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अनशन एक शक्तिशाली हथियार

आज के (18 मार्च 1939) ‘हरिजन’ में ‘अनशन’ शीर्षक से एक लेख लिखते हुए महात्मा गान्धी का कहना है कि सत्याग्रह की लड़ाई में अनशन एक शक्तिशाली हथियार है, मगर बिना ईश्वर में दृढ़ विश्वास के यह बेकार है और इसका विकास अन्तर्रात्मा की गहराई से होना चाहिए।

गान्धी जी का पूरा लेख निम्नलिखित है : -
अनशन का अनुष्ठान उतना ही पुराना है जितना कि आदमी। यह आत्म शुद्धि के लिए या कुछ महान और कमीने उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है। बुद्ध, जीसस और महोमद ने ईश्वर के साक्षात दर्शन करने के लिए अनशन किये। श्री रामचन्द्र ने समुद्र से अपनी वानरों की सेना को मार्ग दिखाने के लिए अनशन किया। महादेव को अपने पति के रूप में पाने के लिए पार्वती ने अनशन किया। मैंने अपने अनशनों में इन्हीं महान धारणों का अनुकरण किया, नि:सन्देह इनके उद्देश्य उनकी निस्बत बहुत कम महान हैं।

मैं अपने अभी हाल के अनशन के गुणों पर केवल इस बात का जवाब देने के सिवाय और अधिक बहस करना नहीं चाहता कि आया सेगांव के विदा होते समय मेरा यह विचार था कि मैं वहां अनशन करने के लिए जा रहा हूं। अनशन के मामले में मैं कुछ दिनों से बहुत कायर हो गया हूं। मेरा अगस्त 1933 का अनशन, यद्यपि थोड़े दिनों का था, मगर उससे मुझे भारी वेदना पहुंची। जिस दिन मैंने अनशन छोड़ा उस दिन मैं अपनी मृत्यु की तैयारी कर चुका था। मैंने अपनी बहुत सी मेडिकल वस्तुएं अपनी नर्स को सौंप दी थीं। उसके बाद से मुझे अनशन करते हुए भय लगता है।

6 और 13 अप्रैल को किए 24 घण्टे के वार्षिक अनशनों से यह साफ प्रकट हो गया है कि मेरा शरीर अब किसी लम्बे अनशन के लिए बहुत कमजोर है। इसलिए जब मैंने सेगांव छोड़ा तब मेरे द्वारा उस समय राजकोट आकर अनशन करने के विचार का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि मैं ऐसा कोई निश्चय कर लेता तो मैं कम से कम मित्रों को उनके साथ किये गए वायदे के अनुसार कुछ समय का नोटिस तो जरूर देता। इसलिए अनशन के बारे में पहिले मेरा कोई विचार नहीं था। यह अकस्मात मेरे दिल में आया और एकदम अपनी अंतर्वेदना की गहराई में थी।

अनशन के पहिले कुछ दिन मैं गहरी प्रार्थना में डूबा रहा। अनशन के निर्णय से पहिली रात के अनुभव से मैं एकदम गुम हो गया। मुझे यह नहीं पता था कि क्या करना चाहिये। इसके बाद आने वाली सुबह ने मुझे बता दिया कि मुझे क्या करना है, चाहे इसके लिए कुछ भी कीमत चुकानी पड़े। मैं साधारण तथा ऐसा निश्चय नहीं कर सकता था, मगर इस विश्वास को लेकर कि ईश्वर मुझसे ऐसा चाहते हैं। राजकोट अनशन के लिए इतना कहना ही काफी है।

अनशन का शस्त्र
सत्याग्रह की लड़ाई में अनशन एक शक्तिशाली हथियार है। प्रत्येक आदमी इसका उपयोग नहीं कर सकता। इसके लिए शारीरिक योग्यता ही काफी नहीं है। ईश्वर में दृढ़ विश्वास के बिना यह बेकार है। इसकी बिना सोच विचार किये मशीन की तरह कोशिश या केवल नकल नहीं होनी चाहिए। यह अन्तर्रात्मा की गहराई से होना चाहिए। इसलिए यह बहुत कम होता है। यह बात उल्लेखनीय है कि राजनीतिक क्षेत्र में मेरे किसी साथी ने भी अनशन करने की आवश्यकता महसूस नहीं की। और मुझे धन्यवाद सहित यह भी कहना चाहिए कि उन्होंने मेरे अनशनों का कभी विरोध नहीं किया। और न ही आश्रमवासियों ने केवल कुछ अवसरों को छोड़ कर ऐसा करने की आवश्यकता समझी। यहां तक कि उन्होंने मेरे द्वारा लगाई गई इस पाबन्दी को भी स्वीकार किया कि मेरी आज्ञा के बिना कोई अनशन न करें, चाहे उनकी आत्मा की आवाज कितनी ही प्रबल क्यों न हो।

इसलिए अनशन यद्यपि एक शक्तिशाली हथियार है मगर उसकी भी कुछ सीमाएं हैं और केवल वे लोग ही इसका प्रयोग करें जिन्हें पहिले इसका कुछ अनुभव हो। मेरे स्टैंडर्ड से देखते हुए अधिकांश अनशन सत्याग्रह-अनशनों के दायरे में नहीं आते और इसलिए वे जैसा कि इन्हें आमतौर पर पुकारा जाता है, भूख हड़ताल हैं, जो पहिले अच्छी तरह सोच विचार किये बिना, शुरू कर दी जाती है, यदि यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो कुछ भी थोड़ा बहुत प्रभाव इनमें होता है, वह भी जाता रहेगा और यह एकमात्र हंसी की चीज बन जायगी।

जैसा 19 मार्च 1939 के ‘हिन्दुस्तान’ में छपा

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  • Web Title:अनशन एक शक्तिशाली हथियार