांवों के विकास पर जोर दिया था। उनका मानना था कि गांव का विकास बहुत जरूरी है। वह प्रकृति के शोषण के खिलाफ थे। 

गांधीजी के सिद्धांतों को अपनाने से ही होगा उद्धार
अमरनाथ भाई (अखिल भारतीय सवरेदय मंडल के पूर्व अध्यक्ष)

बात 1953 की है। तब मैं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा था। उसी वक्त भूदान आन्दोलन में विनोबा भावे और गांधी जी के विचारों की संगत में आ गया। मैं उनसे इतना प्रभावित हुआ कि मैंने पढ़ाई और पार्टी दोनों छोड़ दी और गांधी जी के विचारों को आगे ले जाने के लिए सक्रिय हो गया। गांधी सर्वोदय समाज का सपना देखते थे। उनकी सोच थी कि अंग्रेज भारत छोड़ जाएंगे तो देश में सर्वोदय समाज का विकास होगा, लेकिन दुर्भाग्य से उनके मित्र ऐसा नहीं सोचते थे। उनकी सोच सत्ता पाना भर था।

उस वक्त बनारस में गांधी आश्रम सेवापुरी नाम से एक स्कूल हुआ करता था, जिसमें सर्वोदय समाज, खादी ग्रामोद्योग आदि की पढ़ाई होती थी। आज जो दुनिया भर में संकट है, उसको गांधीजी ने 1909 में ही देख लिया था। इसकी चर्चा हिन्द स्वराज में वर्णित है। मेरे समझ से दुनिया में गांधी का कोई विकल्प है ही नहीं। कल आप देखेंगे कि कोई भी बात लौटकर गांधी जी पर ही आकर ठहरेगी। मैंने अपना जीवन गांधी जी के विचारों को अखिल भारतीय सर्वोदय मंडल में मंत्री और अध्यक्ष पद पर रहते हुए आगे बढ़ाने में समर्पित किया है। आज भले ही दुनिया आर्थिक संकट से उबरती नजर आ रही है, लेकिन जब तक पूंजीवाद का साम्राज्य कम नहीं होगा, मंदी फिर लौटेगी। इसलिए गांधी जी के विचारों को, उनके सिद्धांतों को हमें अमल में लाना ही होगा।

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