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राधा के बिना कन्हाई

अभी कुछ दिन पहले जन्माष्टमी और राधाष्टमी का निमंत्रण देने विनोद बिहारी आए थे। वह रमण बिहारी गौड़ीय मठ से जुड़े हैं। हम वृंदावन के अलग-अलग मंदिरों की चर्चा कर रहे थे। कृष्ण पर बात आई तो उन्होंने कहा कि उनके यहां अकेले कृष्ण को नहीं पूजा जाता। राधा के बिना कन्हाई स्वीकार नहीं है। वे चैतन्य महाप्रभु की परंपरा वाले हैं। बहुत पहले कृष्ण की आराधना अकेले देवता ने की थी। चैतन्य महाप्रभु ने उसमें राधा को जोड़ा। स्त्री के बिना पुरुष पूर्ण नहीं हो सकता। इसी तरह परम पुरुष भी उसके बिना अधूरा होता है। राधा तो कृष्ण की परम शक्ति हैं। उनके बिना वह पूर्ण कैसे हो सकते हैं। महाप्रभु की वजह से ही आज का वृंदावन है। उन्हीं की वजह से राधा और कृष्ण का महारास ब्रज के माहौल में है। महाप्रभु अक्सर महाभाव की बात करते थे। महाभाव में प्रभु और भक्त दोनों एक हो जाते हैं। प्रभु से मिलने की बेचैनी भक्त में ही नहीं होती। प्रभु में भी होती है। और जब दोनों उस भाव में होते हैं, वही महाभाव है। महाभाव के बिना महारास कैसे हो सकता है? महाप्रभु उस महाभाव को जी रहे थे। शायद इसीलिए महाप्रभु को राधा और कृष्ण दोनों का अवतार माना जाता है।
कल राधाष्टमी थी। अस्सी के दशक में मुझे दिल्ली यूनिवर्सिटी के अपने एक प्रोफेसर याद आए। वह ब्रज के थे। अक्सर बड़े नाटकीय अंदाज में कहते थे कि राधा तो थीं ही नहीं। मजेदार बात है, उनकी बात कोई मानता नहीं था। किसी को इसमेंदिलचस्पी ही नहीं थी कि राधा है ही नहीं? कोई और समाज होता, तो शायद उस पर बावेला मच जाता। लेकिन यहां लोग बस सुनते हैं और मुस्कुरा कर आगे चल देते हैं। यही इस समाज की प्रतिक्रिया है। राधा नहीं हैं। यह कहने का मतलब है कि राधा को इतिहास में देखने की कोशिश हो रही है। लेकिन राधा को इतिहास में क्यों देखते हैं? राधा को कहीं और से देखने की जरूरत है। राधा को अपने भीतर महसूस करता है यह समाज। राधा हमारे मन में बसी हुई हैं। उन्हें कौन निकाल सकता है? मिथक को समझिए। मिथक को इतिहास के आईने में मत देखिए।

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