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नेतृत्व परिवर्तन: कांग्रेस बनाम भाजपा, एक लघु शोध

पिछले दो सप्ताहों के दौरान भाजपा में जो कुछ घटता रहा, उसकी समीक्षा तुरंत और आसानी से नहीं की जा सकती। एक के बाद एक, विद्रोह के इतने स्वर फूटे हैं, इतने निष्कासन और कारण बताओ नोटिस और शिकायती पत्र बने, बँटे या खारिज हुए हैं, इतने बयानों पर पलटियाँ खाई गई हैं, कि सर भन्ना जाए। दलगत कुंठाओं का विरेचन कुछ इस तरह हुआ कि टी.वी. पर कांग्रेसी प्रवक्ता लगभग ब्रह्मानंद में लीन दिखाई दिए। सम्पादकों और विश्लेषकों के लिए ऐसे क्षण कलम उठा कर विश्लेषण करने के नहीं, बल्कि आकाशगंगा में विखंडित होते तारे के जैसे एक दुर्लभ ऐतिहासिक दृश्य को गौर से देखने समझने के होते हैं।
क्या वजह है कि जुमा-जुमा पाँच छ: माह पहले जो भाजपाई अपने पूर्व पार्टी अध्यक्ष को अगले प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पूरे जोशो-खरोश के साथ चुनाव में उतार कर कांग्रेसी उम्मीदवार को कमजोर और परमुखापेक्षी बता रहे थे, वे ही अब उनकी कुर्सी के नीचे पटाखे रख रहे हैं, और ऐसा वातावरण बना रहे हैं, मानों वे और वर्तमान पार्टी अध्यक्ष ही सबसे बड़े खलनायक हों। जब नाना कारणों से अटल बिहारी वाजपेयी ने वानप्रस्थ ग्रहण किया, तब यह सभी लोग बहुत खुश थे, और मान रहे थे कि भाजपा के सारे महत्वपूर्ण नेता अब आडवाणी के जिन्नामार्का प्रगतिशील तम्बू में आ गए हैं। लेकिन इस नई ऊर्जा का उपयोग उसने पार्टी के मूल एजेंडे को अधिक समन्वयवादी और प्रगतिशील बनाने के लिए क्यों नहीं किया? उल्टे चुनावों के दौरान प्रचार-कार्य में वरुण गाँधी जैसे उत्कट हिंदुत्ववाद के प्रवक्ता को क्यों झोंका गया? 

शिमला के ऐतिहासिक चिंतन शिविर की सबसे बड़ी खामी यह थी कि पार्टी के आगे चिंतन को लेकर कोई ईमानदार लक्ष्य नहीं थे। जसवंत सिंह को जिन्ना की प्रशंसा और पटेल की कथित निंदा के मद्देनजर दल से बाहर किया जाए, असली चुनौतियों के आगे एक काफी गौण और नकारात्मक लक्ष्य था। उससे दीर्घकाल या अल्पकाल में पार्टी का क्या बनना बिगड़ना था? पर चूंकि पार्टी का तंत्र नई तरह से गढ़ने का कोई ब्लू-प्रिंट राजनाथ सिंह और आडवाणी खेमे के पास नहीं था, इसलिए वर्तमान तंत्र को चुनौती देने वालों को ही हटा कर तंत्र को उजला और अनुशासित बनाने का भ्रम पैदा किया गया। जब बूढ़े लोग खुद पदत्याग की बजाए पार्टी के युवाकरण के नाम पर खुद को नापसंद अन्य बूढ़ों को क्रमश: बाहर करने के मंसूबे भिड़ाते दिख रहे हों, और बाहर खड़े पुराने पार्टी कार्यकर्ता, प्रचारक और समर्थक उन पर पत्थर फेंक रहे हों, तो एक बहुत शून्यवादी मानसिकता बनती है। यह भाजपा के लिए बेहद घातक है। अरुण शौरी ने बहुत जोर-शोर से माँग उठाई है कि शीर्ष नेतृत्व का झटके से सफाया कर रा.स्व.संघ आगे आए और पार्टी को नई शक्ल दे। ऐसे ध्रुवीकरण का विचार बुरा नहीं है, लेकिन लगता है संघ यह मन बना चुका है कि सक्रिय दलगत राजनीति चलाना कोयले की कोठरी में जाने जैसा है। लिहाजा भाजपा को सुधारने की बजाए दूर से उसके नेताओं की कुछ मदद भर की जा सकती है।

भाजपा के वर्तमान संकट के बीज दरअसल उस वक्त बो दिए गए थे, जब वाजपेयी और आडवाणी के बीच एक सर्वमान्य उत्तराधिकारी-चयन का मामला अनसुलझ ही छूट गया। पार्टी 2004 में भी हारी थी। पर उस वक्त वह नहीं टूटी, क्योंकि तब एक सर्वमान्य और कद्दावर नेता के रूप में अटल जी मौजूद थे। वाजपेयी जी के परिदृश्य से हटने के बाद जब 2009 के चुनावों में पार्टी को भारी शिकस्त मिली, तो आडवाणी के इस्तीफे की पेशकश के बावजूद उन्हें हटाने के सवाल पर शीर्ष नेताओं की एक अस्तित्ववादी किस्म की हिचकिचाहट पार्टी को ले डूबी। यहाँ कांग्रेस भाजपा से बीस निकली है। पार्टियों में सहजता से शीर्ष नेतृत्व परिवर्तन बहुत जरूरी है। 1951 में पुरुषोत्तमदास टंडन कांग्रेस अध्यक्ष थे, जिनको नेहरू के साथ उत्कट मतभेदों ने पदत्याग को मजबूर किया। किसी कांग्रेसी ने इसको लेकर ऐसा टंटा खड़ा नहीं किया कि नेहरू की राष्ट्रनायक छवि बिगड़ती। उनके बाद नेहरू अध्यक्ष बने। 1964 में नेहरू के बाद कौन? के सवाल पर शिखर मंत्रियों की सिंडिकेट बैठी और उसने सभी सांसदों से अपने पसंदीदा उम्मीदवार के नाम की पर्चियाँ माँगी। बिना पर्ची खोले कामराज ने ऐलान कर दिया कि आम राय लालबहादुर शास्त्री के पक्ष में है, तो सब कांग्रेसी बोले ठीक है। यूँ शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने। जनवरी 1966 में शास्त्री जी का विदेश में अचानक निधन हो गया, तो चव्हाण, सुखाड़िया, स्वर्ण सिंह, कामराज, संजीव रेड्डी जैसे नेता दल में विकल्प के रूप में मौजूद थे। पर अचानक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारकाप्रसाद मिश्रा के आव्हान पर देश के 8 मुख्यमंत्री और दो मुख्यमंत्रियों के प्रतिनिधि दिल्ली में मिले और तय हो गया कि तपे-तपाए नेताओं की बजाए नेहरू की कम उम्र बेटी को ही प्रधानमंत्री बनाया जाए। मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्यों के सांसदों पर दबाव बनाया और सब कांग्रेसी बोले ठीक है। यूँ इंदिरा प्रधानमंत्री बन गईं। चयन पर कोई दंगल नहीं हुआ। नेता चयन की यह अलबेली कांग्रेसी प्रतिभा उसका अवगुण भी है, और उसकी ताकत का बड़ा स्नेत भी। इससे जनता दल ने सबक नहीं लिया। हेगड़े के चयन को लेकर चंद्रशेखर ने महनामथ खड़ा किया और देवेगौड़ा से उन्हें टँगड़ी देकर गिरवा दिया। इससे लोगों में पार्टी की वैसी ही भद्द पिटी जैसी आज भाजपा की पिट रही है। उधर राजीव की हत्या के बाद कांग्रेसियों ने राव को कोई तमाशा किए बगैर खड़ाऊँ सौंप दिए और 5 बरस राज किया। जब 1996 में कांग्रेस की हार हुई, तब पार्टी को जिता न पाने के कारण राव से इस्तीफा ले लिया गया और सीताराम केसरी अध्यक्ष बनाए गए। पर उनकी अध्यक्षता के खिलाफ कोई आधा दजर्न वरिष्ठ कांग्रेसी खड़े हो गए और पार्टी ढाँचा चरमराने लगा, तो सोनिया गाँधी ने पार्टी की प्राइमरी सदस्यता ग्रहण कर साल भर बाद पार्टीजनों की सर्वसम्मति के आधार पर अध्यक्ष पद संभाल लिया। तब से अब तक सोनिया नीत पार्टी दो आम चुनाव जीत चुकी है। जबकि जनता दल का नामलेवा भी नहीं दिखता। आलोचक यहाँ जरूर कह सकते हैं कि वंशवाद एक लोकतंत्र में किसी भी पार्टी को टिकाए रखने की बड़ी ही घटिया शर्त है। लेकिन यह सिफ़त घटिया हो तब भी भारतीय पार्टियों को वह ताकत और टिकाऊपन देती है। सपा, अकाली दल, लोकदल, द्रमुक हर पार्टी में क्या वंशवाद नहीं दिखता? अटूट स्वामी भक्ति, संयुक्त परिवार, और घर की मर्यादा बनाए रखने की खातिर वनवास लेने या रथ  के चक्के में उंगली दे देने वाली बहुओं को पसंद करने वाला भारतीय मानस वंशवाद तब भी सह लेगा पर हनुमान को रावण कह कर दर-ब-दर करने का प्रसंग उसे बड़ा अवांछित और आपत्तिजनक लग रहा है। इस देसीपने पर वामदल अधिक गाल न बजाएं। भाजपा के बाद संभावित पराजय और चिड़चिड़ी टूट की ऐसी ही चुनौती शायद सालभर बाद बंगाल में वामदलों के सामने भी आए। हार हुई तो 1977 से जीतते रहे वामदल नई स्थितियों से कैसे तालमेल बिठाते हैं, नेतृत्व का मसला कैसे तय  करते हैं, और पार्टी को बदलते भारत और विश्व के लिए कैसे तैयार करते हैं, देखना रोचक रहेगा। मृणाल पाण्डे की ‘कसौटी’ सीरीज का यह अंतिम आलेख है। एक अर्से से इस विचार यात्र में साझीदार रहे पाठकों को लेखिका का धन्यवाद।
mrinal.pande@gmail.com

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