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क्वात्रोच्चि मामले को कानूनी तौर पर दफनाने में जुटी सीबीआई

क्वात्रोच्चि मामले को कानूनी तौर पर दफनाने में जुटी सीबीआई

केन्द्रीय जांच ब्यूरो बोफोर्स तौप सौदे में इतालवी व्यावसायी ओत्तावियो क्वात्रोच्चि के खिलाफ दायर मामलों को वापस लेने के लिए तीन अक्तूबर को दिल्ली में मजिस्ट्रेट की अदालत के समक्ष औपचारिक रूप से एक आवेदन दाखिल करेगी।

केन्द्रीय मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने साक्षात्कार में बताया कि सरकार ने मामलों को वापस लेने का फैसला किया है तथा सीबीआई की ओर से सरकारी वकील तीन अक्तूबर को मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन दाखिल करेंगे।

ब्रिटिश सरकार के निमंत्रण पर यहां आए केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि चूंकि एक जनहित याचिका उच्चतम न्यायालय में लंबित है, सोलिसिटर जनरल का विचार है कि यह उचित रहेगा कि उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में यह बात लायी जाए।

खुद एक प्रख्यात वकील मोइली ने इस बात को रेखांकित किया कि दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जेडी कपूर ने चार फरवरी 2004 को बोफोर्स मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और पैनल कोड के तहत रिश्वतखोरी के सभी आरोपों को खारिज कर दिया था। न्यायाधीश ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उस समय रक्षा सचिव रहे एसके भटनागर को मामले से बरी कर दिया था।

न्यायाधीश कपूर ने कहा था कि आरोप विशुद्ध रूप से अनुमान, परिकल्पना और अटकलबाजी के आधार पर लगाए गए और सीबीआई ने इन तथ्यों पर भी गौर नहीं किया कि केवल ऐसी अटकलबाजी के आधार पर आपराधिक सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकती, जिसमें कोई महत्व की बात या सबूत नहीं हो।

भारतीय मंत्री ने कहा कि मामले को यदि आगे बढ़ाने के लिए कहीं कोई सबूत होता तो हम मामले को आगे बढ़ाने में हिचकते नहीं। मोइली ने इस बात को रेखांकित किया कि सीबीआई हर कहीं मामले को आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा इस मामले को आगे बढ़ाने का कोई मतलब नहीं है। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम कोई मामला नहीं है।

उन्होंने कहा जब भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में कोई मामला नहीं है तो इसमें आपराधिक संलिप्तता का सवाल कहां रह जाता है। कोई अपील भी दाखिल नहीं की गयी। यह फैसला राजग सरकार के शासनकाल में आया था। मोइली ने कहा यह मामला अर्जेंटीना की अदालत और फिर मलेशियाई अदालत में उठाया गया। हर जगह सीबीआई विफल रही। अर्जेंटीना की अदालत ने इतने सालों के बाद मामले को आगे बढ़ाने के लिए सरकार पर भारी शुल्क लगाया क्योंकि मामला 1986 से लंबित था।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा कि बोफोर्स तोप सौदे के लिए अंतिम भुगतान 1990 में किया गया जब वीपी सिंह की सरकार थी। उन्होंने सवाल किया यदि उन्हें कोई शक था तो उन्होंने अंतिम भुगतान क्यों किया।
 मोइली ने कहा कि इस मामले के अधिकांश समय में विपक्षी पार्टियां सत्ता में रहीं।

उन्होंने कहा यदि वे धन को वापस लाना चाहते थे तो उन्हें दीवानी मामला दायर करना चाहिए था, लेकिन यह समय सीमा में बंधा था और इसे तीन साल के भीतर किया जाना चाहिए था। विधि मंत्री ने कहा यह क्वात्रोच्चि या किसी और का सवाल नहीं है।

कल सुप्रीम कोर्ट ऑफ ग्रेट ब्रिटेन के औपचारिक उद्घाटन समारोह में भाग लेने वाले मोइली ने कहा हमारी किसी को बचाने में कोई रूचि नहीं है। सवाल यह है कि क्या मामले को आगे बढ़ाने से कोई सार्थक नतीजा निकलेगा। सुप्रीम कोर्ट के उद्घाटन से पहले हाउस आफ लाडर्स शीर्ष अदालत की तरह काम करता था। मोइली ने कहा कि सरकार केवल झूठी प्रतिष्ठा और केवल विपक्ष को खुश करने के लिए इस मामले को चलाए रखने के पक्ष में नहीं है।

विधि मंत्री ने कहा कि विशेषज्ञों की राय में, कुछ नहीं होने वाला है। हम सरकार की झूठी प्रतिष्ठा मात्र या विपक्ष को खुश करने के लिए इसे जारी नहीं रख सकते जो इस मामले को जिंदा रखना चाहता है। किसी प्रकार की ऑक्सिजन से शरीर को जिंदा नहीं रखा जा सकता।

मोइली ने कहा कि इस मामले ने कई लोगों की जिंदगियों को नुकसान पहुंचाया। आप चाहते हैं कि इसका प्रेत अभी भी पीछे लगा रहे। किसलिए । कब तक आप सीबीआई को लगाए रखना चाहते हैं। यदि आप सीबीआई को लगाए रखते हैं तो यह केवल राजनीतिक मकसद से है, और कुछ नहीं है। एक के बाद एक अदालतें इस मामले में फैसला दे चुकी हैं।

मोइली ने कहा कि इसलिए पिछली सरकारों में महाधिवक्ता ने कहा कि कहीं कोई मामला नहीं है और इसे जारी रखने का कोई आधार नहीं है। तत्कालीन विधि मंत्री ने भी इस विचार की पुष्टि की। उन्होने कहा, संप्रग सरकार के सत्ता में लौटने के बाद हमने मामले को महाधिवक्ता के पास भेजा और उन्होंने भी यही कहा कि मामले को आगे बढ़ाने का कोई आधार नहीं है। इसे फिर से सोलिसिटर जनरल और कार्मिक मामलों के विभाग को भेजा गया और उन्होंने भी यही कहा कि जारी रखने का कोई आधार नहीं है।

मोइली ने कहा कि दो महाधिवक्ताओं के यह कहने पर कि मामले को आगे बढ़ाने का कोई आधार नहीं है और बेहतर होगा कि इसे वापस ले लिया जाए सरकार ने इसे वापस लेने का फैसला किया। मामले को वापस लेने के संबंध में भाजपा की आलोचनाओं को खारिज करते हुए विधि मंत्री ने कहा कि भाजपा आठ साल तक सत्ता में रही लेकिन कहीं मामले को आगे नहीं बढ़ पायी।

मोइली ने इस मामले को राजनीतिक एजेंडा और चरित्र हनन का प्रयास करार दिया। उन्होंने कहा मैं नहीं समझता हूं कि कुछ राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक लाभ उठाने की खातिर सीबीआई का दुरूपयोग किया जाना चाहिए। आप ऐसा नहीं कर सकते। विधि मंत्री ने कहा कि मामलों को तेजी से निपटाना उनका एजेंडा है, न कि उन्हें 25 साल से लंबित रखना।

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के साथ उनके मतभेदों के बारे में पूछे जाने पर मोइली ने इन्हें बेबुनियाद बताया और कहा वह स्नातक स्तर पर विधि विषय को लाना चाहते हैं और इसके साथ ही सुधार करना चाहते हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। कोई भी सुधार, हम साथ मिलकर करेंगे।

मंगलवार को चेन्नई से सिब्बल द्वारा उनसे फोन पर बात करने का जिक्र करते हुए मोइली ने कहा हम एक दूसरे के हितों के विरूद्ध काम नहीं कर रहे हैं । हम एक साथ काम कर रहे हैं । कहीं कोई गलतफहमी नहीं है।

उन्होंने कहा कि विधि मंत्रालय ने देश में आपराधिक न्याय प्रणाली में काफी सुधार की योजना बनायी है। उन्होंने कहा कि फास्ट ट्रेक सिस्टम वरदान साबित हुआ है और यह जारी रहेगा। उन्होंने कहा हम चाहते हैं कि अपराधी को सजा मिले और निर्दोष जल्दी से बरी हों।

पिछले दो दिन के दौरान मोइली ने लॉ सोसायटी आफ ग्रेट ब्रिटेन, ज्यूडिशियल स्टडीज बोर्ड और बैरोनेस उषा पराशर, न्यायिक नियुक्ति समिति के अप्रवासी भारतीय अध्यक्ष और ब्रिटेन में युवा वकीलों के समूह से भी मुलाकात की।

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