DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चापलूसी भी रखी है नाम में

पिछले साल मैं अरुणाचल प्रदेश गया था। राजीव गांधी विश्वविद्यालय का निमंत्रण था। मेरे भाषण के बाद मेजबान मुझे इटानगर घुमाने ले गए। हम जवाहर लाल नेहरू राजकीय संग्रहालय और इंदिरा गांधी राजकीय वन में गए। अगले दिन मैं खूबसूरत गांवों, पहाड़ों, जंगलों और खेतों से होता हुआ 11 घंटे के सफर के बाद मैं गुवाहाटी पहुंच गया। वहां पहुंचने से पहले हम एक अजीब सी पीली छत वाली इमारत के पास से गुजरे। यह राजीव गांधी इंडोर स्टेडियम था, जिसे कुछ समय पहले असम सरकार ने बनवाया था।
पूर्वोत्तर की अपनी यात्रा की याद मुझे तब आई जब मैंने ‘द टेलीग्राफ’ में राधिका रामशेषन की एक खबर पढ़ी। इस खबर में बताया गया था कि रसोई गैस की एक योजना का नाम राजीव गांधी के नाम पर रखा जा रहा है। और यह केंद्र सरकार की 171वीं ऐसी योजना है जिसका नाम राजीव, इंदिरा या नेहरू के नाम पर रखा गया है। देश की योजनाओं, कॉलेजों, संग्रहालयों, स्टेडियम वगैरह-वगैरह के नाम देश के इस सबसे प्रभावशाली परिवार की हस्तियों के नाम पर रखने के पीछे देश में इसके योगदान को महत्व देना नहीं है। आमतौर पर इसका इस्तेमाल किसी राजनैतिक करियर को आगे बढ़ाने की कुटिल चाल के रूप में ही किया जता है। कुछ साल पहले जब हैदराबाद में नया हवाई अड्डा बना तो तार्किक और बेहतर फैसला तो यही होता कि इसका नाम आंध्र प्रदेश की किसी नामी गिरामी हस्ती पर रखा जाता। मुख्यमंत्री चाहते तो वे इस पर बाकायदा एक सर्वेक्षण करा सकते थे कि जनता क्या चाहती है। तब साहित्यिक लोग महान कवि श्री श्री का नाम सुझा सकते थे। संगीत प्रेमी त्यागराज का नाम ले सकते थे। इतिहास को अहमितयत देने वाले लोग मध्ययुग के किसी राज या राज्य का नाम बता सकते थे। तेलुगू देशम पार्टी वालों से पूछा जाता तो वे शायद एन. टी. रामाराव का नाम लेते, जबकि कांग्रेस वाले के ब्रह्मानंद रेड्डी या नीलम संजीव रेड्डी के नाम का सुझाव देते। कम्युनिस्ट पार्टियां पी. सुंदरैय्या का नाम लेती और नक्सलवादी टी नागी रेड्डी का। मुख्यमंत्री ने अगर लोगों की राय जनने की थोड़ी सी भी दिलचस्पी दिखाई होती तो एक जोरदार बहस छिड़ती। अखबारों में लेख लिखे जाते, टेलीविजन पर बहसें होतीं कि किसके नाम से हवाई अड्डे को सुशोभित किया जाए।

लेकिन मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने इसका मौका आने ही नहीं दिया, उसके पहले ही उन्होंने नए हवाई अड्डे का नाम राजीव गांधी पर रख दिया, ताकि वे दिवंगत प्रधानमंत्री की विधवा और पार्टी अध्यक्षा के साथ सही समीकरण बना सकें। इसी तरह से रसोई गैस योजना का नाम देश के छठे प्रधानमंत्री के नाम पर रखने का फैसला इसलिए नहीं हुआ कि पेट्रोकेमिकल के क्षेत्र में उनका भारी योगदान था, बल्कि इसलिए कि पेट्रोलियम मंत्री इस महत्वपूर्ण परिवार की नजरों में बने रहें। वैसे कुछ दूसरे भारतीय हवाई अड्डों के नामों में भी पूर्वाग्रह दिखाई देते हैं। मुंबई के हवाई अड्डे का नाम शिवाजी के नाम से है, कोलकाता के हवाई अड्डे का नाम सुभाष चंद्र बोस के नाम पर है। हवाई अड्डों का नामकरण गैर राजनैतिक हस्तियों के नाम पर भी किया ज सकता था। अगर लाहौर में अलम्मा इकबाल हवाई अड्डा हो सकता है तो कोलकाता में रवीन्द्रनाथ टैगौर हवाई अड्डा क्यों नहीं हो सकता? एक तरफ तो राजनीतिक चापलूसी के चलते नाम चुने जाते हैं तो दूसरी तरफ एक और क्षेत्रीय अस्मिता की वजह से। सभी बंगाली बोस को नमन करते हैं, सभी मराठी शिवाजी को नमन करते हैं। लेकिन क्या आंध्र प्रदेश के लोग भी राजीव गांधी के बारे में यही भाव रखते हैं।

अरुणाचल के जिस विश्वविद्यालय में मैं गया, जिस संग्राहलय और वन में मैं घूमा, वे सभी सार्वजनिक संस्थाएं हैं, उसमें राज्य के खजाने का धन लगा है। यही बात गुवाहाटी के पास बनी पीली छत वाली इमारत के बारे में भी है। इस स्टेडियम पर पहुंचने से पहले ड्राइवर ने गाड़ी को एक ढाबे पर रोका जिस नाम था, ‘अमृतसरी पंजाबी ढाबा’। इस ढाबे को चलाने वाले का कोई राजनैतिक मकसद नहीं था, उसने यह नाम सिर्फ इस वजह से चुना कि रास्ते से आने जने वालों को पता चल जाए कि पंजाबी स्वाद वाला सस्ता खाना यहां मिलता है। स्टेडियम और ढाबे के नाम का विरोधाभास बहुत कुछ बताता है। सार्वजनिक धन से बनी संपत्ति का नाम किसी मकसद को साधने के लिए रखा गया जबकि निजी धन से बनी संपत्ति का नाम वास्तविक भावना और उपयोगिता को दर्शाने वाला था। एक दूसरा उदाहरण देखिए, चेन्नई में आपको कोई ऐसा पार्क, दफ्तर, सभागार या स्टेडियम नहीं मिलेगा, जो सी. राजगोपालाचारी यानी राजजी के नाम पर हो। जबकि वे दो बार इस राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे, और वे इस राज्य के पहले भारतीय गवर्नर जनरल भी थे। ऐसा सिर्फ दुर्घटनावश नहीं हुआ, बल्कि इसलिए हुआ कि राजजी एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। इसके विपरीत कर्नाटक के बंगलुरु में एक बड़ा उपनगर है, जिसका नाम है, राजजी नगर। यह नाम उस व्यक्ति के सम्मान में रखा गया है, जो इस शहर में पढ़ा था और राष्ट्रीय राजनीति के शिखर तक गया था। रामायण और महाभारत का जिनका टीका भारत के विभिन्न समुदायों और जतियों के करोड़ों लोगों ने पढ़ा है।

यहां हमें यह भी देखना चाहिए कि परिवारों में बच्चों के नाम कैसे रखे जते हैं। कभी-कभी संपत्ति के कारणों से उनके नाम दादा, चाचा या ताऊ के नाम पर रख दिए जाते हैं। लेकिन अक्सर उनके नाम महाकाव्य के किसी महान चरित्र, अतीत या वर्तमान की किसी महान हस्ती पर रखे जाते हैं। मसलन आमर्त्य सेन को जब नोबेल पुरस्कार मिला तो बंगाली ही नहीं, कई तमिल परिवारों में भी बच्चों का नाम आमर्त्य रखा गया। शायद इस उम्मीद में कि आगे चलकर यह भी बौद्धिक जगत में वैसी ही ख्याति प्राप्त करेगा। राजशेखर रेड्डी ने जिस तरह से राजीव गांधी का सम्मान किया, यह आमर्त्य सेन का सम्मान करने का उससे कहीं ज्यादा बेहतर तरीका है।
पुनश्च-  इस खबर में यह भी कहा गया था कि करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम को भी राजीव गांधी का नाम मिल जएगा। राजीव गांधी के जन्म दिवस पर देश की ढाई लाख पंचायतों में राजीव गांधी सेवा केंद्र खोलने का फैसला भी हो गया। ये सेवा केंद्र नरेगा के बारे में जनकारी जमा करेंगे। अब बस नरेगा को राजीव गांधी का नाम मिलना बाकी है।
ramguha@vsnl.com
लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:चापलूसी भी रखी है नाम में