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23 फरवरी, 2020|7:40|IST

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दो टूक (28 अगस्त, 2009)

ग्राम पंचायतें पहले भी मुंह चिढ़ा रही थीं, अब भी चिढ़ा रही हैं। वे शहरों को बता रही हैं कि महिला आरक्षण को कैसे सफल बनाया जाता है। संसद में जहां 13 साल से 33 फीसदी आरक्षण का बिल धक्के खा रहा है वहीं पंचायतें 33 फीसदी से भी आगे बढ़कर 50 फीसदी तक पहुंच गईं।

चौबीस साल पहले जब राजीव गांधी ने पंचायतों में महिला आरक्षण का सपना देखा था, फिजां में कई अंदेशे थे। लगता था कि सिस्टम चलेगा नहीं, औरतों के पीछे से मर्द ही पंचायतें चलाएंगे। शुरू के कुछ बरस ऐसा हुआ भी। लेकिन बाद में लक्ष्मियां और दुर्गाएं अपने सच्चे रूप में आ गईं। आज पंचायतों में उनका सिक्का जम चुका है। क्या विधायिका में उनका रास्ता रोकने वाले विघ्नसंतोषी इससे कुछ सबक लेंगे?

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  • Web Title:दो टूक (28 अगस्त, 2009)