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कार्बोरेटर

कार्बोरेटर का इस्तेमाल ईंधन के आंतरिक दहन में होता है। कार्ल बेंज ने इसका आविष्कार 1880 में किया था और 1886 में इसका पेटेंट करवाया था। कार्बोरेटर शब्द, फ्रेंच के कारब्योर से आया है, जिसका मतलब होता हैं कार्बाइड। फ्यूल केमिस्ट्री के मुताबिक कार्बोरेटर ईंधन में कार्बन की मात्रा को वाष्पशील हाइड्रोकार्बन से क्रिया करने के बाद बढ़ाता है।

आमतौर पर यह हवा और ईंधन को मिक्स करने का काम करता है। 80 के दशक तक यह डिवाइस ईंधन के दहन की प्राथमिक डिवाइस हुआ करती थी। फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम के बढ़ते प्रयोग ने कार्बोरेटर के इस्तेमाल को कम कर दिया। वर्तमान में कारों में कार्बोरेटर का उपयोग कम होने लगा है हालांकि मोटरसाइकिलों में इसका इस्तेमाल आज भी होता है।

कार्बोरेटर एक ट्यूब का बना होता है, इसे संतुलित करने के लिए प्लेट लगी होती है, जिसे थ्रोटल प्लेट कहा जाता है, जो कि हवा के फ्लो को नियंत्रित करती है। इंजन के स्टार्ट होने पर कितनी हवा आ रही है, उसको मिश्रित करने का काम करता है। कार्बोरेटर के संकरे हिस्से को वेंचुरी कहा जाता है, इसमें लगे जेट के द्वारा वैक्यूम, ईंधन को खींचता है। भौतिकी के बरनोली सिद्वांत के अनुसार हवा की स्पीड, उसके दबाव को प्रभावित करती है। इसी सिद्वांत पर कार्बोरेटर काम करता है। ऐसे में अगर कार्बोरेटर हवा और ईंधन को मिश्रित करने में गड़बड़ी कर दें तो इंजन सही से काम नहीं करेगा।  मतलब यदि दानों का मात्रात्मक अनुपात ज्यादा हो जाए, तो इंजन काम नहीं करेगा और कम हो जाए तो इंजन के खराब होने का खतरा।

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