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सूरत बदलने वाली सीरत

हंगामे की कोई वजह तो थी नहीं। फिर भी हंगामा बरपा। मसला यह नहीं था कि मसला हल कौन करे, मसला यह था कि पहल कौन करे। पहल हुई तो हंगामा हो गया। मामला था न्यायाधीशों की संपत्ति के सार्वजनिक करने का। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन ने इस मसले पर शुरुआत में आनाकानी की। लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायाधीश डी. वी. शैलेन्द्र कुमार ने जब इस मसले पर एक लेख के माध्यम से बालकृष्णन को घेरे में ले लिया तो अंतत: इस मसले पर फैसला हो ही गया। अब न्यायाधीश अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करेंगे। बीते दिनों कलकत्ता हाइकोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन पर गबन का आरोप लगा। उन पर महाभियोग चलाने की बात चल रही है। इसके बाद ही न्यायाधीशों की संपत्ति को सार्वजनिक करने की बात जोर पकड़ने लगी थी। इस संदर्भ में पहल करते हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने देश के सभी 617 न्यायाधीशों को खत लिख कर ऐसा करने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद चर्चा गरम हुई। मुख्य न्यायाधीश बालकृष्णन आनाकानी करते रहे। लेकिन न्यायाधीश शैलेन्द्र कुमार ने उन्हें जब इस मसले पर बालाकृष्णन पर सीधा हमला बोला और अपनी संपत्ति अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दी। उन्होंने कहा कि धारणा यह फैलाई जा रही है कि देश के अधिकांश न्यायाधीश अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक नहीं करना चाहते हैं। यह बात गलत है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश पर भी सवाल उठाया कि वे मुख्य न्यायाधीश को कानूनी तौर पर पूरी न्यायपालिका पर बोलने का अधिकार नहीं है। इस पर बालकृष्णन पर उन पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि न्यायाधीश शैलेन्द्र कुमार पब्लिसिटी क्रेजी हैं। न्यायधीशों को पब्लिसिटी क्रेजी नहीं होना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कानून बन जाता है तो हरेक को अपनी संपत्ति की घोषणा करनी होगी। इस मसले पर जो भी बहस-मुबाहसा हुआ, लेकिन जब इस मुद्दे पर सहमति बन गई तो अब माना यह जा रहा है कि इसके पीछे न्यायाधीश शैलेन्द्र कुमार की अहम भूमिका है। न्यायाधीश शैलेन्द्र कुमार असल में अपने जीवन में बेहद साधारण व्यक्ति हैं। वे फैसला करते वक्त चीजों को बारीकी से अध्ययन करते हैं। 5 सितम्बर 1951 में तमिलनाडु में जन्मे न्यायाधीश शैलेन्द्र कुमार ने कानून की दुनिया का सफर बतौर वकील शुरू किया। उन्होंने 1976 में तमिलनाडु बार काउन्सिल में अपना पंजीकरण कराया। लगभग चौदह साल उन्होंने मद्रास हाइकोर्ट और कर्नाटक हाइकोर्ट में बतौर वकील प्रैक्टिस की। दिसम्बर 2000 में कर्नाटक हाइकोर्ट में उन्हें एडिशनल जज बनाया गया। इसके बाद 2002 में वे इसी हाइकोर्ट में पूर्णकालिक न्यायाधीश बन गये। न्यायाधीश शैलेन्द्र कुमार मृदुभाषी हैं। अध्ययन का उन्हें शौक है। उनके हर मुद्दे पर विचार स्पष्ट हैं। ईश्वर में उनकी आस्था है, लेकिन ईश्वर और धर्म के नाम पर चल रहे धंधे के वे खिलाफ हैं। बीते दिनों बेंगलूर में मानवाधिकार दिवस के मौके पर उन्होंने बेलौस विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि हमारे बीच ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जिनसे जाहिर होता है कि समाज में आम आदमी का धर्म और ईश्वर के नाम पर शोषण किया जाता है। धार्मिक संगठनों को ऐसे लोगों के पक्ष में सामने आना चाहिये। कानून के बारे में भी उनकी राय खरी है। मुख्य न्यायाधीश पर हमले के दौरान ये विचार अब जग जाहिर हो गये हैं।

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