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अगर मुकेश आवाज थे, तो राजकपूर के शब्द थे शैलेंद्र

अगर मुकेश आवाज थे, तो राजकपूर के शब्द थे शैलेंद्र

अगर गायक मुकेश राजकपूर की आवाज थे तो गीतकार शैलेंद्र उनके शब्द थे। शैलेंद्र ने राजकूपर, मुकेश, संगीतकार शंकर-जयकिशन के साथ अटूट जोड़ी बनाई और फिल्मी दुनिया में क्रांतिकारी भूमिका निभाई।

जन्म: फिल्मी दुनिया के प्रसिद्घ गीतकार शैलेन्द्र का जन्म 30 अगस्त, 1923 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) के एक परिवार में हुआ। उनका पूरा नाम शंकरदास केसरी लाल शैलेन्द्र था, जो फिल्मी दुनिया में ‘‘शैलेन्द्र’’ के नाम से लोकप्रिय हुए।  उनके पिता केसरी लाल मूलत: बिहार से संबंध रखते थे। शैलेंद्र अपने चारों भाईयों में सबसे बड़े बेटे थे। बचपन में ही शैलेंद्र परिवार सहित मथुरा (उ.प्र.) में आ गए। आगरा से शैलेंद्र ने इलैक्ट्रीकल डिप्लोमा किया। इसी दौरान शैलेंद्र की मुलाकात शकुन से हुई और उनसे प्यार हो गया। बाद में उन्हीं से शादी कर ली।

परिवार में बड़े होने के नाते शैलेंद्र ने विषम परिस्थितियों को झेला। जब शैलेंद्र की मां पार्वती देवी बहुत बीमार थी, तो शैलेंद्र नंगे पैर और तपती धूप में उनके स्वास्थ्य के लिए मंदिरों में भटकते रहे। लेकिन अंतत: उनका देहांत हो गया। इससे शैलेंद्र गहरा सदमा लगा।
 
अंधविश्वास और पाखंडवाद से निकलकर शैलेंद्र नास्तिक बन गए। शुरुआत में शैलेंद्र रेलवे में काम करते थे, 1947 में उनका ट्रांसफर मुंबई में हो गया। इस दौरान आजादी की लड़ाई चरमसीमा पर थी। उन्हें रेलवे की नौकरी सूट नहीं कर रही थी, लेकिन नौकरी के अलावा कमाई को कोई साधन भी तो नहीं था।

शैलेंद्र के अंदर एक साहित्यकार छुपा हुआ था, जो बार-बार उन्हें साहित्य के क्षेत्र में जाने के लिए प्रेरित कर रहा था। शैलेंद्र रेलवे वर्कशॉप में कठोर परिश्रम करने के साथ-साथ कविताएं और गाने लिखकर अपने अंदर के साहित्यकार को बाहर निकालने का प्रयास कर रहे थे। शैलेंद्र की रचनाओं को सुनकर उनके साथी भी उन्हें बार-बार रेलवे की नौकरी की बजाए लेखन के क्षेत्र में जाने के लिए प्रेरित करते थे।

कैसे बने गीतकार: एक बार शैलेंद्र ने आजादी के दीवानों के बीच एक कार्यक्रम में ‘जलता है पंजाब’ नाम का गाना सुनाया, जिसे सुनकर वहां मौजूद लोगों में काफी जोश आ गया। इसी भीड़ में फिल्म अभिनेता और निर्देशक राज कपूर भी मौजूद थे। उनकी योग्यता और गीत लिखने की शैली से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शैलेन्द्र को अपनी फिल्मों के लिए गीत लिखने का ऑफर दे दिया। लेकिन उन्होंने ये ऑफर स्वीकार नहीं किया। वे कहते थे कि उनके गीत बिकने के लिए नहीं हैं। लेकिन जब उनके पहले बेटे शैली ने जन्म लिया तो पैसे की तंगी के चलते उन्होंने राजकूपर से संपर्क किया और फिल्मों में गाने लिखने की अपनी सहमति दे दी।

शैलेंद्र ने 1948 में बनी फिल्म 'आग' के गाने लिखे और इसका म्यूजिक काफी हिट रहा। शैलेन्द्र ने पहली बार 500 रुपए में 1949 में बनी फिल्म बरसात में केवल दो गाने- ‘पतली कमर है’ और ‘बरसात में’- लिखे। इसके बाद लगातार उनके लिखे गाने हिट होते रहे। राजकपूर की फिल्मी दुनिया में बेहतर छवि बनाने में शैलेन्द्र का भी अहम योगदान है। ये बात खुद राजकपूर भी मान चुके हैं। इसके बाद अभिनेता राजकूपर, गायक मुकेश, संगीतकार शंकर-जयकिशन और गीतकार शैलेन्द्र की अटूट जोड़ी  ने फिल्मी दुनिया में क्रांतिकारी भूमिका निभाई।

करियर: प्रगतिशील संवेदना के संवाहक गीतकार शैलेन्द्र ने अपने गीतों के माध्यम से भारत की छवि को दुनिया में उभारने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने 171 हिन्दी फिल्मों एवं 6 भोजपुरी फिल्मों में लगभग 800 फिल्मी गीत लिखे, जिनमें प्रमुख हैं ‘आवारा’, ‘दो बीघा जमींन’, ‘श्री 420’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, सीमा’, ‘मधुमती’, ‘जागते रहो’, ‘गाइड’, ‘बूट पॉलिश’, ‘यहूदी’, ‘अनाड़ी’,‘पतिता’,‘दाग’, ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’, ‘बंदिनी’, ‘गुमनाम’ और ‘तीसरी कसम’ आदि फिल्में शामिल हैं।

उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के लिए भी गाने भी लिखे। बिहार और उत्तर प्रदेश की कला-संस्कृति और यहां की लोकसंगीत की अच्छी पकड़ उनके गीतों में देखी जा सकती है। उनके लिखे ‘ चढ़ गयो पापी बिच्छुआ’, ‘सजनवा बैरी हो गए हमार’ आदि मधुर गीतों को सुनकर मन आज भी डोल उठता है।

गीतकार शैलेंद्र ने फिल्म ‘नया घर’, ‘बूट पॉलिश’, ‘श्री 420’ और ‘मुसाफिर’ में अभिनय भी किया था। इतना ही नहीं उन्होंने फिल्म ‘परख’ के लिए संवाद भी लिखे थे।

गीतों के माध्यम से शैलेंद्र ने दुनिया में भारत की जिस छवि को उजागर किया, यह उनकी भारत के प्रति निष्ठा और समर्पण को ही दर्शाता है। फिल्म श्री 420 में ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून है इंगिलिश्तानी, सिर पर लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’ जैसा गाना लिखकर उन्होंने देश का गौरव ही बढ़ाया। उनके एक-एक गीत में कोई न कोई संदेश था, जो मानवता, देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत होता था। एक प्रकार से वे अपने युग की सषक्त आवाज थे। आज के दौर में शैलेन्द्र जैसे गीतकारों की कमी अखरती है। फिल्म अभिनेता राजकपूर ने साफ कहा था- ‘ शैलेन्द्र के हर गीत में कुछ न कुछ विचार, दर्शन और भावनात्मक तीव्रता थी।’

आखिरी दिन: शैलेंद्र कवि, गीतकार, एक अभिनेता, संवाद लेखक और फिल्म निर्माता भी रहे हैं। अपनी पहली हिन्दी फिल्म ‘तीसरी कसम’ के निर्माता एवं गीतकार वे स्वयं ही थे। 1966 में बनी यह फिल्म शैलेंद्र की आखिरी फिल्म भी साबित हुई। शैलेंद्र ने इस फिल्म के निर्माण में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था। ऊंची दर पर रुपए उधार लिए। लेकिन फिर भी यह फिल्म समय पर पूरी नहीं हो सकी, क्योंकि अभिनेता राजकपूर अपनी फिल्म संगम और अन्य फिल्मों में व्यस्त थे। अंतत: उन्होंने इस फिल्म के लिए समय निकाला। उन्होंने इस फिल्म में काम करने के लिए मात्र एक रुपया ही लिया, क्योंकि शैलेंद्र उनके प्रिय मित्रों में से एक थे।

जब यह फिल्म बनकर तैयार हुई तो इसके प्रीमियर शो को शैलेन्द्र ने नहीं देखा। किसी ने उन्हें बताया कि यह फिल्म पूरी तरह से फ्लॉप हो गई है, तो शैलेंद्र इसे सहन नहीं कर सके। उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 14 दिसंबर,1966 को शैलेंद्र ने इस दुनिया को सदा-सदा के लिए छोड़ दिया। क्या संयोग था कि उस दिन फिल्म अभिनेता राजकपूर का भी जन्म दिन था।  शैलेंद्र के देहांत के बाद यह फिल्म सुपरहिट हुई, जिसे बाद में राष्ट्रपति के स्वर्णपदक से भी सम्मानित किया गया।

शैलेंद्र को 1958 में बनी फिल्म यहूदी के गीत ‘ ये मेरा दीवानापन है’, फिल्म 1959 में बनी ‘अनाड़ी’ के गाने ‘सबकुछ सीखा हमने’ और 1968 में बनी फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ के गीत ‘मैं गाऊं तुम सो जाओ’ के लिए ‘फिल्म फेयर अवार्ड’  से सम्मानित किया गया।

शैलेंद्र का परिवार: शैलेंद्र के परिवार में पत्नी शकुन शैलेन्द्र, बेटा शैली शैलेन्द्र उर्फ मंटू, मनोज शैलेन्द्र उर्फ बबलू हैं। शैली शैलेन्द्र भी एक गीतकार और गायक हैं। शैलेन्द्र ने फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के लिए एक गीत की केवल दो लाइनें ‘जीना यहां, मरना यहां’ लिखी लेकिन वो इसे पूरा नहीं कर सके और बीच में ही इस दुनिया को छोड़कर चले गए। इस गाने को उनके बेटे शैली शैलेन्द्र ने पूरा करते हुए अपने पिता के अधूरे ख्वाब को बखूबी पूरा किया।

गीतकार शैलेन्द्र ने अपने मान-सम्मान के लिए कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने गरीबी और अमीरी को काफी नजदीकी से देखा। उनके अंदर विषम परिस्थितियों में भी काम करने की गजब की क्षमता थी। एक बार की बात है कि जब उनके प्रेम विवाह के बाद पत्नी शकुन शैलेन्द्र उनके घर आई तो उन्होंने देखा कि वे अपने साथ बहुत सारे कीमती कपड़े, जेवर तथा अन्य सामान लेकर आईं है, तो यह देखकर वे अपनी पत्नी से बोले, ‘‘देखो, तुम यह सब पहनकर हमारे साथ चलोगी तो यह सब तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा। यह सब अभी छोड़ो। जब हम इस लायक हो जाएंगे, तब हम तुम्हें कपड़े, जेवर खुदं पहनाएंगे।’’ उनकी पत्नी ने भी हमेशा उनका साथ दिया और ऐसे भी दिन आए कि उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।

कुछ किस्से: वे अपने बच्चों और पत्नी से बेहद प्यार करते थे। उन्होंने अपने बच्चों पर कभी हाथ नहीं उठाया। एक बार उनके बेटे मनोज शैलेन्द्र जब हाई स्कूल में थे, तो अपनी रिपोर्ट दिखाने उनके कमरे में गए। उन्होंने रिपोर्टकार्ड देखा तो नंबर काफी कम थे। इस पर वे अपने बेटे पर बहुत नाराज हुए। उन्होंने उन्हें मारने-पीटने की बजाए कहा कि ‘‘यह अच्छा नहीं है, आप हमारे कमरे से बाहर जाओ, हम तुमसे बात नहीं करेंगे।’’ यह उनके बेटे मनोज के लिए बहुत ही दर्दनाक घटना थी। वे उस दिन बहुत दु:खी थे और अंदर ही अंदर रो रहे थे। उन्हें एहसास हुआ कि ‘वे हमें दो थप्पड़ मार देते तो मुझे इतना दर्द नहीं होता। लेकिन यह मेरी पिटाई से भी गहरी चोट थी। मैं दोबारा उनके पास उनके कमरे में गया और मांफी मांगते हुए कहा कि मैं निश्चित रूप से सुधार करूंगा।’’ ऐसी घटनाओं से उनकी दयालुता, उनका प्यार और बच्चों के प्रति लगाव झलकता है।

दोस्त की नजर से शैलेंद्र: शैलेन्द्र जी एक दार्शनिक गीतकार थे। उनके गीतों में सहजता के साथ जीवन के सत्य को भी बखूबी देखा जा सकता है। उन्होंने अपनी बात को गीतों के माध्यम से ऐसे प्रस्तुत किया कि आमआदमी बड़ी आसानी से समझ सके। उनके मित्र फिल्म पत्रकार रामकृष्ण उनकी जिंदगी के बारे में लिखते हैं, ‘‘ वो उन दिनों के किस्से सुनाता जब पारेल मजदूर बस्ती के धुएं और सीलन से भरी गंदी कोठरी में अपने बाल-बच्चों को लेकर सपने देखा करता था, और इन दिनों के किस्से जब ‘रिमझिम’ जैसे शानदार मकान और एस्टिन कैम्ब्रिज जैसी लम्बी गाड़ी का स्वामी होने के बावजूद अपने बीते लम्हों की आग उसे शराब की प्यालियों से बुझानी पड़ती है।’’

शैलेन्द्र कहते थे, "रामकृष्ण, सच ही भूल नहीं पाता मैं, मानसिक शांति का संबंध लगता है धन-दौलत और ऐशोराम के साथ बिल्कुल नहीं है। बात न होती तो आज मुझे वह सकून, वह चैन क्यों नहीं मिल पाता। आखिर जो उस हालत में मुझे आसानी से नसीब था, आज जब मेरे पास वह सबकुछ है जिसकी तमन्ना कोई कर सकता है।"

प्रसिद्घ संगीतकार शंकर-जयकिशन के शंकर जी ने एक बार गीतकार शैलेन्द्र जी के बारे में कहा था कि ‘सच्ची और खरी बात कहना और सुनना शैलेन्द्र जी को अच्छा लगता था। कई बार गीत के बोलों को लेकर हम खूब झगड़ते थे। शैलेन्द्र जी एक सीधे-साधे आदमी थे, झूठ से उन्हें नफरत थी क्योंकि उनका विश्वास था कि ‘खुदा के पास जाना है।’ इसी लिए तो उन्होंने ‘सजन रे झूठ मत बोलो-खुदा के पास जाना है’ लिखा। आज भी यह गीत सुनकर लोगों के दिलो-दिमाग में हलचल पैदा होने लगती है।

आज शैलेंद्र हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनके गाने आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करते हैं।

 

 

 

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