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साहित्य का इमोशनल अत्याचार

सावधान राजनीति! री पुंश्चली राजनीति! तुझ पर साहित्य कुपित है और अब अपना इमोशनल अत्याचार शुरू करने वाला है। ऐसा अत्याचार रिस्की है। पुरानी कहानी में धोबी के गर्दभराज ने जब घर के वफादार होन का इमोशनल अत्याचार अभिव्यक्त किया तो इनाम में खुद ही मार खाई। लेकिन इमोशनल खेल खेलने वाले ऐसी मार की परवाह कहां करते हैं? साहित्यकार मनुष्य होता है। दुनिया उस पर इमोशनल अत्याचार करती है तो पलट कर वह वार करता है। इतिहास ने उसे ‘इमोशनल अत्याचार’ करन का हक दिया है। इसके लिए अक्सर वह अपनी ‘भूमिका’ के बारे में सोचता रहता है। भूमिका के बारे में सोचना ‘इमोशनल अत्याचार’ की पहली सीढ़ी है। हिंदी साहित्य की सारे इमोशनल अत्याचार यहीं कहीं से से शुरू हुए। तारसप्तक के कवि भूमिका की तलाश कहानी की ‘सुई ढूंढने वाली बुढ़िया’ की तरह करत -करते एक दिन अचानक आर्किमिडीज की तरह युरेका कह उठे: कह उठे कि हम ‘नई राहों के अन्वेषी’ हैं हमें अन्वेषण करने दो। नेहरू को कांग्रेस को चुनाव लड़ने दो। उसके विपक्ष को उससे लड़ने दो। राजनीति से जरा स्वायत्त रहकर हम अभी साहित्य का रोडमैप बना रहे हैं, बनाने दो! इस रोडमैप को नेहरू ने सीरियसली लेन की ऐतिहासिक गलती कर दी। अकादमी बनवा दी। समस्त अन्वेषित नई राहें अकादमी के मंडी हाउस वाले सात सड़क वाले सतराहे की ओर मुड़ गईं! इनदिनों साहित्य वहां ‘पंजी दस्सी’ की इमोशनल राजनीति करता बिजी रहता है। अति-राजनीति ने साहित्य के जिगर में इमोशनल आग भर दी है। ‘जिगर मां बड़ी आग है’ के कवि गुलजार आज ऑस्कर से सम्मानित गीतकार हो गए हैं। इतिहास गवाह है कि नेहरू को साहित्यकारों ने किसी तरह झेला। लोहिया को भी झेला। वे तो दिल्ली के कॉफी हाउस में बैठ-बैठ एंटी नेहरू लग्गी लगाते रहे कि साहित्यकारो! जिंदा कौमें पाच साल इंतजार नहीं करती हैं। लेकिन साहित्य ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘चार दिल चार राहें’ फिल्म के गान की तर्ज पर गाता रहा :‘इंतजार और अभी, और अभी, और अभी।’ एक दिवस चिर विपक्षी से लगने वाले श्रीकांत वर्मा ने पक्षी बन कर इंदिरा गांधी को महाकविता लिखकर दी कि ‘गरीबी हटाओ’ तो साहित्यकारों को बड़ा बुरा लगा। सारे श्रीकांत के दुश्मन हो उठे, ़श्रीकांत इंदिरा जी के प्रिय हो उठे। बाकी सब जलने लगे। वे राज्यसभा में आ गए। बाकी सब बीमार पड़ कर अपना फ्री इलाज कराने उनकी रिकमंडेशन के लिए बारी-बारी उनके यहां आने-जाने लगे! यह साहित्य और राजनीति का ‘फुल्टू लिपसिंक’ था। नई राहें सिंक में थी। विचारधारा ईष्र्या नामक मनोभाव से मिक्स हो गई। श्रीकांत वर्मा बिक गया है, सत्ता का दलाल हो गया, हमें देखो, हम विपक्ष में ही हैं। असली सच विपक्षी होता है। गहन आत्मसंघर्ष कहता रहता : हाय! मुए श्रीकंतवा की जगह हम क्यों न हुए जी! इसके बाद का साहित्य ‘छले गए’ का साहित्य है। साहित्य ने जब-जब राजनीति के साथ अपनी पींगें बढ़ाई, अपन को छला हुआ ही पाया। तो भइए इस नित्य छल से छलछलायमान समय में साहित्यकार सोचते हैं कि आसन्न लोकसभा चुनाव में अपनी कलगी अपने र्तुे सहित सौ फीसदी पतित राजनीति के अतिचार को ठीक करने वे अपने नागरिक कर्तव्य का निर्वाह करें तो इस अनधिकार चेष्टा के लिए हम उनकी हिम्मत की प्रशंसा ही करेंगे! इसे ‘साहित्य का राजनीति पर इमोशनल अत्याचार’ का जबावी हमला कहा जा सकता है। सहयात्री होन के नाते ऐसे संघर्षमय दौर के लिए एक दम फ्री छह सूत्री एक्शन प्लान का प्रस्ताव करते हैं:ड्ढr 1- हिंदी साहित्यकार मंडी हाउस स्थित अकादमी के प्रांगण में एकत्र हों और अपनी कविताओं, कहानियों की बत्ती जलाएं।ड्ढr 2-जब तक अपनी सरकार ही न बन जाए, तब तक कविता, कहानी लिखने से असहयोग करें।ड्ढr 3- कोई साहित्यकार गाड़ी से मंडी हाउस न आए जो आए सो घर से पैदल आए या ब्लू लाइन में लटकता आए। सारे चैनलों को बताया जाए कि ये सदरपुर से, य कालका जी से, ये ग्रीनपार्क से, ये जमुनापर से, ये वसुंधरा से, ये मयूर विहार से इस वक्त चल पड़ा है। आज साहित्य हस्तक्षेप करने वाला है। यही अपन लौंग मार्च है।ड्ढr 4-सब मिलकर ‘सब कुछ के खिलाफ सब कुछ के लिए’ नामक घोषणा पत्र जारी करें।ड्ढr 5- जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो, फटे हुए कपड़े पहनें। जूत की जगह वीशेप की रेक्सोना हवाई चप्पलें रहें। बगल में कोई पुराना रेडिकल सा दिखने वाला खादी का झोला रहे और दाढ़ी आदि न बनाई जाए। यह मोरचा लेन का तकाजा है।ड्ढr 6- हाथ में खाली बोतल हो। उसे बजाएं और कहें मनमोहन तेरे राज में लेखक प्यासा मरता है। यही नारा हो। पोस्टर कहे : सावधान! साहित्यकार पहली बार ‘अपना मोरचा’ बनान की ओर आ रहा है। नजर न लगे। कथाकार काशीनाथ ने सत्तर के दशक में ‘अपना मोरचा’ लिखा था। लगता है कि पहले मोरचे दूसरे मोरचे तीसरे मोरचे और चौथे मोरचे पांचवे मोरचे इत्यादि का आइडिया उसी उपन्यास से मारा गया है। यह साहित्य का राजनीति पर इमोशनल अत्याचार है! मोरच को शुभकामना देते हुए हम साहित्य की इस इमोशनल अत्याचारवादी ‘बिथा कथा’ यहीं समाप्त करते हैं।

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