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बिहार में गोताखोरों का टोटा

बिहार में जब भी नाव हादसा होता है तो गोताखोरों के नाम पर प्रशासन की नींद उड़ जाती है। बिहार में गहरे गोताखोर नहीं हैं जो नदी की गहरायी में जाकर डूब रहे लोगों की जान बचा सकें। कहीं कोई आसरा है तो वह हैं नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) के गोताखोर। पर, घटना स्थल तक उनके पहुंचते-पहुंचते न जाने कितनों की जानें चली जाती हैं।

आपदा प्रबंधन विभाग लगातार इस समस्या से जूझ रहा है। लिहाजा विभाग ने यह तय किया है कि अब हर जिले में ही गोताखोर तैयार किए जाएं। तैराकी जानने वाले चुनिंदा लोगों को हर जिले में गहरे गोताखोर के रूप में ट्रेंड करने की तैयारी शुरू हो गयी है। इसके लिए विभाग निजी संस्थाओं की मदद लेने पर विचार कर रहा है। अधिकारियों के अनुसार यूएनडीपी से फंड भी उपलब्ध है और गोताखोरों की ट्रेनिंग में पैसे की कमी नहीं होगी।

वैसे बिहार में गहरे गोताखोरों की ट्रेनिंग के लिए बीएसएफ ने बीते साल सरकार को एक प्रस्ताव भी दिया था। योजना थी कि पुलिस के चुनिंदा जवानों के अलावा स्थानीय स्तर पर भी गोताखोरों का चयन किया जाए। बीएसएफ उन्हें 6  हफ्ते की ट्रेनिंग देगी। पर, मामला ठंडे बस्ते में ही पड़ा रहा। 
खगड़िया में भीषण नाव हादसे के बाद एक बार फिर गोताखोरों की जरूरत महसूस की जाने लगी है। बताया जाता है कि पिछले दिनों ढाका में एक नाव हादसे के बाद कुछ लोग अपनी जान बचाने के लिए पेड़ों पर चढ़ गए थे। सरकार को सूचना दी गयी कि अगर तीन घंटे के भीतर वहां गोताखोर और बचाव दल पहुंच जाए तो लोगों की जान बचायी जा सकती है।

आपदा प्रबंधन विभाग के मार्फत सूचना मुख्यसचिव तक पहुंची और तत्काल एनडीआरएफ के जवानों को हेलीकॉप्टर से वहां भेजने का निर्णय लिया गया। जवानों ने उड़ान भी भरी लेकिन मौसम दगा दे गया और जवानों को वापस पटना लौटना पड़ा। अंतत: कई लोगों की जानें चली गयीं। आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि अगर मोतिहारी जिले में गोताखोर उपलब्ध होते तो शायद लोगों की जान बचायी जा सकती थी।

दोबारा खगड़िया में नाव हादसा हुआ और वहां भी गोताखोरों का टोटा रहा। पटना और सहरसा से एनडीआरफ के बचाव दल के पहुंचते-पहुंचते कई लोग डूब चुके थे और फिर निकाली गयी तो सिर्फ लाश। 

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