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महंगाई के बावजूद सबसे सस्ते का ठप्पा

स्विस बैंकिंग समूह (यूबीएस) के एक सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली और मुंबई दुनिया के सबसे सस्ते शहर हैं। दिल्ली के लिए सस्ते शहर के रूप में पहले भी सर्वेक्षण हो चुके हैं। दिल्ली के सस्तेपन के लालच में ही यहां बाहर से काफी लोग आ कर बसे हैं। हकीकत यह है कि दिल्ली रूपी लड्डू जिसने खाया वह भी पछताया और जिसने नहीं खाया वह भी। दूर के ढोल हमेशा सुहावने होते हैं। यहां के लोग ऐसे बांकें हैं, जिनकी जूती में सौ-सौ टांकें मिलेंगे। सस्तापन तो दूर दिल्ली में हवा-पानी भी पैसों से मिलता है। देश में महंगाई विरोधी प्रदर्शन सर्वाधिक दिल्ली में ही होते हैं। यहां तो शिक्षा के साथ-साथ सलाह भी कीमत से मिलती है। दिल्ली की महंगाई और बेरोजगारी ही यहां होने वाले क्राइम की मुख्य वजह है।
राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

कार्यकर्ताओं का दर्द
भाजपा में सिरफुटौव्वल की स्थिति देख कर पुराने कार्यकर्ताओं के मन पर क्या बीत रही होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। आज की राजनीति के गिरते स्तर के माहौल को देख कर बड़ा दुख होता है कि आदर्श भाजपा के पदाधिकारी अब एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा के पदाधिकारी जो कभी बड़े सिद्धांतवादी, प्रसिद्धि विमुख और समर्पित हुआ करते थे। किन्तु आज के समय में कारण साफ है कि मान-मर्यादा, समर्पण, त्याग, सहयोग, आस्था और विजन सरीखे शब्द उन्हीं पदाधिकारियों की परिभाषा से अलग हो चुके हैं। इस खाई को समय रहते पाटने के लिए सभी पदाधिकारियों की एकजुटता, समर्पण और एक दूसरे को सम्मान देने से ही संभव हो पाएगा। यह ध्यान रहे कि संस्था से व्यक्ति कभी बड़ा नहीं होता है। सभी नेता संस्थागत सोच बनाएं और अपनी ईगो और जिद को इसके आड़े न आने दें।
धर्मवीर आनन्द, सविता विहार, दिल्ली

नाक एक जैसी, मगर..
बेटों में सब कुछ है
अलग-अलग महज
एक सी नाक है
एक खतरनाक
एक अफसोसनाक
एक शर्मनाक है।
शरद जायसवाल, कटनी, मध्य प्रदेश

आमजन को न भूलो
छत्तीसगढ़ आजादी के बाद अधिकांश समय कांग्रेस शासित रहा है। मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद गैर कांग्रेस सरकार बनी और भाजपा ने सत्ता की कमान संभाली। कल तक अपने आंतरिक अनुशासन के लिए पहचाने जाने वाली भाजपा को अचानक मिली कुर्सी और पद के मद ने कालांतर में आम जन से दूर कर दिया। वे सिर्फ चुनावों के समय ही जनता से जुड़ते हैं और बाकी सारे समय धन और कुर्सी से जुड़े रहते हैं। यह एक अटल सत्य है कि लोकतंत्र में जनता ही सवरेपरि होती है। जनता को कुछ समय तक तो बहकाए रखा जा सकता है लेकिन अंतत: जनता ही ऐसी सत्ता को नेस्तनाबूत कर देती है।
सजग, रायपुर, छत्तीसगढ़

 

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