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बंटवारा और जिन्ना की विरासत

कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना पर किताबों से लाइब्रेरियां भरी पड़ी हैं। हम समझते हैं कि उनमें सब कुछ लिखा ज चुका है। हां, देश के बंटवारे से जुड़ी सियासत में उनकी भूमिका पर नए सिरे से सोच-विचार हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है।
हाल ही में बीजेपी नेता जसवंत सिंह ने अपनी किताब ‘जिन्ना: इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस’ में कुछ नया जुटाया है। उनका मानना है कि जिन्ना को हिंदुस्तानी नेताओं और लेखकों ने जानबूझ कर विलेन बनाया। मैं जसवंत सिंह से सहमत नहीं हूं। मेरा मानना है कि बंटवारा तो होना ही था। उसके बीज बहुत पहले ही पड़ चुके थे। दरअसल, हिंदुस्तान कभी एकजुट समाज नहीं था। जाति और भाषा के बंटवारे के साथ-साथ हिंदू और मुसलमान के बीच भी खाई थी। वे थोड़ा-बहुत घुलने-मिलने तो लगे थे, लेकिन एक-दूसरे से दूरी भी बनाए रखी थी। उन लोगों के बीच परिवारों का मिलना-जुलना बेहद कम रहा। शादियों के रिश्ते भी नहीं बने।
अंगरेज तो चाहते ही थे कि ये दूरियां बनी रहें। जब उनके हिंदुस्तान छोड़ने का वक्त आया, तो मुसलमान परेशान होने लगे।उन्हें लगा कि वे कैसे हिंदू बहुल हिंदुस्तान में रहेंगे। असल में तो देश का बंटवारा पहले ही हो गया था। लाला लाजपत राय ने तो एक नक्शा भी बना लिया था। उसमें संप्रदाय के लिहाज से बंटवारा दिखाया गया था। बाद में ऐसा ही नक्शा चौधरी रहमत अली ने भी बनाया था। पाकिस्तान नाम उन्होंने ही दिया था। अल्लामा इकबाल ने एक दौर में ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा’ लिखा था, वह भी अलग मुस्लिम देश की बात करने लगे थे। जिन्ना ने महज दो देश की थ्योरी को बढ़ाया था। उन्होंने कहा था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग कौम हैं। इसलिए एक देश में नहीं रह सकते। यह सोच पूरे मध्यवर्गीय मुसलमान समाज में फैली हुई थी। उसके बाद कोई उसे रोक नहीं सकता था। न गांधी, न नेहरू, न पटेल और न जिन्ना। मुसलमानों के इलाकों से हिंदुओं और सिखों को भगाने की शुरुआत हो गई थी। और यह मार्च, 1947 में ही उत्तरी पूर्वी पंजाब में हो गया था। पंजाब के कई शहरों में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए थे। उसमें लाहौर भी था। 15 अगस्त, 1947 तक तो हिंदुओं और सिखों को भगाया जाना बेहद खूनी शक्ल अख्तियार कर चुका था। अब पूर्वी पंजाब के हिंदू और सिख इसे एकतरफा कैसे रहने देते। उन्होंने मुसलमानों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। मानव के इतिहास में वह बेहद खौफनाक लेन-देन था। उसमें लाखों लोग मारे गए

और एक करोड़ से ज्यादा बेघर हो गए थे। सो, नेहरू, पटेल और जिन्ना पर उंगली उठाने से कुछ नहीं होगा। उनमें से कोई एक नहीं बल्कि सारे मिल कर भी बंटवारे को नहीं रोक सकते थे। वे तो इतिहास की नफरत भरी लहरों को बेचारगी से देख रहे थे। वे हिंदुस्तान-पाकिस्तान की लड़ाई के जिम्मेदार हो सकते हैं। कश्मीर मुद्दे को उलझने में उनकी भूमिका हो सकती है।
लेकिन..

स्वाइन फ्लू
कई अखबारों में सुर्खियां देखीं। पुणे में स्वाइन फ्लू: परेशानी की कोई बात नहीं। बंगलूर, मुंबई, दिल्ली में स्वाइन फ्लू कोई दिक्कत नहीं। हमारे स्वास्थ्य मंत्री टीवी चैनल पर आए। उन्होंने बताया कि यह दुनिया भर में फैला हुआ है और उसका सामना करने को देश तैयार है। जल्द ही स्वाइन फ्लू का टीका आ जाएगा। अपने सारे अस्पताल उसके लिए तैयार हैं। हर सुबह उससे हुई मौतों का आंकड़ा दिया जता है। हर घंटे पर बताया जाता है कि कितने लोगों का क्या हाल है। लेकिन फिर भी परेशानी की कोई बात नहीं। मैं भीड़भरे इलाकों में नहीं जाता और चिल्लाता, ‘बचाओ, बचाओ, एक जंगली सूअर मेरे पीछे पड़ा है’। मैं तो घर पर ही रहता हूं और अपना काम करता हूं। लेकिन फिर भी फ्लू हो जाता है। ऐसा मेरे साथ हर बदलते मौसम में होता है। मेरा गला खराब हो जाता है। छींकें आती हैं। नाक बहने लगती है। उसके बाद कफ परेशान करता है। लेकिन इसमें कुछ भी गंभीर नहीं है। अगर कोई चीज रात में मुझे याद रह जाती है तो यही कि जिस चीज में सूअर का मांस था, वह कितनी स्वादिष्ट थी। हालांकि मैं जानता हूं कि सूअर बेहद गंदा होता है। क्या-क्या खाता है। इस्लामी जानकार डॉ. जाकिर नायक ने सूअर से होने वाली 19 बीमारियों की फेहरिश्त गिनाई है। उनमें स्वाइन फ्लू नहीं है। मैं भी मानता हूं कि सूअर का गोश्त खाने से स्वाइन फ्लू नहीं होता। हिंदुस्तान में उससे मरने वाली पहली मुस्लिम लड़की ने कभी उसका गोश्त नहीं खाया होगा।

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