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सैनिक की विधवा खा रही ठोकरें

1965 के भारत पाक युद्ध में कुर्बान हुए एक सैनिक की पत्नी ‘शहीद की विधवा’ का दर्जा पाने के लिए दर-दर भटक रही है और हुक्मरान हैं कि उनके पास इस दुखियारी की बात सुनने तक का वक्त नहीं है।

शहीद मेजर पूरन चंद की पत्नी मोना ठाकुर की फरियाद आखिरकार दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनी और शहीद की विधवा का दर्जा पाने तथा आवास सुविधा के आवेदन पर कोई जवाब न देने के लिये रक्षा मंत्रलय पर पांच हजार रु पए का जुर्माना लगा दिया।

याचिकाकर्ता के वकील केशव ठाकुर ने अदालत से सरकार को उन नियमों में बदलाव करने का आदेश देने की अपील की जिनके चलते रक्षा पदक और सेवा पदक प्राप्त वरिष्ठ सैन्य अधिकारी की विधवा होने के बावजूद उसे सिर छुपाने को छत तक मयस्सर नहीं हो पा रही है। न्यायाधीश संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार से मोना ठाकुर को शहीद की विधवा मानते हुए सैन्य कल्याण आवास संगठन की योजना के तहत मकान दिए जाने के बारे में चार नवंबर तक जवाब देने को कहा है।

सन1987 में बने संगठन की इस योजना के तहत सैन्य कर्मियों के लिए द्वारका और गुड़गांव में आवास उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके तहत शहीद की विधवा का दर्जा प्राप्त महिला और 1987 के बाद शहीद हुए सैनिक की पत्नी भी शहादत के दो साल के भीतर मकान के लिए आवेदन कर सकती है।

मोना ठाकुर का कहना है कि उनके पति जब शहीद हुए उस समय न तो ऐसी कोई योजना वजूद में थी और सरकार से उन्हें शहीद की विधवा का भी अब तक दर्जा नहीं दिया इसलिए वह इस योजना के तहत मकान के आवंटन का आवेदन नहीं कर सकती।

अदालत ने रक्षा मंत्रलय से मोना ठाकूर को शहीद की विधवा का दर्जा नहीं दिए जाने और आवासीय योजना का लाभ नहीं दिए जाने का कारण कई बार पूछे जाने के बावजूद कोई जवाब नहीं देने पर सरकार को पांच हजार का जुर्माना भरने और अगली सुनवाई पर स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया।

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