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टॉस

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सितारे : अश्मित पटेल, रणविजय सिंह, प्रशांत राज, आरती छाबड़िया, मधुरिमा बैनर्जी, जाकिर हुसैन, सुशांत सिंह, महेश मांजरेकर, राजपाल यादव, विजय राज।
निर्माता : मुकेश रमानी
लेखक-निर्देशक : रमेश खाटकर
गीत : सुधीर नेमा, इरशाद कमील, कुमार
संगीत : संदेश शांडिल्य, सिद्धार्थ, सुहास

कहानी : यह गोवा में रह रहे छह दोस्तों जोश (अश्मित पटेल), रयान (रणविजय सिंह), सैमी (प्रशांत राज), ससा (आरती छाबड़िया), शेरी (मधुरिमा तुली) और फियोना (श्रुति गेरा) की कहानी है। वे एक टूर पर जाते हैं, जहां उन्हें जंगल में पानी में मेटल के दो बक्से मिलते हैं। बक्सों को लाकर सैमी के घर में रखते हैं। ताला खुलवाने के लिए डफी (राजपाल यादव) को बुलाते हैं। वह ताला खोलता है, लेकिन उसे बक्सा नहीं खोलने दिया जाता, जिस कारण वह सच्चाई जानने के लिए बाहर छुप जाता है। बक्से से 25 करोड़ रुपए निकलते हैं। सब आपस में बांटने का निर्णय लेकर पैसे को एक जगह छुपा देते हैं। लेकिन, जब डफी उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश करता है तो सब उसे मार देते हैं। उधर एक सेठ के उन रुपयों का रखवाला दादा (महेश मांजेरकर) और टू (सुशांत सिंह) इन लोगों को ढूंढ़ने निकलते हैं। बात पुलिस तक पहुंच जाती है। इधर ये दोस्त आपस में एक-दूसरे को मारने लगते हैं, ताकि सारे पैसे अकेले ही हासिल कर लें। आखिरकार बारी-बारी से पांच दोस्त मारे जाते हैं। अंत में फियोना उन रुपयों को लेकर फिर जंगल में एक गड्डे में दबा आती है।

निर्देशन : राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘मस्त’ लिख चुके रमेश खाटकर की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है। वे इस फिल्म के लेखक भी हैं। फिल्म में मस्ती है, सेक्स है, कहानी है, लेकिन संदेश कुछ अलग है। शायद वे यह बताना चाहते हैं कि पैसे का ऐसा कमाल है कि छह दोस्तों में सबसे ईमानदार फियोना पैसे के लिए सबसे बड़ी साजिश रचती है। खासकर निर्देशन की दृष्टि से यह साधारण फिल्म कहलाएगी।

अभिनय : छह दोस्तों के रूप में सभी कलाकारों की भूमिका सामान्य ही है। सिनेमा हॉल से बाहर आकर कोई कलाकार कुछ पल के लिए याद रह जाता है तो वे प्रशांत राज, आरती छाबड़िया, रणविजय सिंह और जाकिर हुसैन हैं। श्रुति ने भी अपनी भूमिका ठीक-ठाक निभाई है।

गीत-संगीत : फिल्म का संगीत औसत है। यूं तो पांच गाने हैं, लेकिन रुपैया-रुपैया.. और पंजाबी मस्ती से भरपूर ऐश-ऐश.. गाना ठीक-ठाक है।

क्या है खास : इस थ्रिलर फिल्म में सस्पेंस अच्छा है। अंत तक दर्शकों का अंदाज गलत निकलता जाता है कि पैसे किसने छुपा रखे हैं।

क्या है बकवास : पानी से दो बक्से निकलते हैं, जो नोटों से भरे हैं। लेकिन, जब बक्से खोले जाते हैं तो उसमें से नए-नए नोटों की गड्डियां निकलती हैं, जिन पर पानी का कोई असर नहीं दिखता।

पंचलाइन : पैसे के जादू से बचना आसान नहीं।

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