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परंपरा व आधुनिकता के बीच एक पुल

कन्नड़ के शीर्ष नाटककार गिरीश कर्नाड एक समारोह में भाग लेने के लिए पिछले दिनों कोलकाता आए थे। उनका वक्तव्य सुनने के बाद मेरे एक आत्मीय ने टिप्पणी की ‘कर्नाड बोलने में भी एक-एक शब्द स्वर्ण-मुद्रा की तरह खर्च करते हैं। लिखने में तो करते ही हैं।’ इस टिप्पणी पर याद आया, पिछले साल तसलीमा नसरीन के पक्ष में आयोजित वह सभा, जिसमें गिरीश कर्नाड भी मेरे साथ मंच पर थे और उन्होंने संक्षिप्त किंतु दीप्त और दो टूक लहजे में तसलीमा का समर्थन किया था। खरी-खरी कहना गिरीश का स्वभाव है।

मेरे लिए यह कहना कठिन है कि गिरीश कर्नाड बड़े लेखक हैं या बड़े अभिनेता या बड़े निर्देशक? इन तीनों क्षेत्रों में उनकी बराबर की यशकीर्ति है। गिरीश कर्नाड की प्रथम नाट्य कृति ‘ययाति’ आज से 48 साल पहले 1961 में आई थी और उसके छपते ही गिरीश साहित्य जगत में छा गए थे। मुझे ‘ययाति’ इसलिए एक विरल कृति लगती है क्योंकि इसमें एक तरफ जीवन के प्रति ललक भरा प्रेम है तो दूसरी तरफ वह चेतावनी भी कि छल-छद्म उसे विकृत कर देता है। गिरीश के नाटक एकआयामी नहीं, बहुआयामी हैं। ‘तुगलक’ (1964), ‘हयवदन’ (1971), ‘अंजुमल्लिगे’ (1977), ‘हित्तिना हुंजा’ (1980), ‘नागमंडल’ (1988), ‘तलेदंड’ (1990) और ‘अग्नि मत्तु माले’ (1995) जैसी नाटय़कृतियां इसका सबूत हैं। गिरीश का साहित्य, परंपरा और आधुनिकता के बीच एक पुल की तरह है, जिसमें पाठक को एक छोर से दूसरे छोर पर जाने की पूरी छूट है। गिरीश अतीत के पात्र भले लें, उसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य देते हैं। तुगलक को भी उन्होंने आधुनिक रूपक के रूप में पेश किया है। दिल्ली से दौलताबाद और दौलताबाद से पुन: दिल्ली का किस्सा महज सनक नहीं है, हालांकि सनक भी है। अपने मत का अतिरिक्त आग्रह असहमति के स्पेस को कम करता है और इसे हम स्वातंत्र्योत्तर भारत के तमाम सत्ताधारियों में पर्याप्त लक्ष्य कर सकते हैं। इधर अनेक सत्ताधारी हुए, जो तुगलक की तरह अपने मत के अतिरिक्त आग्रही रहे। तानाशाही के उत्तर आधुनिक रूप को आजाद भारत ने कई-कई बार देखा है, भुगता भी है।

‘हयवदन’ में गिरीश ने पूर्णता के संधान में संलग्न मानुष की कथा कही है तो ‘नागमंडल’ में यथार्थ व अयथार्थ सहयात्री के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। गिरीश पुराने प्रतीकों, कथाओं और पौराणिक पात्रों के जरिए आधुनिक समय की चुनौतियों से जूझते हैं और यहीं उनका कैनवास व्यापक हो जाता है। इस व्यापकता का निदर्शन हम उनके रेडियो नाटकों- ‘मा निषाद’, ‘एकांक संग्रह’ और ‘द ड्रीम्स ऑफ टीपू सुल्तान’ में भी कर सकते हैं। गिरीश के नाटकों में व्यंजना, बिम्ब और काव्यात्मकता का जो मणिकांचन योग है, वह विरल है। कर्नाड ने जिस तरह मिथक, परंपरा और इतिहास को समकालीनता से जोड़ा है, वह भी विलक्षण है। गिरीश मानते हैं कि अपने समय से जुड़े बगैर कोई रचना सार्थक नहीं होती। वे महान रचना के लिए रसानुभूति को अनिवार्य मानते हैं। गिरीश ने कभी भी काव्यात्मक ढंग से नाटक नहीं लिखा। राजनीतिक-सामाजिक आशयों वाले नाटक ही लिखे जिनका उद्देश्य जख्म देना नहीं, जख्म भरना रहा है। गिरीश के नाटक जख्म भरते हैं और पाठक-दर्शक को रसानुभूति कराते हैं। भारत भर में गिरीश के बहुआयामी नाटकों का विराट पैमाने पर मंचन हुआ है। देश-विदेश की सभी प्रमुख भाषाओं में उनकी नाटय़ कृतियों का अनुवाद हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें जो ख्याति मिली, उसके वे सही हकदार हैं। गिरीश कर्नाड को काटकर पिछली आधी शताब्दी के भारतीय रंगमंच का इतिहास संभव नहीं है। साहित्य-संस्कृति में उल्लेखनीय योगदान के

लिए गिरीश कर्नाड को संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, साहित्य अकादमी पुरस्कार, कमलादेवी चट्टोपाध्याय पुरस्कार, कर्नाटक नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान, पद्मभूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल चुका है लेकिन इससे भी बड़ा पुरस्कार उनके पाठकों, दर्शकों से उन्हें मिला और आज भी मिलते जा रहा है। इस लोक सम्मान की वे कद्र भी करते हैं। जहां भी सामाजिक कार्यो में जरूरत पड़ती है, वे कूद पड़ते हैं। गिरीश की सामाजिक सोद्देश्यता यहीं नया अर्थ पाती है। यही गुण हम हबीब तनवीर, बादल सरकार, शंभु मित्र से लेकर विभास चक्रवर्ती और सांवली मित्र तक में लक्ष्य कर सकते हैं, इसीलिए ये रंग व्यक्तित्व हमें अपनी ओर बार-बार आकृष्ट करते हैं। ऐसे सांस्कृतिक व्यक्तित्वों पर कोई भी देश गर्व कर सकता है। जो सिर्फ लेखन, अभिनय, निर्देशन तक अपने उज्जवल मन, मेधा और बुद्धि को सीमित नहीं रखते, जरूरत पड़ने पर लड़ाई के मैदान में भी उतरते हैं और शासन के अनौचित्यपूर्ण व्यवहार को टोकते हैं। काम्य तो यही है कि जो जहां है, अनौचित्य को रोके। गिरीश कर्नाड कन्नड़ में लिखते हैं, हममें कोई बांग्ला में लिखता है, कोई हिंदी में, कोई अन्य भारतीय भाषा में। हम सभी भारतवसी हैं। हम सब भारतीय साहित्य की ही सेवा करते हैं।

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