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सितारों की चमक

सितारों की चमक

कुछ सप्ताह पहले बिजनेस स्टैंडर्ड की सैटरडे मैगजीन में भारत के सर्वÞश्रेष्ठ भारतीय शेफ्स पर एक लेख पढ़ने को मिला। इस लेख में शेफ्स से अपना पसंदीदा शेफ चुनने के लिए भी कहा गया था। जैसा कि स्वाभाविक था, कुछ शेफ्स (हेमंत ओबेरॉय, इम्तियाज कुरैशी और आनंदा सोलोमन) के नाम बार-बार सामने आए, पर इसी के साथ मुझे शेफ्स द्वारा अपनी पसंद का शेफ चुनने के मामले में खास उदारता भी नजर आई। ओबेरॉय और सोलोमन ने एक दूसरे का नाम चुना, जो एक सुखद अहसास था, क्योंकि दोनों ही देश के सर्वÞश्रेष्ठ शेफ के रूप में खासे जाने जाते हैं। परंतु ओबेरॉय ने लैंड्स एंड्स के प्रतिभाशाली और युवा पेस्ट्री शेफ रोहित सांगवान तथा गोवा के दिग्गज अरबानो डे रेगो को भी चुना। (आनंदा ने भी रेगो को चुना)। पर इस सूची में न जाने क्यों एक नाम गायब था। अधिकतर शेफ ताज और आईटीसी ग्रुप से संबंधित थे (इसके साथ ही कुछ शेफ दिवा, ऑलिव आदि से भी थे)। पर पूरी सूची में मुझे ओबेरॉय के एक भी शेफ का नाम देखने को नहीं मिला। यह अजीब था। ऐसा नहीं है कि ओबेरॉय चेन में अच्छे रेस्तरां नहीं हैं।  यहां तक कि दुनिया के सबसे अच्छे भारतीय शेफ (उदाहरण के लिए विनीत भाटिया और अतुल कोचर) ओबरॉय ग्रुप से ही निकल कर सामने आए हैं। फिर क्या कारण है कि किसी भी शेफ ने ओबेरॉय चेन के किसी भी व्यक्ति का नाम नहीं चुना?

इस बारे में मैं तीन निष्कर्षो पर पहुंचा हूं। पहला, कोई भी भारतीय शेफ चाहे कितनी ही अच्छी तरह से विदेशी कुजीन को पेश करने में माहिर हो, पर उसकी काबिलियत का आकलन उसके भारतीय खाना बनाने की महारत के आधार पर होता है। आनंदा सोलोमन की खास उपलब्धि कोंकण कैफे ही मानी जाएगी, भले ही थाई पैविलियन ज्यादा चलता हो। और मेरे ख्याल से हेमंत ओबेरॉय को जोडिएक ग्रिल के मुकाबले रेस्तरां की वर्क और मसाला सिरीज के लिए ज्यादा याद किया जाएगा।
 
ओबेरॉय चेन ने भारतीय खाने को इस स्तर तक कम आंका है कि उनकी सर्वश्रेष्ठ प्रॉपर्टी (मसलन दिल्ली ओबरॉय) में कोई भी भारतीय रेस्तरां नहीं है, इसलिए ओबेरॉय के शेफ्स को अपनी दक्षता दिखाने का अवसर कम ही मिल पाता है। दूसरा कारण वही पुराना मुद्दा यानी स्थानीय बनाम विदेशी। कई चेन्स में विदेशी शेफ्स अपवाद रूप में ही हैं। मसलन, आईटीसी चाइनीज, थाई और जापानी शेफ्स पर तो काफी पैसा खर्च कर देगा, पर उनकी रसोई में आपको विदेशी शेफ्स की संख्या अधिक नहीं मिलेगी। ताज में, ताज ताज के शेफ्स बहुत तरीके से विदेशी शेफ्स के ऊपर हावी रहते हैं (पूर्व से आए शेफ्स को छोड़कर) और बहुत कम ही यूरोपीय और अमेरिकी शेफ्स उस वातावरण में उभर पाते हैं। (इसमें कुछ महत्त्वपूर्ण अपवाद भी हैं, मद्रास में प्रेगो, दिल्ली में ऑरिएंट एक्सप्रेस और कुछ अन्य भी, पर इस तरह की संख्या बहुत कम ही है।)

हालांकि ओबेरॉय चेन विदेशी शेफ्स का बखूबी इस्तेमाल करने में माहिर है। यही वजह है कि उनके यहां सर्व होने वाला यूरोपियन फूड काबिले तारीफ होता है। हालांकि समस्या यह है कि यदि कोई यूरोपीय इटैलियन रेस्तरां और कोई चीनी चाइनीज रेस्तरां चलाएगा  तो भारतीय शेफ अपनी महारत साबित करने कहां जाएंगे? शेष बचती हैं तो सिर्फ कॉफी शॉप्स। इसके विपरीत ताज में भारतीय शेफ्स को विदेशी कुजीन पर महारत दिखाने का मौका मिलता है। यहां के शेफ्स ने सत्तर के दशक में ही सिचुआन फूड बनाना सीख लिया था। इसी तरह आईटीसी में भी भारतीयों के हाथों में ही पूरी कमान है।

तीसरा कारण, जो शायद सबसे महत्त्वपूर्ण है कि ताज और आईटीसी अपने शेफ्स को लोगों की नजरों में चढ़ने का पूरा मौका देते हैं। ऐसा क्यों होता है कि जिनके बारे में आपने सुना होता है वे आईटीसी और ताज के कर्मचारी होते हैं? यह एक दार्शनिक प्रश्न है। आधुनिक ताज ने सिलेब्रिटी शेफ की परंपरा दिग्गज मास्की से पाई थी, जिन्होंने कई दशकों तक बंबई ताज की रसोइयां संभाली थीं और सत्तर की शुरुआत तक यह जिम्मेदारी निभाई थी। मास्की के रिटायर होने के बाद ताज का संचालन कर रहे अजित केरकर ने कम उम्र के सतीश अरोड़ा पर जुआ खेला। अरोड़ा इस काम में बराबरी से भी ज्यादा साबित हुए। उन्होंने उस समय पंजाबी मास्टर शेफ्स की एक नई पौध तैयार की, जिसने ताज की किचन्स में अपनी लौह कलाइयों का जलवा दिखाया। 

ताज ही एकमात्र ऐसी चेन थी, जिसमें किसी भी रेस्तरां की लॉन्चिंग के समय मीडिया के समक्ष रेस्तरां के बारे में बताने के लिए शेफ को पेश किया जाता था। थाई पैवेलियन को हमेशा आनंदा के रेस्तरां के तौर पर ही याद रखा जाएगा। दिल्ली में बेहतरीन मचान, तपस भट्टाचार्य द्वारा संचालित किया जाता है। एक ऐसा शेफ मैनेजर, जो रेस्तरां का पब्लिक फेस है, जो अपने यहां नियमित आने वालों को पहचानता है और अच्छे स्तर का भोजन सर्व करने के लिए जिम्मेदार है। आईटीसी में किचन फिलॉसफी पूरी तरह शेफ आधारित है, पर यह ताज से अलग है। जब से अजित हक्सर, इम्तियाज कुरैशी को लाए हैं और आईटीसी के भारतीय खाने की शुरुआत की है, तब से चेन ने हमेशा यह देखा है कि उत्तर भारतीय कुजीन कैटरिंग कॉलेज ग्रेजुएट्स के मुकाबले परंपरागत शेफ्स द्वारा अच्छा बनाया जाता है।

इसलिए इसने एक मास्टर शेफ प्रोग्राम बनाया है, जिसके तहत भारत के श्रेष्ठतम रसोईयों और उनके परिवारों को हायर करके उन्हें परंपरागत रेसिपीज को छोड़कर नई-नई तरह की डिश ईजाद करने के लिए कहा जा रहा है। आईटीसी ने अपने मास्टर शेफ प्रोग्राम को इतनी गंभीरता से लिया है कि यहां टॉप शेफ्स को बेहद आकर्षक वेतन मिलता है और पूरा प्रोग्राम एक वरिष्ठ व्यक्ति की देख-रेख में संचालित किया जाता है। मास्टर शेफ प्रोग्राम ने कॉरपोरेट मैनेजमेंट के हर नियम को तोड़ दिया है, परंतु यह आईटीसी की उस सोच का परिणाम है, जिसके अनुसार महान शेफ्स एक कलाकार की तरह हैं और उनके साथ कलाकार की तरह ही व्यवहार किया जाना चाहिए। इस सफलता का सुबूत है आईटीसी के भारतीय खाने की क्वालिटी। जब बुखारा दुनिया के सर्वÞोष्ठ रेस्तराओें में शुमार होता है या जब दम पुख्त की इस तरह तारीफ की जाए कि यह रेस्तरां थ्री मिशेलिन स्टार्स के योग्य हैं तो यह कोई संयोग या अनायास सफलता नहीं है। यह नतीजा है शेफ्स को मिलने वाली केयर और तवज्जह का। स्मोकहाउस ग्रिल, ऑलिव, ऑरस, केपरबेरी आदि स्टैंडएलोन्स की नई खेप की सबसे ज्यादा दिल को छूने वाली बात यह है कि ये सब शेफ आधारित रेस्तरां हैं। यहां तक कि बैंगलुरू का ऑलिव भी। मेरा मानना है कि भारतीय डाइनिंग में यह एक बड़ा परिवर्तन दिवा की रितु डालमिया जैसे शेफ्स की सफलता से संभव हो पाया है, जिनकी लोकप्रियता अब पूरे भारत में फैल चुकी है। मैंने गोवा में उनके साथ डिनर किया था और मैंने पाया कि वहां भी लोग उन्हें जानते हैं। आखिरकार शेफ्स को वो सम्मान मिल रहा है, जिसके वे हकदार हैं। और मुझे आशा है कि उन्हें इससे भी ज्यादा मिलेगा।

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