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एक राजनैतिक धारावाहिक

यह एक अजीब विडंबना ही है। जिस पार्टी ने मीडिया को इस्तेमाल करने की रणनीति बहुत कामयाबी से अपनाई, वही इस बार बुरी तरह से मीडिया का शिकार बन गई। अंग्रेजी में जिसे पॉलिटिकल सोप ऑपेरा कहते हैं, वह इन दिनों हमारे टीवी पर छाया हुआ है। हर रोज भारतीय जनता पार्टी की एक और पोल खुलती है, एक नया विवाद शुरू होता है। राजनीति का खेल दिखाने के मामले में टेलीविजन का मुकाबला और कोई मीडिया नहीं कर सकता है। पिछले हफ्ते से दो बातें साफ-साफ दिखाई दे रही हैं। पहले जो असहमति कांग्रेस पार्टी में अक्सर दिखाई देती थी, वह आजकल भाजपा की बीमारी बन गई है। और टीवी कैमरा हमेशा असंतुष्ट नेताओं के खास दोस्त रहे हैं। जहां कांग्रेस पार्टी से पत्रकारों को कई साल में सिर्फ एक नटवर सिंह मिले, और बीएसपी से वह भी नहीं मिल सके। वहीं भाजपा में आजकल इतने लोग हाजिर हैं कि कैमरे वालों के लिए मानो हर रोज एक बड़ी का आयोजन हो रहा है। वैसे अखबारों के लिए भी मसाला कम नहीं है। एक ही दिन में आप अरुण शौरी से जसवंत सिंह तक के पास भाग सकते हैं, और फिर वसुंधरा राजे के पास। नई बाइट आपको लगातार मिलती जाएंगी।

दूसरी तरफ हालत यह है कि असंतुष्ट नेताओं की भीड़ में भाजपा के प्रवक्ता को टीवी पर टाइम मिलना मुश्किल हो गया है। कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता भी कम दिखाई दे रहे हैं। जब भाजपा का मुकाबला अपनों से हो रहा है, तो कांग्रेस को मुंह खोलने की क्या जरूरत? राजनीतिक दलों के लिए मीडिया को संभालना कितना जरूरी है? इस साल भाजपा को मीडिया से काफी नुकसान होने जा रहा है। पहले लोगों ने वरुण गांधी की हरकतों को हफ्तों तक टीवी पर देखा, अनगिनत चैनलों पर, एक ही फुटेज बार-बार। फिर चुनाव बाद पोस्टमार्टम में लगातार अरुण जेटली और राजनाथ सिंह के मतभेदों की चर्चा हुई। पार्टी के अध्यक्ष की उम्र के बारे में चर्चा हुई। उसके बाद आई जसवंत सिंह की किताब। जहां तक आम आदमी का सवाल है, उसने इस साल भाजपा की एक ही छवि देखी है और वह है, हर कदम पर विवाद वाली।

लेकिन टेलीविजन से जब लोगों को राजनीति की जानकारी मिलती है तो उसमें एक ही कमी होती है कि वहां नकारात्मक बातों पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इसलिए आश्चर्य होता है कि भाजपा ने टेलीफोन पर जसवंत सिंह को बाहर करते हुए इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि इसका बुरा प्रचार कितने दिनों तक ङोलना पड़ेगा। इस दौर में सबसे बड़ा झटका लगा है, लालकृष्ण आडवाणी की छवि को। टीवी चैनल किसी की भी कही हुई बात को मिनटों में पेश कर सकते हैं, चाहे वह कितनी भी साल पहले कही गई हो। जब जसवंत सिंह को कंधार भेजे जाने की बात फिर उठी, एनडीटीवी ने एक के बाद एक तीन साउंड बाइट दिखाई, अपने ही चैनल के पुराने फुटेज से। एक में आडवाणी शेखर गुप्ता को कह रहे थे कि कैबिनेट कमेटी ऑन सेक्युरिटी की कोई मीटिंग हुई ही नहीं, और इसलिए उनको आतंकवादियों के भेजे जाने के विषय में कोई जानकारी नहीं थी। दूसरे में यशवंत सिन्हा कह रहे थे कि सुरक्षा पर मंत्रिमंडलीय समिति की मीटिंग हुई, वे और आडवाणी दोनों शामिल हुए थे इस मीटिंग में। फिर उसके बाद ब्रजेश मिश्रा ने कहा कि मीटिंग हुई थी और आडवाणी उसमें शामिल थे। जब यह सबके सामने दिखाया जाता है, तो भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता टीवी पर झूठे साबित होते हैं।

ऐसे मौकों पर यह सवाल जरूर उठता है कि मीडिया की राजनीतिक प्रक्रिया में क्या भूमिका रहती है। जब चुनाव चल रहा हो तो यह जिम्मेदारी समझना फिर भी आसान है। वह राजनीतिज्ञों को जवाबदेह बनाए। बताए कि वह पिछले पांच साल में क्या कर पाए या नहीं कर पाए, उसको दिखाए। पर बाकी साल, क्या रिपोर्टिग सिर्फ ब्रेकिंग न्यूज होनी चाहिए? क्या माइक सामने रखने के अलावा कोई और जिम्मेदारी नहीं है? क्या दिल्ली को छोड़कर दूसरे प्रांतों में भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं से चर्चा नहीं की जा सकती है कि पार्टी के सामने क्या रास्ते हैं, और उनमें से किस रास्ते को पकड़ना चाहिए? क्या दिखाने वाले जनता को विवाद के अलावा और कुछ नहीं दिखाना चाहिए? कहा जाता है कि लोकतंत्र के लिए मीडिया इतना जरूरी है कि जब वह कमजोर होता है तो लोकतंत्र में भी कमजोर होता है। इस 60-70 न्यूज चैनलों के जमाने में, जो सब रेटिंग के दौर में है, इस पर गौर करने की बात है।

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