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तस्वीरों के जरिए यादों की बारात

तस्वीरों के जरिए यादों की बारात

युवाओं और किशोरों को तस्वीरों से बेशुमार प्यार है। फोटो फन हैं। अगर सही कोण या दिशा से खींची जाए, तो डबल चिन यानी लटकती ठोड्डी, भारी बाजू, मोटा पेट या फिर चेहरे के दाग-धब्बे, मुंहासे तक गायब कर देती है। फेसबुक के विषय ग्लैमरस होते हैं। चमक-दमक, हंसते-गाते लोग, रंगीन माहौल और भी बहुत कुछ। और फेसबुक पर कोई कैसे मशहूर हो जाता है? रोज-रोज अपनी तस्वीरें पोस्ट करते-करते ही तो। फेसबुक हर क्षेत्र के और हर पेशे के युवाओं को बेहद लुभा रही है। बेशक नेटवर्किग हो या महज डेटिंग-युवा हर सूरत-ए-हाल में आंखें खुली रखते हैं।

नौजवान और कूल रहना फेसबुक का मंत्र है। हर पार्टी, हर मौके और हर इवेंट पर कई युवा डिजिटल कैमरों और कैमरा मोबाइलों के जरिए यहां-वहां से लम्हें कैद करते रहते हैं। और उसी रात तमाम तस्वीरों को फेसबुक पर अपलोड कर देते हैं। अगली सुबह रोशन होती है और कई नौजवान एकटक फेसबुक को निहारते हैं। और फिर, कमेंट्स और टिप्पणियों का दौर शुरू हो जाता है। फोटो में भद्दा दिखने वाला चेहरा उदास होता है और अगली पार्टी में बेहतर लगने की कोशिशों में जुट जाता है।

फेसबुक के साथ-साथ नौजवानों में फोटो एलबम का नया-नवेला रूप ‘स्क्रेप बुक’ का क्रेज बढ़ रहा है। आज नई जेनरेशन अपने जन्मदिन पर, मोबाइल या लैपटॉप नहीं चाह रही। न ही कपड़े, जूते और ज्वेलरी की तमन्ना है। सृजन अरोड़ा बीते दिसंबर को 18 साल की हुई हैं। बताती हैं, ‘मुझे मेरी मम्मी से ऐसा खुशनुमा गिफ्ट मिला है, जो मेरे दिल के एकदम करीब है। जानते हैं क्या? स्क्रेप बुक! उसमें कैद है मेरी जिंदगी के बीते 18 सालों के हसीन लम्हें।’

हालांकि तस्वीरों के माध्यम से इतिहास को संजोकर संभालना इंग्लैंड में 15वीं सदी से शुरू हुआ था। स्क्रेप बुक इसी कला का एक स्वरूप कह सकते हैं। चूंकि आज फेसबुक, फोटो एलबमों और ई-क्राइम के दौर में स्क्रेप बुक बनाना आउट ऑफ डेट होता गया है। हाल के सालों में, बाकायदा दुकानों पर आपकी तस्वीरों की यादों को यादगार बनाकर पुराने तौर-तरीके से पेश किए जाने लगे हैं। असल में, यह ढेरों अलग-अलग तस्वीरों को एक साथ एक थीम में संजोने की कला ही है।

किशोर और युवा स्क्रेप बुक्स को खूब पसंद कर रहे हैं। 20 वर्षीया माधवी बत्तरा कहती हैं, ‘ऑनलाइन फोटोग्राफ्स से कहीं ज्यादा मजा स्क्रेप बुक देखने में आता है। स्क्रेप बुक के पन्ने पलटते-पलटते गुजरे जमाने में लौटना दिलचस्प अनुभव है। जबकि ऑनलाइन के वक्त हमारी सारी तवज्जो माउस पर जमती है।’

स्क्रेप बुक्स ही नहीं, किशोर-युवा मन को वॉल कोलाज भी भा रहे हैं। मेट्रो सिटीज में, बाकायदा क्रिएटिव कीपर शॉप्स खुल गई हैं या खुल रही हैं, जो कोलाज, फोटो एलबम और मेमोरी जनरल बनाने में मदद करती हैं। इसको बनाने में बेशक काफी मेहनत और काफी समय खर्च होता है, लेकिन किसी करीबी के लिए यादगार और बेजोड़ गिफ्ट है।

शेफानी कुलकर्णी मानती हैं, ‘तमाम कीमती गिफ्टों के अम्बार से मैंने स्क्रेप बुक ही चुनी। मेरी मम्मी ने खासतौर से मेरे लिए बनवाई है। कुल पेज हैं 18 और हर फोटो के नीचे कैप्शन है। मिसाल के तौर पर, जब पहला कदम चली, पहला जन्मदिन, स्कूल का पहला रोज, छुट्टियों की मस्ती वगैरह। और भी कई तस्वीरें हैं-मेरी मालिश करती दादी, मेरा पहला डॉक्टर वगैरह।’ उधर, शेफाली की मां अनुराधा का कहना है, ‘हम और मेरी बेटी कम्प्यूटर के दीवाने नहीं हैं। और फिर, मैं अपनी बेटी से अपनी तरह से प्यार का इजहार करना चाहती थी।’

गिफ्ट शॉप्स के मालिकों का कहना है कि तस्वीरों की जिंदगी साधारण एलबम में गुम हो जाती है। इसीलिए स्क्रेप बुक बेहतर विकल्प है। इसमें यहां-वहां सिनेमा में देखी पहली फिल्म का टिकट या पहली हवाई यात्रा का टिकट तक संग्रहीत किया जा सकता है। बच्चों के जन्म के अस्पताल का नेम टैक तक चिपकाते हैं। आमतौर पर दम्पत्ति अपनी सिल्वर जुबली सालगिरह पर कोलाज के सहारे अपने 25 सालों के हसीन लम्हों का गुलदस्ता पार्टी में पेश करते हैं। बीचों-बीच में, पहली डेट पर दिया रेस्तरां का बिल तक शो केस में सजाते हैं, ताकि देखने वाला अंदाजा लगा सके कि 25 साल पहले का दौर कितना सस्ता था? यही नहीं, स्क्रेप बुक पर बेटी या बेटे की पहली फ्रॉक या ड्रेस तक संजोई जाती हैं।

कुछ तो नए साल के टेबल कैलेंडर के महीनेवार हर पन्ने पर गुजरी हसीन यादों को लगा कर, तरोताजा रहते हैं। शो-पीस के साथ-साथ बेहद एनर्जी यानी ऊर्जा का स्त्रोत होते हैं ऐसे यादगार कैलेंडर। साल गुजरने के बावजूद फेंकने की बजाए, इसको संभाल कर रखने को हर दिल करता है।

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