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संघ बनाम भाजपा किसकी डोर किसके हाथ

भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी जंग इस समय शिखर पर है, लेकिन उसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब लालकृष्ण आडवाणी से जिन्ना प्रकरण पर इस्तीफा मांगा गया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सर संघचालक के.एस. सुदर्शन का जिन्ना मामले पर आडवाणी से इस्तीफा मांगना मौजूदा गुटबाजी की वजह है, तभी भाजपा के आला नेता दो हिस्सों में बंट गए थे। आडवाणी ने कराची में जिन्ना की मजार पर दिए भाषण में पाकिस्तान को पाक की संविधान सभा में 1 जुलाई 1948 का भाषण याद दिलाया था। इस भाषण में जिन्ना ने ऐसे सेक्युलर पाक की परिकल्पना की थी जिसमें मुसलमानों के अलावा दूसरे धर्मावलंबी भी बराबर के अधिकारों के साथ रहेंगे।

असल में यह पाक को नसीहत थी कि वे कायद-ए-आजम के सपनों का पाक नहीं बना सके अलबत्ता धर्माध देश बना लिया। पहले से खार खाए बैठे विश्व हिंदू परिषद ने इसे जिन्ना को सेक्युलर बताना करार देकर आडवाणी के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। के.एस. सुदर्शन संघ चालक बनने से पहले संघ की तरफ से भाजपा के प्रभारी रहे थे। यह पहली बार हुआ था कि कोई सर संघचालक ऐसा बना हो, कभी राजनीतिक दल (जनसंघ या भाजपा) का प्रभारी रहा हो। प्रभारी रहते समय पार्टी नेताओं के बारे में बनी उनकी धारणा उनके मस्तिष्क पर थी, उसी की प्रतिक्रिया आडवाणी से इस्तीफा मांगने के रूप में सामने आई। संघ के प्रचारक रहे आडवाणी ने भाजपा की चेन्नई बैठक में पहली बार भाजपा की रोजमर्रा जिंदगी में संघ के दखल पर कड़ा एतराज करके संघ चालक से अपनी नाराजगी का इजहार कर दिया था।

लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष पद से मुक्त तो हो गए लेकिन पार्टी नेतृत्व में गुटबाजी की शुरुआत उसी दिन हो गई थी। आडवाणी को गलत मुद्दे और गलत समय पर हटाए जाने से उनके समर्थकों के मन में संघ की कार्यशैली के खिलाफ गांठ बंध गई थी। संघ की पसंद से भाजपा अध्यक्ष बने राजनाथ सिंह ने पिछले चार सालों में संघ का दखल लगातार बढ़ने दिया। इससे भाजपा का राजनीतिक विकास थम गया। उनका हर फैसला आरएसएस से निर्देशित दिखाई देने लगा। विधिवत अध्यक्ष बनने के बाद फरवरी 2007 में राजनाथ सिंह का पहला फैसला ही गुटबाजी को बढ़ाने वाला था। उनके इस फैसले ने लालकृष्ण आडवाणी और उनके समर्थकों को ही आहत नहीं किया अलबत्ता पार्टी काडर को भी आहत किया।

उनका वह फैसला था गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी के संसदीय बोर्ड से हटाना। दूसरा फैसला तो खुद को गुटबाजी का केंद्र बिन्दु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला साबित हुआ। यह फैसला था अरुण जेटली को पार्टी के प्रवक्ता पद से हटाना। असल में राजनाथ सिंह ने अपने बराबर की हैसियत रखने वाले आडवाणी खेमे के जेटली, मोदी, अनंत, वैंकेया को किनारे करने की सिलसिलेवार कोशिश शुरू कर दी थी। लालकृष्ण आडवाणी भी सारी बातों को देख ही रहे थे, इसलिए राजनाथ सिंह जब कार्यकारिणी की सूची लेकर उनके पास पहुंचे थे, तो उन्होंने देखने से भी इंकार कर दिया था। जबकि राजनाथ सिंह ने संसदीय बोर्ड से लेकर कार्यकारिणी तक आडवाणी की सहमति से बना हुआ बताने की कोशिश की।

डेढ़ साल पहले आडवाणी और राजनाथ खेमों की लड़ाई भाजपा की बेंगलुरु कार्यकारिणी में खुलकर सामने आ गई थी। जब आडवाणी और नरेन्द्र मोदी ने कार्यकारिणी में दिए गए अपने भाषणों को प्रेस के सामने पेश करने के लिए अपने खेमे के प्रतिनिधियों को भेजा जबकि राजनाथ सिंह ने अपने पक्ष में पार्टी प्रवक्ताओं को पेश किया। नरेंद्र मोदी प्रचार के मामले में राजनाथ सिंह पर भारी पड़ गए थे, क्योंकि उनका तरीका वैज्ञानिक था। जबकि पार्टी अध्यक्ष होने के बावजूद राजनाथ सिंह की रिपोर्टिग नहीं हुई।

पहले से ही हीनभावना के शिकार राजनाथ सिंह ने और हमलावर रुख अपनाना शुरू कर दिया। कर्नाटक विधानसभा चुनावों से पहले टिकटों के बंटवारे में यह गुटबाजी और खुलकर सामने आई। आडवाणी के करीबी अनंत कुमार को औकात बताने के लिए राजनाथ सिंह ने अपेक्षाकृत ज्यादा जमीन से जुड़े येदुरप्पा को संरक्षण दिया। हालांकि चौकड़ी से फिर आडवाणी भी यही किया करते थे, उन्होंने अनंत कुमार के प्रभाव में कर्नाटक में जमीन से जुड़े येदुरप्पा जैसे नेताओं को किनारे कर रखा था। आंध्र प्रदेश में वंकेया के प्रभाव में नरेंद्र और बंडारू दतात्रे जैसे जमीन से जुड़े पुराने नेता किनारे कर दिए गए थे। राजनाथ सिंह ने आडवाणी खेमे के सभी दिग्गज नेताओं के विरोधियों को हवा देनी शुरू की।

बंडारू दतात्रे को आंध्र प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया, कर्नाटक में येदुरप्पा के रूप में उन्हें अनंत कुमार से बड़ा नेता मिल गया, उत्तराखंड में भुवन चंद्र खंडूरी के मुकाबले भगत सिंह कोश्यारी तो राजस्थान में वसुंधरा राजे के सामने ओम माथुर को खड़ा करने की कोशिश हुई जिससे गुटबाजी में तलखी बढ़ गई। लालकृष्ण आडवाणी और उनके खेमे ने राजनाथ सिंह के हर फैसले का विरोध करना शुरू कर दिया। के.एस. सुदर्शन के भाजपा में सीधे दखल के कारण पिछले पांच सालों में पार्टी ऊपर से नीचे तक दो गुटों में बंट चुकी है।

लोकसभा चुनावों की जिस तैयारी के साथ लालकृष्ण आडवाणी कूदना चाहते थे, वह चुनावों से पहले ही धूल धूसरित हो गई थी। राजनाथ सिंह के लोकसभा चुनाव लड़ने के ऐलान को आडवाणी खेमे ने सहजता से नहीं लिया था। आडवाणी खेमे के मुताबिक राजनाथ की निगाह प्रधानमंत्री पद या विपक्ष के नेता पर लगी थी। चुनावों के दौरान पैसे की कमी ने भी दोनों गुटों में वैमनस्य बढ़ा दिया था। लालकृष्ण आडवाणी खेमे के हाथ में चुनाव प्रचार की बागडोर दी गई लेकिन पैसे का नियंत्रण राजनाथ खेमे के हाथ में था। राजनाथ के करीबी नेताओं ने प्रचार और रणनीति के लिए अनंत कुमार के घर पर बनाए गए ‘वार रूम’ में जाना बंद कर दिया था।

चुनावों के दौरान ही भाजपा का ‘वार रूम’ भूत बंगला बन चुका था। आडवाणी खेमे को हार स्पष्ट दिखाई देने लग गई थी और वे हार का ठीकरा राजनाथ सिंह पर फोड़ रहे थे। लालकृष्ण आडवाणी को उम्मीद थी कि वह विपक्ष के नेता का पद नहीं लेने का ऐलान करेंगे तो राजनाथ सिंह भी अध्यक्ष पद छोड़ने का ऐलान करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता आडवाणी की यह बाजी पलटती हुई दिखाई देने लगी क्योंकि उनके हटने पर विपक्ष के नेता पद पर राजनाथ का दावा ज्यादा पक्का हो जाता, इसलिए वह पद से पीछे हट गए।

अब दोनों ही गुटों में लड़ाई लुका-छिपी की नहीं है, राजनाथ सिंह ने प्रमोद महाजन की सक्रियता के चलते महाराष्ट्र में राजनीतिक बियाबान में रहे बाल आप्टे को चुनाव समीक्षा की बागडोर सौंपकर आडवाणी खेमे को कटघरे में खड़ा किया। तो अनंत कुमार ने शिमला बैठक में बाल आप्टे को समीक्षा की जिम्मेदारी सौंपने पर ही सवाल उठा दिया।

अब लड़ाई वसुंधरा, खंडूड़ी, शौरी, जसवंत या यशवंत की नहीं। लड़ाई पार्टी पर कब्जे और कुर्सी पाने की है। राजनाथ सिंह अध्यक्ष पद से हटने से पहले भविष्य का पद सुरक्षित करना चाहते हैं, जबकि लालकृष्ण आडवाणी पार्टी को राजनाथ से मुक्त कराकर अपने खेमे में लाने की कोशिश में जुटे हैं। अध्यक्ष पद के चुनाव से पहले दोनों खेमे एक-दूसरे को कमजोर करना चाहते हैं। इसलिए यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जबकि नए अध्यक्ष का फैसला नहीं होता। उधर मोहन भागवत के सर संघचालक बनने के बाद स्थिति बदल चुकी है। भागवत उस तरह आडवाणी के खिलाफ नहीं हैं, जिस तरह के.एस. सुदर्शन थे। वह पार्टी के रोजमर्रा काम में दखल के भी खिलाफ थे।

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