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बापू ने एक पत्र में समेटा 1523 वर्ष का इतिहास

बापू ने एक पत्र में समेटा 1523 वर्ष का इतिहास

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले में रुहेलखण्ड के नवाब के वंशजों को संस्कृत में हस्तलिखित एक लंबा पत्र सौंपा था जिसमें उन्होंने नवाब रुहेलखण्ड के परिवार के बलिदान का जिक्र करते हुए उनसे आजादी की लड़ाई मे बढ़चढ़ कर भाग लेने की बात कही है।

दो अक्तूबर 1924 को महात्मा गांधी ने इस पत्र को नवाब रुहेलखण्ड मुल्क हाफीज रहमत के खानदान की पांचवीं पीढ़ी के सदस्य जहूर अहमद अंसारी को लिखा था जिसमें उनके खानदान द्वारा आजादी की लड़ाई में दिए गए योगदान का जिक्र होने के साथ ही आगे की आजादी की लड़ाई में योगदान करने की अपील की गयी है।

इस परिवार के 62 जाबांजों ने स्वतंत्रता संग्राम में कुर्बानी दी थी जिसमें परिवार की आठ विरांगनाएं शामिल थीं। इस खानदान के बलिदान और योगदान से अभिभूत राष्ट्रपिता ने परिवार के जहूर अहमद अंसारी को 45 इंच लम्बा तथा 23 इंच चौड़ा एक पत्र लिखा जिसमें राष्ट्रपिता ने 1523 वर्ष तक के इतिहास को सिर्फ एक ही पत्र में समेट दिया है। उनके इस पत्र में सन 401 के पूर्व से लेकर 1524 तक के इस खानदान के इतिहास का जिक्र है।
    
सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के उप कुलपति वी कुटुम्ब शास्त्री ने बताया कि उन्हें संस्कृत मे लिखे इस पत्र का पता चला है और उन्होंने अपने निजी सचिव को भेजकर उक्त पत्र को वाराणसी मंगवा लिया एवं वह उसका  अध्ययन कर रहे हैं।
     
इतिहासकार बताते हैं कि 23 अप्रैल 1774 में नवाब रुहेलखण्ड हाफिजुल मुल्क हाफीज रहमत, अंग्रेजों और नवाब सुजाउदौला के षडयंत्रो के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गए। उनके पौत्र मसीहुल मुल्क शेरे हिन्दू हाजी फकीर अंसारी अभिधान इन्तेजामुददौला मुहाफिजुल मुल्क खान बहादुर खान हजब्र जंग  ने 31 मई 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व किया था।

25 जून 1857 को उन्होंने जेहाद के फतवे को भी जायज ठहराया था। इस दौरान उनके खानदान के 62 लोग रुहेलखण्ड में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गये। इस लड़ाई मे पुरुष तो आगे थे ही महिलाओं ने भी अदभुत साहस का परिचय दिया और इस परिवार की आठ वीरांगनाओं ने खुद को बलिदान कर दिया।

इस खानदान के कुछ सदस्य आज भी रुहेलखण्ड में हैं जबकि देश के विभिन्न हिस्सों में इस खानदान के लोग बसे हुए हैं। इस खानदान के इतिहास पर लिखी अल्ताफ हुसैन की एक किताब गुरैनी मस्जिद की लाइब्रेरी में आज भी मौजूद है। खानदान की छठी पीढ़ी के सदस्य और जहूर अहमद अंसारी के पुत्र मो़ आसिफ अंसारी ने बताया कि हम मदीने के निवासी थे और सन 711 में सिन्ध से मोहम्मद बिन कासिम के साथ आये थे।
   
महात्मा गांधी से जुड़ी वस्तुओं की भले ही विदेशों में करोड़ो की बोली लग रही हो लेकिन उनके द्वारा लिखे गये इस पत्र को जिस खानदान ने अभी तक संभाल कर रखा हुआ है, उस परिवार के सदस्य मुफलिसी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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