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बॉलीवुड की आंधी में गांधी

बॉलीवुड की आंधी में गांधी

जब अमेरिका में अपनी फिल्मों की शूटिंग का क्रेजी बॉलीवुड महात्मा गांधी की प्रतिमा को कुछ सेकेंड दिखाना तक गवारा नहीं कर पाता तो उन पर फिल्म बनाने का सवाल ही कहां उठता है? यही कारण है कि बॉलीवुड में राष्ट्रपिता पर बहुत कम फिल्मों का निर्माण हुआ है। ज्यादातर वृत्तचित्र ही बने हैं।

अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन दुनिया भर की तमाम फिल्मों में जगह पाता रहा है, यहां तक कि यह सबसे ज्यादा शूट किया जाने वाला शहर है। यहां लिंकन स्मारक है और इसके पास ही भारत के दूतावास के ठीक सामने कृषकाय महात्मा गांधी की आठ फुट, आठ इंच ऊंची ताम्र प्रतिमा है। पर खास यह है कि जहां 92 फिल्मों में अमेरिकी संसद, 78 फिल्मों में अमेरिका के पहले राष्ट्रपति के स्मारक तथा 62 फिल्मों में लिंकन के मकबरे को शूट किया गया, वहीं दुनिया को अहिंसा का संदेश देने वाले महात्मा गांधी की प्रतिमा को केवल एक फिल्म ‘द विजिटिंग’ में शूट किया गया है। पर सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि अपने मुम्बईया फिल्मकारों ने तो इस प्रतिमा के पास तक जाना मंजूर नहीं किया।

अमेरिका में अपनी फिल्मों की शूटिंग का क्रेजी बॉलीवुड महात्मा गांधी की प्रतिमा को जब कुछ सेकेंड के लिए दिखाना तक गंवारा नहीं कर पाता तो उन पर बनाई जाने वाली फिल्मों की संख्या तो निश्चित ही उंगलियों पर गिनी जा सकती है। ज्यादातर वृत्तचित्र ही बने हैं। इनमें 1952 में गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की मानसिकता को लेकर ‘नाइन अवर्स टु रामा’, 1968 में एक वृत्त चित्र ‘महात्मा : लाइफ आफ गांधी’ और वृत्त चित्र ‘महात्मा गांधी - ट्वेंटीयथ सेंचुरी प्रोफेट’ का निर्माण किया गया था।

वर्तमान में टीवी स्टार स्मृति ईरानी यूटीवी के सहयोग से महात्मा गांधी पर एक सीरियल का निर्माण करने जा रही हैं। उनके इस सीरियल में महात्मा गांधी एक राष्ट्रपिता ही नहीं, एक पति, एक पिता और परिवार के मुखिया के रूप में नजर आएंगे। जहां तक फिल्मों का सवाल है, भारतीय फिल्मकारों को महात्मा की दुबली-पतली काया में ग्लैमर नजर नहीं आया। 1982 में रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ के बाद श्याम बेनेगल की फिल्म ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ का ही निर्माण हुआ। यह बात दीगर है कि बेनेगल की फिल्म दूरदर्शन पर ही दिखायी जा सकी। इसके बाद यदि किसी उल्लेखनीय फिल्म की बात की जाए तो ‘गांधी माई फादर’ का नाम लिया जा सकता है। यह फिल्म गांधी और उनके बेटे के संबंधों का विश्लेषण करने वाली प्रभावशाली फिल्म थी। इसके अलावा शहीद भगत सिंह पर बनी तीन फिल्मों में गांधी जी की विचारधारा का अपने हिसाब से विवेचन किया गया, पर ये तीनों फिल्में गांधी पर केन्द्रित नहीं थीं। इसके अलावा केतन मेहता की फिल्म ‘सरदार’, ‘बाबा साहेब अम्बेडकर’, ‘वीर सावरकर’, कमल हासन की फिल्म ‘हे राम’ और ‘शोभायात्रा’ जैसी फिल्मों में गांधी का जिक्र मिलता है।

वैसे इधर बॉलीवुड ने गांधी को एक चरित्र की बजाय एक विचार के रूप में अपनी फिल्मों में इस्तेमाल करना शुरू किया है। राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ इसका सबसे सफल उदाहरण है। इस फिल्म के प्रमुख चरित्र मुन्ना को महात्मा गांधी से मिलने का भ्रम होता है। राजकुमार हिरानी ने गांधी जी के सत्याग्रह, अहिंसा आदि आदर्शो का फिल्म के नायक पर बहुत अच्छा इस्तेमाल किया, जिसे उन्होंने गांधीगिरी का नाम दिया। निर्देशक जानू बरुआ की फिल्म ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ हालांकि अल्जाइमर और सित्जोफ्रेनिया जैसी बीमारी के शिकार प्रोफेसर के अपराध-बोध की कहानी है, जिसमें प्रोफेसर को यह भ्रम है कि उसने गांधी को मारा है। फिल्म में अदालत के एक दृश्य में प्रोफेसर कहता है कि हम सभी लोग गांधी की विचारधारा और उनके सिद्धांतों की हत्या करने के दोषी हैं। नवोदित निर्देशक अमित राय की फिल्म ‘रोड टु संगम’ का एक मुसलमान चरित्र उस फोर्ड ट्रक की मरम्मत कर उसे चलने लायक बना लेता है, जिस पर महात्मा गांधी की अस्थियां ले जायी गयी थीं। यह फिल्म भी प्रतीकात्मक रूप से गांधी की विचारधारा को स्थापित करने की वकालत करती है। अब यदि गांधी का चरित्र निभाने वाले कलाकारों की बात करें तो हाल में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘गांधी माई फादर’ के गांधी दर्शन जरीवाला को श्रेष्ठ सह अभिनेता का पुरस्कार दिया गया है। 2006 में मुन्नाभाई में गांधीजी की भूमिका करने वाले दिलीप प्रभावलकर भी श्रेष्ठ अभिनेता घोषित किए जा चुके हैं। परन्तु इन भारतीय गांधियों में वह बात नहीं थी, जो रिचर्ड एटनबरो के गांधी में थी। इसके अलावा गांधी की भूमिका में अनु कपूर, मोहन गोखले, सुरेन्द्र राजन, नसीरुद्दीन शाह और रजत कपूर भी नाम कमा चुके हैं।

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