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गांधी टोपी..इन 55 डॉलर्स

चुनावी ने गांधी टोपी का एक नया बाजार खड़ा कर दिया है। नेता चाहे जसे हों, गांधी टोपी उनकी पहली पसंद बन चुकी है और उसे सिर पर सजाकर वे जनता से वोटों की सौगात माँगने निकल पड़े हैं। आगे-पीछे से नुकीली गांधी टोपियाँ एक बार फिर फैशन में हैं। इनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि इंटरनेट के ई-मार्केट में गांधी टोपी 55 अमेरिकी डॉलर में उपलब्ध है। क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करके गांधी टोपी आप अपने घर पर मँगा सकते हैं। बाजार संस्कृति की बलिहारी है ये कि आम दिनों में उन्हें कोई नहीं पूछता, पर इस वक्त इनके दाम किसी ब्रांडेड एपारल से टक्कर ले रहे हैं।ड्ढr खादी ग्रामोद्योग के कारखाने में इन दिनों गांधी टोपियों की सिलाई का काम जोरों पर है। खादी की इस टोपी की आज भी करघे से धुनाई होती है और इसका धागा चरखे पर तैयार होता है। अकेले लखनऊ के हारतगंज स्थित खादी आश्रम में हर रो करीब पचास टोपियाँ बिक रही हैं। विक्रेता राजेन्द्र प्रसाद मौर्य कहते हैं कि ये चुनाव का असर है। नेताओं को लगता है कि गांधी टोपी पहनने से वोटरों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। इसमें उनका चेहरा गांधीमय हो जाता है शायद।ड्ढr चरखे के सूत से बनी ये टोपी आजादी की लड़ाई का प्रतीक बनी क्योंकि तब गांधी से लेकर नेहरू तक ने इसे एक पहचान दी थी। फिर गांधीवादी नेताओं ने इसे अंगीकार किया। राजीव गांधी भी इसे दूसर मौकों पर पहनते थे। अस्सी के दशक में एक बार गार्ड ऑफ ऑनर देते हुए उन्होंने खुद राहुल गांधी को गांधी टोपी पहनाई थी।ड्ढr खादी आश्रम के मौर्य बताते हैं कि कुछ कांग्रेसियों को छोड़ दें तो अब कोई गांधी टोपी नहीं खरीदता। 15 अगस्त व 26 जनवरी को स्कूली बच्चे जरूर ये टोपियाँ खरीदते हैं। गांधीगिरी के दिनों में मुन्ना भाई ने गांधी टोपी को नया आयाम दिया था। 2006 में संजय दत्त की फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के आने के बाद गांधी टोपी एक बार फिर चर्चा में आ गई थी। लोग गांधीगिरी करने के लिए गांधी टोपी खरीदने लगे थे। लखनऊ के अकेले गांधी आश्रम से हाारों टोपियाँ बिकीं। लेकिन अब लखनऊ से चुनाव लड़ रहे खुद मुन्ना भाई की टोपी का रंग बदल गया। वे अब गांधी टोपी छोड़कर समाजवादी पार्टी की लाल टोपी पहनकर जनता से वोट माँग रहे हैं।ड्ढr मौर्या बताते हैं कि इधर करीब 15 सालों से समाजवादियों की लाल टोपी का चलन बढ़ा है। मुलायम सिंह के कार्यकाल में ये टोपियाँ लाखों की संख्या में बिकती हैं। लोहिया वाहिनी के युवा इस टोपी को समाजवादी क्रान्ति का प्रतीक मानते हैं।ड्ढr लेकिन गांधी टोपी का अपना बाजार है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि ये नेट पर भी उपलब्ध है। गांधी टोपी डॉट कॉम पर जाकर हर साक्ष की टोपी आर्डर कर सकते हैं। नेट पर इसकी कीमत 55 डॉलर यानी करीब 2750 रुपए प्रति टोपी है। जबकि खादी आश्रमों में विशुद्ध खादी की बनी ये टोपियाँ केवल 20 रुपए में मुहैया है। ड्ढr इनसेट- जिनकी शान है गांधी टोपी 21वीं सदी में भी ऐसे कई कांग्रेसी हैं, गांधी टोपी जिनकी शान है। महाराष्ट्र के सुशील कुमार शिंदे हों या राजस्थान के अशोक गहलौत, बंगाल के प्रणव मुखर्जी हों या फिर कर्नाटक के वीरप्पा मोइली। इनके सिर पर अक्सर गांधी टोपी सजती है। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा भी गांधी टोपी में नजर आते हैं। कश्मीर के गुलाम नबी आजाद भी गांधी टोपी के शौकीन हैं।ड्ढr यूपी-उत्तरांचल में महावीर प्रसाद, एनडी तिवारी, माता प्रसाद, इरशाद अली व रामनरश यादव जसे नेता भी हमेशा गांधी टोपी में नजर आते हैं। पूर्व जस्टिस हरिनाथ तिलहरी जसे संभ्रात नागरिक भी गांधी टोपी का मोह छोड़ नहीं सके हैं। उधर कुख्यात अरुण गवली और नसीब पठान जसे नेताओं के सिर पर भी गांधी टोपी दिख जाती है।ड्ढr महिलाओं के लिए गांधी टोपी पहनना अनिवार्य नहीं, फिर भी खास मौके पर सोनिया गांधी और रीता बहुगुणा जोशी गांधी टोपी में दिख जाती हैं।ड्ढr ड्ढr

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