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चीन को संतुलित करेगा लोकतंत्र

पिछले साठ साल में चीन में विकास के मायने बदले हैं। आर्थिक सफलता मुख्य रूप से राजनीतिक नेतृत्व और उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है। मार्क्स की ऐतिहासिक विकास की अवधारणा से अलग चीन की ग्रामीण जनता और खासकर किसानों ने चीन की 1949 की साम्यवादी क्रांति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने किसानों और ग्रामीण जनता के हित में नई नीतियां बनाने की मांग प्रशस्त किया। साम्राज्यवाद और सामंतवाद का खात्मा, भूमि सुधार और कम्यून व्यवस्था की स्थापना इसकी प्रमुख विशेषताएं थी।

इस व्यवस्था ने काफी हद तक एक समतावादी समाज की स्थापना की जिसमें सब लोगों ने करीब-करीब एक जैसे काम किए, करीब-करीब एक जैसे पैसे प्राप्त किए। अमर्त्य सेन जैसे विद्वान यह मानते हैं कि भले ही माओ के कार्यकाल में आर्थिक विकास की दर कम रही, इस काल की मुख्य उपलब्धियां भूमिसुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों में देखे गए जो सरकार द्वारा संचालित थे। लेकिन माओ के ही युग में 1958-61 में अकाल की त्रासदी हुई।

1970 के दशक के अंतिम वर्षो में तंग श्याओफिंग चीन के शक्तिशाली नेता बनकर उभरे और चीन ने नई व्यवस्था की ओर रुख किया जिसका मूल कम्यून व्यवस्था की समाप्ति और सुधारों की शुरुआत थी। मुख्य तर्क था चूंकि गरीबी समाजवाद नहीं है इसलिए उत्पादक शक्तियों का विकास चीन को अपने तरीके से करना चाहिए। शुरुआत ग्रामीण चीन से की गई गई। कृषि के क्षेत्र में परिवार दायित्व व्यवस्था को लागू किया गया। इस व्यवस्था में भूमि का स्वामित्व सरकार के पास रहा लेकिन प्रबंध और कृषि कार्य आम लोगों पर छोड़ दिया गया। इससे कृषकों की आमदनी बढ़ी।

शहरी क्षेत्रों में औद्योगिक सुधारों ने लोगों की आमदनी बढ़ाई। पिछले तीस साल में चीन की विकास दर 9 प्रतिशत के आसपास रही है जो विश्व की सबसे तेज गति से उभरती अर्थव्यवस्था है। सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि आर्थिक सुधारों ने गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वाले लोगों की संख्या में कमी लाई। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 1978 में यह संख्या 25 करोड़ थी जो आज करीब 2 करोड़ है।

वर्तमान चीन में सामाजिक बदलाव भी आसानी से देखे जा सकते हैं। कुछ नए वर्गो का उदय हुआ है इसके सबसे प्रमुख है प्राइवेट उद्यमी जिनकी प्रमुखता पार्टी में भी बढ़ी है। किसान अब एक सजातीय वर्ग नहीं रहा। इसका विभाजन प्रवासी और अन्य वर्गो में किया जाता है। शहरों के खासकर उपभोक्तावादी संस्कृति का विस्तार काफी तेजी से हुआ है।

लेकिन पिछले कुछ साल में चीन में ग्रामीण संकट उभरा है। कृषि एक उत्पादक क्षेत्र नहीं रह गया है और इसलिए कृषि पर आधारित लोगों की आय नहीं बढ़ पा रही है। गांवों में आधारभूत संरचनाओं का भी अभाव है और सुधार के इस दौर में सरकार द्वारा कृषि के क्षेत्र में निवेश कम किए जाने से भी हालात बिगड़े हैं। भ्रष्टाचार अपनी जड़ें जमा चुका है तथा ग्रामीणों और स्थानीय अधिकारियों के बीच संबंध बिगड़े हैं। इसका मुख्य कारण जमीन का मसला है। स्थानीय अधिकारियों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर ग्रामीण की जमीन लेकर उसे व्यावसायिक और अन्य कार्यो के लिए पट्टे पर दे दिया है। इनमें मुआवजा काफी कम दिया जाता है।

आर्थिक सुधार के दौर में चीन में आर्थिक और सामाजिक असमानता बढ़ने के पूरे प्रमाण हैं। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से शहरी लोगों की आय ग्रामीण लोगों की आय औसतन तीन गुना ज्यादा है। चीन के कुछ विशेषज्ञों ने अपने अध्ययनों से यह स्थापित किया है कि शहरी और ग्रामीण जनता के बीच में यह अंतर 6 गुना से भी ज्यादा है। ऐसे भी गांव हैं जहां प्रतिव्यक्ति औसत आय के हिसाब से 10 गुना का अंतर है। यूएनडीपी के आंकड़ों के हिसाब से चीन में असमानता भारत में फैली असमानता से भी ज्यादा है।

ग्रामीण चीन में स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र है, जहां से सरकार ने अपने हाथ पूरी तरह खींच लिए हैं। अब किसी गांव में सरकारी डॉक्टर नहीं मिलते हें। हाल के दिनों में चीन में इलाज का खर्च नहीं उठा पाने के कारण ग्रामीणों के सामने बहुत तरह की समस्याएं सामने आई हैं। चीन में गांव के स्तर पर ग्राम सभा के लिए चुनाव होते हैं। लेकिन इसकी संभावना काफी कम होती है कि अगर कोई व्यक्ति जो कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य नहीं हो वह ग्राम सभा के लिए चुन लिया जाए।

इस चुनाव में सिर्फ दो व्यक्ति चुनाव लड़ सकते हैं। अगर दो से ज्यादा व्यक्ति चुनाव मैदान में हैं तो उन्हें उम्र, शिक्षा या अन्य कारणों से हटाया जाता है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के व्यावसायिक लोग कई जगहों पर पार्टी के सचिव पद के साथ-साथ ग्राम सभा के अध्यक्ष का भी पद पाने में सफल रहे हैं। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर गांव के सारे लोग इकट्ठा होकर निर्णय लेते हैं।

ग्रामीण समस्याओं ने बड़ी संख्या में लोगों को शहरों की ओर पलायन के लिए बाध्य किया है। हाल तक चीन में स्थानांतरण अवैध था लेकिन स्थिति को देखते हुए सरकार ने ढीलापन दिखाया है। विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि चीन में आर्थिक और सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार, ग्रामीण संकट, जातीय तनाव तथा केन्द्र और राज्य संबंधों में तनाव जैसे कारक चीन की राजनीतिक स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। जबकि कुछ और लोग मानते हैं कि सरकार ने विकास की खामियों को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाए हैं, और इनसे वह समस्याओं से मुक्ति पा सकती है।

विशेषज्ञों का तीसरा वर्ग यह मानता है कि चीन की समस्याओं का समाधान जनंतंत्र के द्वारा किया जा सकता है। वर्तमान चीन में जनतंत्र की संभावनाएं कई कारणों से दिख रही हैं। एक तो चीन में मिडिल क्लास का उदय एक हाल की घटना है लेकिन इसकी संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार 2025 तक इस वर्ग की संख्या 50 करोड़ से भी ज्यादा होगी। दूसरे मीडिया की स्वायत्तता पर भले ही चीन में अंकुश हो पर हाल के दिनों में मीडिया ने भ्रष्टाचार, सुशासन की कमी जैसे मुद्दों पर खबरें प्रकाशित की हैं।

तीसरे जनसंचार की क्रांति ने चीन के लोगों को अन्य दुनिया से जोड़ा है। चीन की जनसंख्या के करीब आधे लोगों को मोबाइल फोन की सुविधा उपलब्ध है जबकि इंटरनेट की उपलब्धता करीब 30 करोड़ लोगों को है। फिर सिविल सोसाइटी संगठनों की संख्या और सक्रियता बढ़ी है। कुछ क्षेत्रों में खासकर पर्यावरण में इन संगठनों की भूमिका सराहनीय रही है। फिलहाल चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी ताकत को बरकरार रखते हुए इन समस्याओं से बाहर निकलना है।

लेखक इंडियन कौंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर में रिसर्च फैलो हैं
sanjeev@ icwa. in

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