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जेंडर : क्यों नहीं जाती लड़कियां पुलिस में

पंजाब महिला पुलिस कर्मचारी नहीं चाहती कि उनकी बेटियां यह नौकरी करें। पिछले दिनों पंजाब पुलिस में महिलाओं की भर्ती के लिए आवेदन मंगाये जा रहे थे, तब इस बात का पता चला। कुछ रिपोर्टरों ने महिला पुलिसकर्मियों से बातचीत की, उन्होंने खुल कर अपने दिल की बात कही। इसके कारणों को समझना मुश्किल नहीं है। यह सिर्फ किसी एक राज्य की बात नहीं है। पिछले कई वर्षों से पूरे पुलिस विभाग को जेंडर सेन्सिटिव बनान की बात कही जा रही है। कुछ साल पहले महिला आयोग ने विभाग में महिलाओं की स्थिति पर सर्वेक्षण कराये थे। उन्होंने वर्ष 2003 के महिला पुलिस कर्मियों के आंकड़े पेश करते हुए कहा था कि पूरे देश में इनका अनुपात अलग-अलग राज्यों में 4 से 10 प्रतिशत है। पुलिस स्टेशनों में अलग महिला शौचालय तथा ड्रेस चेंजिंग रूम के अभाव का सवाल भी लगातार उठा है। महिला पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के सवाल पर समाज के साथ खुद विभाग का अपना दामन भी साफ नहीं है। गत वर्ष महिला आयोग ने पुलिस द्वारा छेडख़ानी के जो मामले थानों में दर्ज हैं, उनका ब्यौरा पेश किया था। ये आंकडें राज्यवार थे। जैसे 2008 में दिल्ली में 57, उत्तर प्रदेश में 264, उत्तराखण्ड में 8, बिहार में 15, राजस्थान में 30 तथा हरियाणा में 25 था। वर्ष 2007 में दिल्ली में 22, उत्तर प्रदेश में 153, उत्तराखण्ड में 5, बिहार में 8, राजस्थान में 23 तथा हरियाणा में 5 थे। वर्ष 2006 के आंकड़े भी इनसे मिलते-जुलते थे। कुछ समय पहले मुंबई में महिला पुलिसकर्मियों की एक कार्यशाला में महिलाओं ने बताया था कि कैसे उनके पुरुष सहकर्मियों के व्यवहार उनके लिए अपमानजनक और असंवेदनशील होते हैं। उनके मुताबिक पुरुष पुलिसवाले उनके सामने ही बेझिझक कपड़े बदलने लगते हैं, जिससे वे असहज महसूस करती हैं। उनकी भाषा गालियों से भरी होती है। इस कार्यशाला में महिलाओं ने यह भी उजागर किया कि किस तरह अपने वरिष्ठों को ‘खुश’ न करन के कारण उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया गया है। कई साल पहले ‘पुलिस में महिलाएं’ विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार दिल्ली में आयोजित हुआ था। इसमें एक सर्वे पेपर पेश किया गया था, जिसमें उच्चस्तरीय पदों से लेकर पुलिस विभाग के छोटे पदों की महिला कर्मचारियों की स्थिति पर प्रकाश डाला गया था। इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक विभाग में कार्यरत महिलाएं स्वयं को हाशिए पर महसूस करती हैं, अपने पुरुष सहकर्मियों द्वारा भेदभाव की शिकार भी होती है। यह सर्वे नीपा के प्रोफेसर जया इन्दरसन के नेतृत्व में किया गया था, जो 24 राज्यों के 50महिला पुलिस अधिकारियों तथा कॉन्स्टेबलों से पूछताछ पर आधारित था। इस कांफ्रेंस की अध्यक्षता किरण बेदी न की थी और उन्होंने कहा था कि बतौर आईपीएस अधिकारी वे इस सर्वे रिपोर्ट का पूरी तरह से समर्थन करती हैं। इसका एक उदाहरण पिछले दिनों जयपुर में सम्पन्न हुई एक कार्यशाला में भी दिखा। राजस्थान पुलिस तथा एमआईटी (मैसेच्युएट्स इन्स्टिटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी, अमेरिका) के तीन साल के एक संयुक्त प्रोजेक्ट के समापन के अवसर पर इस कार्यशाला का आयोजन किया गया था। इस प्रोजेक्ट को शुरू करन के पहले किए गए सर्वे में यह बात उभर कर आयी थी कि पुलिस की छवि जनता के बीच भ्रष्ट तथा आलसी और निकम्मी आदि की है, जबकि पुलिस की राय में विभाग पर काम का दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप आदि समस्या थी। इस पूरे अध्ययनसुधार के प्रयास में भी, खासतौर पर राजस्थान जैसे राज्य में जहां महिलाओं के खिलाफ हिंसा का ग्राफ ऊंचा होता है तथा खुद पुलिस विभाग इससे अछूता नहीं है, विभाग की महिला पुलिस का मुद्दा शामिल नहीं हुआ। किसी राज्य में कम तथा किसी राज्य में अधिक लकिन मोटे तौर पर पूरे देश में पुलिस विभाग घोर पुरुषवादी तंत्र है। वहां का पूरा माहौल महिलाओं के लिए असुविधाजनक तथा तनाव में रहन के लिए बाध्य करनेवाला होता है। वैसे तो सभी कार्यस्थलों पर जेण्डर गैरबराबरी को खत्म करने तथा जेण्डर संवेदनशीलता बनान की बात होती रही है, लकिन पुलिस विभाग में इस मामलें में अधिक खराब स्थिति दिखती है। एक ऐसे समय में यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, जब सार्वजनिक दायरे में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है तथा सार्वजनिक और निजी दोनों ही दायरों में महिलाओं के खिलाफ होने वाला अपराध एजेंडा पर आया है। इन अपराधों के खिलाफ पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। क्या पुलिस विभाग अपनी मर्दानगी से मुक्त होन के लिए तैयार है?ड्ढr ड्ढr ड्डठ्ठद्भड्डद्यन्.ह्यन्ठ्ठद्धड्ड१ ञ्चद्दद्वड्डन्द्य.ष्oद्व लेखिका स्त्री अधिकार संगठन से सम्बद्ध हैं।

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