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गठचाोड़ की उधेड़बुन

यह सौदेबाजी का समय है। गठबंधन बनाने का अर्थ ही होता है, चुनाव के पूर्व भीषण रस्साकशी और डाल-डाल, पात-पात वाली सौदेबाजी में ज्यादा से ज्यादा हासिल कर लेने का पराक्रम। इसलिए इस समय उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में जो हो रहा है, उसमें बहुत ज्यादा वैचारिक गहराई खोजने की जरूरत नहीं है। इस तीतर युद्ध की शहमात बहुत दूर तक जाने वाली नहीं है। यह खेल की मुख्य बाजी भी नहीं, बिसात बिछाने की कवायद भर है। इसके कड़वे, खट्टे अनुभव न तो चुनाव पर ज्यादा असर डालने वाले हैं और न ही उसके बाद की राजनीति पर। लेकिन यह जरूर है कि इस सिलसिले में देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की जो गति हो रही है, वह चौंकाती है। एक ऐसी पार्टी जो पिछले पांच साल से पूरी कामायाबी के साथ केंद्र में सरकार चला रही है, उसे अब उसी के क्षेत्रीय सहयोगी हाशिये पर धकेल रहे हैं। बिहार में लालू यादव की राजद और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ित पार्टी ने सीटों का बंटवारा करते समय कांग्रेस को तीन सीट से ज्यादा के लायक नहीं समझा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए सीटें छोड़ने की मुलायम सिंह की कभी हां, कभी न वाली आनाकानी अखबारों में रोाना की खबर बन चुकी है। बिहार के जवाब में भले ही कांग्रेस ने झारखंड में राजद को मुंहतोड़ जवाब देने की कोशिश की हो, मूल सवाल अपनी जगह है कि इन राज्यों में कभी एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को क्या अब छोटे से चंपू घटक के रूप में ही संतोष करना होगा? उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस की ताकत पिछले कुछ साल में काफी घटी है। इन दोनों ही राज्यों में वह चौथे नंबर की पार्टी है। और झारंखड में भी उसकी स्थिति मामूली सी ही बेहतर है। कारण मंडल और मंदिर की राजनीति हो या इस क्षेत्र की सामाजिक राजनीतिक समीकरणों का तेजी से बदल जाना, गंगा-ामुना के इस मैदान पर पिछले दो दशक से वह हाशिये की तरफ ही जा रही है। इसलिए यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि टिकटों के बंटवार में उसकी बात का भारी वजन होगा। लेकिन उसके बावजूद यह भी सच है कि राजद और लोजपा ने एकाुट होकर कांग्रेस को जो न्याय दिया, वह उससे तो ज्यादा की ही अधिकारी थी। कांग्रेस सहाविश्वासी सौदबाजी के इस बाजार में अपने लिए ज्यादा सीटों की जुगत लगाने में नाकाम रही। खुद को गठबंधन वाले युग की जरूरतों की पेंचदार मानसिकता में ढालने के लिए कांग्रेस को अभी बहुत कुछ सीखना होगा।

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  • Web Title: गठचाोड़ की उधेड़बुन