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चीन के विरोधाभास

चीनी क्रांति के साठ वर्ष पूरे होने पर बीजिंग में हुए समारोह की भव्यता में चीन की आर्थिक और सामरिक शक्ति और आत्मविश्वास का प्रतिबिंब था और हर चीज नियंत्रित करने की कम्युनिस्ट आदत भी दिखती थी। परेड में यह तक तय था कि सैनिक पलकें कितनी देर बाद झपकाएंगे, सिर्फ आमंत्रित लोगों के अलावा अन्य नागरिकों को अपनी बालकनी या खिड़की से भी समारोह देखने की मनाही थी और इस बात का भी इंतजाम था कि मौसम खुला रहे।

खुली अर्थव्यवस्था और सख्त नियंत्रण वाली राजनीति और प्रशासन का ऐसा सफल मिश्रण चीन पर राज करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी की बड़ी उपलब्धि है। चीन और भारत को अंतरराष्ट्रीय अर्थ जगत में अक्सर जोड़ कर देखा जाता है, लेकिन हमारी अराजकता और चीन की व्यवस्था का विरोधाभास साफ देखा जा सकता है। चीन ने हमसे लगभग दस बाहर साल पहले अर्थव्यवस्था को खोला और बेहद योजनाबद्ध तरीके से अपनी कृषि केन्द्रित, अभावों से भरी अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर डाला।

चीन के इस योजनाबद्ध तरीके और संकल्प से हमारे देश के कई योजनाकार ईर्ष्या करते हैं और यह भी सही है कि चीन की तरक्की की रफ्तार से सारी दुनिया ही भौंचक है। लेकिन इतना नियंत्रित ढंग से काम करने वाली व्यवस्था में अनायास और अकस्मात होने वाली घटनाओं का डर भी होता है और दुनिया इतनी व्यवस्थित ढंग से चलती नहीं है। चीन की तरक्की ही ऐसे विरोधाभास इकट्ठा करने लगी है, जिससे उसे भविष्य में निपटना होगा। लगभग एक विश्वव्यापी प्राकृतिक आपदा की तरह टूट पड़ी आर्थिक मंदी का चीन पर उतना असर नहीं पड़ा, लेकिन निर्यात पर आधारित उसकी अर्थव्यवस्था की कमजोरी उसमें दिख गई।

इस निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था को बनाने के लिए खास तौर पर ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों की जनता को काफी अभाव और कष्ट ङोलने पड़े हैं और उनमें असंतोष बढ़ रहा हैं। दूसरी ओर विदेशी संपर्क और संचार की टेक्नोलॉजी ने अभिव्यक्ति को नियंत्रित करना कठिन बना दिया है। कहा यह जाता है कि चीन नियंत्रित ढंग से धीरे-धीरे उदार राजनीति और समाज व्यवस्था भी बनाएगा, लेकिन यह सोचना जितना आसान है, उतना करना नहीं। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाज के अंतर्विरोधों से लचीलेपन के साथ निपटने का जैसा अभ्यास होता है, वैसा एकाधिकारवादी सत्ताओं को नहीं होता।

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