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आइपीएल पर बेचैनी का राज

मैदान में होने वाले घमासान से पहले इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) के आयोजन को लेकर सरकार, राजनीतिक दलों, क्रिकेट बोर्ड और मीडिया कम्पनियों के अंदर-बाहर घमासान मचा हुआ है। मुद्दा यह है कि आतंकवादी हमलों की आशंका को देखते हुए आम चुनावों के दौरान सुरक्षा के मद्देनजर आइपीएल का आयोजन हो या नहीं? आयोजन का विरोध कर रहे गृहमंत्रालय और अन्य सुरक्षा एजेंसियों का तर्क है कि चुनावों के दौरान सुरक्षा बलों की व्यस्तता को देखते हुए आइपीएल मैचों के लिए प्र्याप्त सुरक्षा मुहैया कराना संभव नहीं होगा। दूसरी ओर, आइपीएल के आयाजकों का कहना है कि वे मतदान तिथियों और चुनाव क्षेत्रों को ध्यान में रखकर मैच की तिथियां तय करने और कुछ संवेदनशील शहरों के बजाय वैकल्पिक शहरों में मैच करान के लिए तैयार हैं। उनका यह भी तर्क है कि सुरक्षा कारणों और आतंकवादी हमलों के डर से मैच टालन का गलत संदेश जाएगा और ऐसा लगेगा जैसे देश ने आतंकवादियों के आगे घुटने टेक दिए हैं। इतना अधिक संवेदनशील मामला सुलझन के बजाय न सिर्फ उलझता और खिंचता चला जा रहा है, बल्कि दोनों पक्षों की मूंछ की इस लड़ाई में वह अम्पायर यानी मीडिया भी कूद पड़ा है, जिससे निष्पक्षता की उम्मीद की जा रही थी। इसमें कोई बुराई नहीं है कि किसी मीडिया समूह की आइपीएल को कराने या टालन को लेकर अपनी राय हो। लकिन अगर कुछ मीडिया समूह अपनी राय के पक्ष में अभियान चलाने लगें और उस अभियान के पीछे उनके आर्थिक हित भी जुड़े हों तो मीडिया की नैतिकता से जुड़े सवाल खड़े होने लगते हैं। उस स्थिति में मीडिया रिपोटरें की विश्वसनीयता के साथ-साथ उसकी संपादकीय राय की पवित्रता भी संदेहों के घेरे में आ जाती है। ये सवाल इसलिए गंभीर हैं कि समाचार मीडिया किसी मुद्दे पर जनमत बनाने या बिगाड़ने में महवपूर्ण भूमिका निभाता है। वह अपनी रिपोटरें और राय से एजेंडा निर्धारित करता है और किसी मुद्दे पर चल रही बहस का दायरा और उसके बिंदु भी तय करता है। इस कारण उससे अपेक्षा की जाती है कि किसी मुद्देघटनासमस्या पर उसकी रिपोर्टिंग और संपादकीय विचार निष्पक्ष, संतुलित और वस्तुनिष्ठ रहेंगे। लेकिन आइपीएल के आयोजन के सवाल पर कई मीडिया समूहों का रुख-विरोध या समर्थन- उनके व्यावसायिक हितों और संबंधों के आधार पर तय हो रहा है। यहां तक कि कुछ मीडिया समूहों के मामले में तो यह हितों के टकराव (कंफ्लिक्ट ऑफ इंटेरेस्ट) का मामला भी दिखता है। आइपीएल को लेकर कई बड़े मीडिया समूहों का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। आइपीएल सिर्फ एक क्रिकेट लीग भर नहीं है। वह हजारों करोड़ रुपए का खेल है। कई मीडिया समूहों के लिए यह जीने-मरन की लड़ाई है, खासकर इस आर्थिक मंदी के दौर में। जाहिर है कि वे आयोजन को किसी भी कीमत पर करवान के लिए हर तौर-तरीका अपना रहे हैं। इसके लिए वे राजनीतिक लॉबीइंग से लेकर समाचार मीडिया में अनुकूल पीआर स्टोरीज करवाने तक हर दांव आजमा रहे हैं। दूसरी ओर, यह भी सच है कि कुछ मीडिया समूह आइपीएल से व्यावसायिक प्रतिस्र्पा के कारण उसे न होने देने या टालन के अभियान में जुटे हुए हैं। यह मीडिया पार्टनर का जमाना है। पिछल कुछ वर्षों में छोटे-बड़े आयोजनों से लेकर कई उत्पादों और सेवाओं के लांच के लिए मीडिया पार्टनर बनान का चलन सा शुरू हो गया है। समाचार मीडिया समूहों के लिए यह राजस्व बढ़ान का एक ऐसा जरिया बन गया है, जिसमें निर्माता कम्पनियों को अनुकूल प्रचार मिल जाता है और मीडिया कम्पनी को राजस्व। लकिन मीडिया पार्टनर की इस मार्केटिंग रणनीति के साथ नैतिक समस्या यह है कि वह अखबार या समाचार चैनल की खबरों और राय को भी परोक्ष-अपरोक्ष तरीके से प्रभावित करने लगता है। समाचार मीडिया समूहों पर अपने मीडिया पार्टनरों के अनुकूल और सकारात्मक रिपोर्टिंग का दबाव बहुत बढ़ जाता है। यही कारण है कि मीडिया पार्टनरों के इस जमाने में समाचार मीडिया समूहों को अपनी संपादकीय स्वतंत्रता और विवेक के साथ समझौता करन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। आइपीएल प्रसंग भी इस प्रवृति का ही उदाहरण है। एक निरंतर बड़ी होती पीआर इंडस्ट्री के साथ इस तरह के परोक्ष-अपरोक्ष गठजोड़ और व्यावसायिक संबंध न सिर्फ बढ़ रहे हैं बल्कि समाचार मीडिया की संपादकीय स्वतंत्रता के दायरे को सीमित करते जा रहे हैं। जाहिर है कि इसका असर उनके कंटेंट पर पड़ रहा है। मीडिया आइपीएल करान को लेकर इतना बेचैन क्यों है? क्या मीडिया को लोकतंत्र और चुनावों से अधिक जरूरी आइपीएल इसलिए लग रहा है क्योंकि राजनीति के प्रति उसकी चिढ़ और क्रिकेट के प्रति अतिरिक्त प्यार का संबंध टीआरपी रेटिंग और सकरुलेशन से भी है? लकिन लोकतंत्र और चुनावों की कीमत पर आईपीएल करान का सौदा देश को बहुत भारी पड़ सकता है।

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