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आपराधिक मामलों में अदालतें रख सकती हैं निगरानी

आपराधिक मामलों में अदालतें रख सकती हैं निगरानी

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि यदि यह पाया जाता है कि प्रभावशाली लोग न्याय को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं तो उच्च अदालतें आपराधिक मामलों की जांच प्रगति पर निगरानी रख सकती हैं।

न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर और न्यायमूर्ति सीरियक जोसेफ की पीठ ने आपराधिक मामले में कुछ आरोपियों के इस तर्क को खारिज कर दिया कि अदालतों को जांच पर निगरानी रखने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है, क्योंकि यह जांच एजेंसियों की भूमिका को छीन लेने के समान है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालतें, खासकर उच्च और उच्चतम न्यायालय न्याय के प्रहरी हैं और उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक समीक्षा तथा निगरानी की असाधारण शक्तितयां प्राप्त हैं कि नागरिकों के अधिकारों की सही तरह से रक्षा हो पा रही है या नहीं।

पीठ ने एक अपील को खारिज करते हुए कहा कि इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि उचित मामलों में अदालतें उस स्थिति में जांच पर निगरानी रख सकती हैं, जब ऐसी कोई आशंका हो कि जांच सही ढंग से नहीं हो रही है या उसे कुछ लोगों द्वारा प्रभावित किया जा रहा है।

न्यायालय ने यह व्यवस्था उस अपील पर सुनवाई करते हुए दी, जिसमें आरोपियों ने गुजरात उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ जांच पर निगरानी रखने का आदेश दिया गया था।

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