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एक सदी बाद फिर दिखा घोंसला बनाने वाला मेंढक

एक सदी बाद फिर दिखा घोंसला बनाने वाला मेंढक

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक वैज्ञानिक ने पश्चिमी घाट में पेड़ पर रहने वाले मेंढक का पता लगाने का दावा किया है, जो परभक्षियों से अपने अंडों की हिफाजत करने के लिए एक ही पत्ते से अपना घोंसला भी बनाता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इनवॉयरोंमेंटल स्ट्डीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक एसडी बीजू ने बताया कि पूरी दुनिया से इस तरह की यह पहली रिपोर्ट है और एशिया में इस तरह के मेंढक की यह एकमात्र प्रजाति है, जो कीटों और गर्मी से बचने के लिए घोंसला बनाता है।

राकोफोरस जटेरालिस प्रजाति के इस मेंढक को सिर्फ कर्नाटक और केरल के दक्षिण पश्चिमी घाट में पाया जाता है। ये मेंढक क्षुरमुट के पत्ते में अपने अंडे को रखते हैं, जिसे मादा मेंढक द्वारा दोनों ओर से मोड़ दिया जाता है।

बीजू के मुताबिक चमकीला हरा या हल्की लालिमा लिए हुए हरे रंग वाले ये विलुप्तप्राय प्रजाति के मेंढक हैं। इन्हें एक सदी के बाद फिर से खोज निकाला गया है।

यह अध्ययन करेंट साइंस के नए अंक में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन को वर्ष 2000 से 2005 के बीच केरल में वयनाड जिले के कलपेट्टा में किया गया।

इस मेंढक द्वारा अण्डनिक्षेपण और निषेचण की प्रक्रिया सिर्फ एक पत्ते पर होती है। वहीं, इसका घोंसला लगभग 53 से 80 मिमी लंबा और 28-64 मिमी चौड़ा होता है। इसमें एक साथ 43 से 72 अंडे समा जाते हैं।

अध्ययन में बताया गया है कि मादा मेंढक को एक घोंसला बनाने में 15 मिनट से आधे घंटे तक का समय लगता है।

 

 

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