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दो टूक (29 अगस्त, 2009)

वे हमारे बीच ही होते हैं पर नजर नहीं आते। परिवारों में, पड़ोस में, सड़कों पर सब जगह हम बूढ़े, बीमार और विकलांग लोग देखते हैं। लेकिन इसके बावजूद जब हम कोई योजना या इमारत बनाते हैं तो भूल जाते हैं कि उनमें इन लोगों के लिए क्या जगह होगी। बरसों पहले जब स्टीफन हॉकिंग मुल्क में आए थे तो पहली बार हमें अहसास हुआ था कि महत्वपूर्ण इमारतों में रैम्प बनाने चाहिए ताकि व्हील चेयर वालों को आसानी हो। लेकिन रेलवे स्टेशनों, बस स्टॉपों और मार्केटों का सिस्टम पहले की तरह पत्थरदिल बना रहा। शुक्र है, बड़े स्टेशनों पर बीमारों और विकलांगों के लिए स्पेशल बैटरी चालित गाड़ियां चलाने का ख्याल रेलवे बोर्ड को आया है। थोड़ा देर से आया लेकिन देर आयद, दुरुस्त आयद।

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