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निर्यात का नया रोडमैप

विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी को मौजूदा डेढ़ फीसदी के शर्मनाक आंकड़े से उबारने की खातिर वाणिज्य मंत्रालय ने जो पंचवर्षीय विदेश व्यापार नीति गुरुवार को घोषित की, उसकी कई सीमाएं हैं। यह दरअसल एक सहमा हुआ दस्तावेज है, जो  मंदी की दुहाई देकर पांच की बजाय सिर्फ दो साल का रोडमैप परोसता है। उसमें घोषित निर्यात लक्ष्य भी महत्वाकांक्षी नहीं हैं, क्योंकि 200 अरब डॉलर वार्षिक निर्यात की बात तो पांच साल पहले पेश निवर्तमान नीति में कही गई थी। लेकिन इन  सीमाओं को ग्लोबल अर्थतंत्र की असाधारण परिस्थितियों के मद्देनजर नजरदांज किया ज सकता है। वर्तमान ऐसी ही व्यावहारिकता की मांग करता है। पर इससे ज्यादा सराहनीय यह है कि उसमें एक अरसे बाद निर्यात सेक्टर को अमेरिका और यूरोप की छाया से मुक्त करने का ठोस प्रयास झलका है। भारत का 70 फीसदी निर्यात सिर्फ तीन ठिकानों-यूरोप, अमेरिका, जपान- को जता रहा है। चूंकि पीछे यही तीनों ठिकाने मंदी के केंद्र बनकर उभरे तो उनकी मांग के साथ-साथ भारत का एक्सपोर्ट सेक्टर भी बैठना ही था। पिछले 10 माह में 30 फीसदी की गिरावट दर्ज करने वाले निर्यात से सबक लेते हुए वाणिज्य मंत्रालय ने अब लातिन अमेरिका और अफ्रीका के कई देशों को निर्यात लक्ष्य घोषित किया है। इसी तरह निर्यातकों के लिए टैक्स छूट और विभिन्न रियायतों को जारी रखने का फैसला भी सही दिशा में है, क्योंकि मजबूत रुपये और विकसित मुल्कों की ठंडी मांग की मार से कराहते निर्यातकों को मरहम की सख्त जरुरत थी।
लेकिन भारतीय निर्यात बाजार की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह मुख्य प्रतिस्पर्धी मुल्कों चीन, बांग्लादेश, विएतनाम और कंबोडिया आदि के मुकाबले 20 फीसदी महंगा माल बेचने पर विवश है। निर्यात कर्जे की महंगी दरें और बेहद ज्यादा लेनदेन लागत इसके प्रमुख कारण हैं जिनका समुचित ध्यान नई विदेश व्यापार नीति में नहीं रखा गया है। विभिन्न प्रोत्साहन स्कीमों के आवेदन की फीस की समाप्ति और इलेक्ट्रानिक ट्रांजेक्शन की सुविधा बढ़ाने की घोषणाओं के जरिए इस दिशा में कुछ प्रयास तो हुआ है लेकिन कुल मिलाकर इन छिटपुट कदमों से खास सुधार होता नजर नहीं आता। बेवजह नहीं कि ज्यादातर निर्यात संगठन इस नीति को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं। निर्यातकों-आयातकों से और अधिक संवाद शायद एक बेहतर विदेश व्यापार नीति की नींव बन सकता था। 

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