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‘तू वही करना जो सही होगा’

देश की स्वाधीनता के बाद दिल्ली में खून और हिंसा की इतनी नदियां बही थीं कि गांधी नोआखाली से दिल्ली आने को विवश थे। यह दिल्ली की आत्मनिर्भरता की पराजय ही थी। किन्तु एक रुग्ण मानसिकता के लिए गांधी की उपस्थिति एकमात्र रामबाण थी। बापूजी जिस दिन दिल्ली पहुंचे, हम लोग भाग कर उनसे मिलने गए। मां हमारे साथ नहीं आईं। बापूजी ने मेरे से पूछा भी कि लक्ष्मी कहां है? मैंने घर में मां से जब कहा कि बापूजी तुम्हें पूछ रहे थे तो मां ने कहा कि मुझे बहुत लज्जा होती है कि दिल्ली में इतनी हिंसा हुई है। मैं दिल्ली की ओर से क्या कहूंगी? बापूजी के सामने कैसे जाऊंगी?

दूसरे दिन बहुत साहस बटोर कर मां बापूजी के पास गई। सिर पर खादी की साड़ी का आंचल लिए मां ने बापूजी को प्रणाम किया। मां की आंखों से आंसू उभर रहे थे। उन अश्रुओं में दूसरों की हिंसा और विषमता का पश्चाताप बह रहा था।

बिरला हाउस में मुझे गांधी जी का सानिध्य उपलब्ध हो रहा था। परिस्थिति चाहे जैसी भी होती थी, क्रांति की अथवा उदासीनता की, गांधी जी के पास हम बच्चों के लिए एक उत्सव रचित रहता था। स्कूल की सहेलियों ने कभी मजाक में, तो कभी संवेदनशीलता में कहा कि देश को आजादी तो मिल गई है, किन्तु इस बार गांधी जी हमारे स्कूल के पास के आश्रम में क्यों नहीं ठहर रहे हैं? मुझे घर में समझाया गया था कि सुरक्षा की दृष्टि से बापू जी के लिए एलबुकर्क रोड पर स्थित बिरला हाउस ही उचित रहेगा।

उस अपरिपक्व आयु में मेरे साज-सिंगार की मेरी बेढंगी रुचि रहती थी। मेरे कपड़े- सलवार, कमीज, गरारा सब खादी के ही होते थे, किन्तु कानों में रुचि सहित झुमके पहने रहती थी। ‘इनको पहनने की क्या आवश्यकता है, इनके बिना तू स्वाधीन और अधिक सुन्दर लगेगी।’ मेरे कान खींचते हुए कुछ हंसते हुए और कुछ गंभीरता में बापू जी ये कहते थे। उनके सुझाव में कुछ निर्देश था, किन्तु उनके सामने भी, दिखावे के लिए भी, मैंने उनकी इच्छा का पालन नहीं किया। मैं अपने उस बेढंगे शौक से स्वाधीन नहीं हो सकी। आज उस निर्थक अलंकार से मुक्त हूं, किन्तु रंगों का प्यार तब भी था, आज भी है। आज की तरह मेरी खादी तब भी कई रंग प्रधान लिए रहती थी। मेरे उस शौक पर बापू जी ने कभी विरोध नहीं किया।

देश-विदेश के विभिन्न व्यक्ति जब बापू जी से मिलने आते थे तब अपनी साधारण प्रकृति में ही रहते थे। गांधी जी से अपने वैचारिक भेद को भी स्पष्ट भाव से मुक्त रखते थे। जो खादी के विचार से प्रेरित थे और खादी के आदी थे, वे खादी पहनते थे। जो खादी के कपड़ों के आदी नहीं थे, वे दूसरे कपड़ों में निस्संकोच रहते थे तथा बापू जी द्वारा स्वीकृत ही रहते थे। मैंने बापू जी को क्रुद्ध हो के किसी से बात करते नहीं सुना। दूसरे व्यक्ति के लिए हीन भावना युक्त भी नहीं रहते थे। दूसरा व्यक्ति उनके सामने सम्मानित रहता था। दूसरे व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक योग्यता समझ के ही वे अपने सुझाव देते थे। चर्खा और गांधी की प्रेरणा चारों ओर छा गई थी तथा गांधी जी के आह्वान से इस प्रकार के व्यक्ति और विचार बापू जी के सामने आते थे।

बिरला हाउस की सायंकाल की सामूहिक प्रार्थना एक दिवस की दैनिकता का परम क्षण होता था। उसी क्षण को केन्द्रित किए जैसे दिवस के सब कार्य प्रबन्धन आंदोलित रहते थे। एक प्रकार से वह आध्यात्मिक पनाह का क्षण था। सर्वधर्म प्रार्थना और सामूहिक रामधुन के बाद बापू जी अपने आंतरिक विचार अभिव्यक्त करते थे। देश, समाज और राजनीति की समकालीन परिस्थितियों तथा प्रश्नों के बुनियादी समाधानों और उत्तर में उनके सत्य से प्रेरित नैतिक तथा व्यावहारिक विचार उस प्रार्थना समूह के बाहर भी दिशाहीन शिथिल मानस की चेतना को चुनौती थे।

बाहरी शासन के अन्याय से आजाद हुए देश के अपने आंतरिक अन्याय और हिंसा की भयंकरता से गांधी की आत्मा चीख उठी थी। उनके प्रवचनों में, उनकी संतुलित और धीमी वाणी में सत्य और अहिंसा के भाव गूंजते रहते थे। किन्तु उनके सत्य और अहिंसा के भाव हम बच्चों को एक ऐसे सुर में बांधे रखते थे कि बापू जी के पास जाते ही हम अपना बाह्य रूप ही नहीं, अपने विचारों की गहराइयों को भी, अपनी क्षमता के अनुसार, उन शाश्वत मूल्यों की कसौटी पर लाने के प्रयास करते रहते थे। भूल विचार भी अपराध बोध कराता था। इस सात्विक प्रेरणा के वर्णन से भी बापू जी के व्यक्तित्व का पूर्ण चित्रण नहीं हो सकता है। अद्वितीय, मोहक, खिलखिलाती बापू जी की हंसी का स्तर उस सात्विकता का अभिन्न अंग है।

बिरला हाउस में बापू जी के सानिध्य में मुझे कभी तो प्रबल इच्छा होती थी कि मैं मनु बहन जैसी बनूं और कभी मैं राजकुमारी अमृत कौर की शैली और व्यक्तित्व को अपनाना चाहती थी। किन्तु मेरी वास्तविकता एक आलसी, अल्हड़ किशोरी स्कूल की छात्र की थी। सदा यह विचार भी रहता था कि मैं स्कूल की शिक्षा से किस प्रकार मुक्त हो जाऊं।

देशभक्ति और देश सेवा की इच्छा भी मेरे अन्दर स्वाभाविकता से पनप रही थी। मेरे जीवन में समाज और देश के हित में मेरी क्या भूमिका है, यह मुझे बापू जी से पूछना चाहिए- यह विचार मुझे आता रहा। बापू जी की मृत्यु के कुछ ही दिन पहले की बात थी। रात 8 बजे का समय था और बहुत कड़ाके की सर्दी थी। संयोग से उस समय बापू जी के कमरे में मेरे और बापू जी के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था। समय व्यर्थ किए बिना ही मैंने बापू जी से कहा ‘बापू जी, आप बताइए मुझे जीवन में क्या करना चाहिए’।

मैं बापू जी के हर सुझाव के लिए प्रस्तुत थी। ग्राम सेवा, जन सेवा, खादी सेवा, यात्रा प्रवास सभी तो रोमांच लिए हैं, मैंने सोचा। बापू जी एक आधा मिनट गंभीरता से शान्त रहे फिर उन्होंने कहा- ‘तारा, सर्वप्रथम तुम्हारा आदर्श तुम्हारी मां होना चाहिए, फिर तेरे पिता के भी तो तेरे लिए कई अरमान हैं। तुझे स्कूल की शिक्षा समाप्त करनी है। तू देश-विदेश भ्रमण करेगी। इन सबके बाद तू जब यहां देश में स्थिरता से सोचेगी, तू वही करना जो सही होगा। तुझे अपना सही मार्ग मिलेगा।’ बापू जी ने मुझे मार्ग दर्शन ही नहीं दिया अपितु भविष्य की मेरी आत्मकथा ही लिख दी। मुझे मेरे सत्य की चुनौती दी। हां, इस बात का कुछ दुख अवश्य हुआ कि मैं अपनी स्कूल की पढ़ाई से मुक्त नहीं हो सकी।

लेखिका महात्मा गांधी की पौत्री हैं

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