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भटकी भाजपा का भविष्य

भारत सूखे की जकड़ में है, जिसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे। सूखे से गंभीर आर्थिक और सामाजिक समस्या उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे समय में कार्यपालिका की जवाबदेही के लिए सशक्त विपक्ष सबसे जरूरी है। प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी में जो हो रहा है, वह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक है। भाजपा, जो आंतरिक मतभेदों के कारण कमजोर हो गई है, अब विश्वसनीय विपक्ष की भूमिका मुश्किल से निभा सकती है। क्षेत्रीय पार्टियां भी अकेले सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा सकतीं। कुछ क्षेत्रीय पार्टियां तो औपचारिक रुप से कांग्रेस के साथ हैं और कुछ बाहर से सरकार को समर्थन दे रही हैं।

भाजपा का भविष्य क्या है? टेलीविजन पर जसवंत सिंह ने प्रश्न पूछा कि देश के सम्मुख 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने लायक बनाने के लिए क्या भाजपा आत्मविश्लेषण करेगी? ये चुनौतियां क्या हैं और किस तरह के आत्मविश्लेषण की आवश्यकता है? भारत की मुख्य चुनौतियां हैं- गरीबी दूर करना, आम जनता को मूलभूत स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना, शिक्षा में सुधार लाना, लाखों बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराना, कृषि उत्पादकता बढ़ाना और देश को विश्व अर्थव्यवस्था की शक्ति बनाना। 

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को ज्यादातर भारतीयों ने समर्थन दिया था, क्योंकि उनकी नीतियों ने विकास और समृद्धि की आशा जगाई थी। वाजपेयी सरकार की नीतियों से युवा वर्ग के मन में, जो भारत की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है, बेहतर टेलीकॉम, अच्छी सड़कें, आधुनिक सूचना तकनीक और संपन्न शहरी मध्य वर्ग का सपना जगा था। बहुत कम भारतीयों ने उन्हें इसलिए वोट दिया था, क्योंकि वह हिन्दूवादी राजनीति का नेतृत्व कर रहे थे।

वाजपेयी विचारधारा संबंधी मतभेदों में संतुलन बनाने में सफल रहे। उनके नेतृत्व में एनडीए सरकार का जोर आर्थिक विकास और समृद्धि पर रहा, जो नए भारत की अपेक्षाओं के अनुसार ही था। लेकिन सन् 2004 के आम चुनाव में एनडीए पराजित हो गया। संसद में भाजपा के सांसदों की संख्या में मामूली कमी आई। इसका मुख्य कारण चुनाव में गलत गठबंधन था। गुजरात के दंगों से भाजपा नेतृत्व की कमजोरी, संवेदनहीनता और जनता की नब्ज पर हाथ न होने की बात सिद्ध हो गई।

विकास के साथ सामाजिक सौहार्द बनाए रखने में सरकार विफल रही। सन् 2004 के बाद जो हुआ, उससे भ्रम के बादल और गहरे हो गए। आम आदमी के लिए यह समझना मुश्किल हो गया कि भाजपा की नीतियां क्या हैं? क्या यह हिन्दू बहुमत के राज की पक्षधर पार्टी है? हिन्दुत्ववादी नीतियों का अर्थ क्या है? आज की युवा पीढ़ी बेहतर जीवन और अच्छे रोजगार की अपेक्षा करती है, जबकि देश के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान मुख्य जन आकांक्षा आत्मनिर्भरता पर केन्द्रित थी।

हम इस तथ्य को पसंद करें या न करें, सच यही है कि दुनिया बदल चुकी है। तकनीकी की ताकत, पूंजी और सूचना प्रौद्योगिकी के प्रवाह से दुनिया एक गांव में तबदील हो चुकी है। आज हमारे आर्थिक विकास के साथ राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व भी जुड़ा है। औचित्य खो चुके अतीत के विचारों का भविष्य में कोई उपयोग नहीं है। एक अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर आधारित दो या तीन राजनीतिक दल ही होने चाहियें। राजनीति में धर्म के घालमेल और क्षेत्रीय राजनीति के कारण प्रमुख आर्थिक और सामाजिक समस्याएं पीछे रह जाती हैं। ऐसे में 21वीं सदी के अनुरूप खुद को ढालने के लिए भाजपा को क्या करना चाहिए?

पहली और सबसे जरूरी बात यह है कि भाजपा को बांटने वाली अपनी नीति त्यागनी चाहिए। समग्र विकास की बात मात्र एक नारा नहीं है। इसका अर्थ है, जति और धर्म से ऊपर उठकर विकास का लाभ समाज के सभी वर्गो को मिलना। जो राजनीतिक दल यह मार्ग अपना रहे हैं, वास्तव में वे ही राष्ट्र के मौजूदा सोच के प्रतिविंब हैं।

दूसरा काम है, एक ऐसा वृहत आर्थिक और सामाजिक मंच प्रदान करना जिसमें क्षेत्रीय दल और संगठन सक्रिय सहयोग दे सकें और भाजपा से जुड़ सकें। अटल बिहारी वाजपेयी की नीतियों के कारण ही एआईडीएमके, डीएमके, जनता दल (यूनाइटेड), बीजू जनता दल, अकाली दल, तृणमूल कांग्रेस जैसी क्षेत्रीय पार्टियां सरकार में शामिल हुई थीं। अब एनडीए का अस्तित्व समाप्त भले ही न हुआ हो, पर बिखर जरूर गया है। भारत में संकीर्ण भावना व नीतियों के आधार पर शासन नहीं किया जा सकता।

सरकार चलाने के लिए सदैव ऐसी नीतियां अपनानी पड़ेंगी जो विभिन्न विचारधारा से जुड़े सभी वर्गो को स्वीकार हों। भाजपा को ऐसी प्रगतिशील नीतियां अपनानी होंगी, जो मौजूदा यूपीए सरकार से बेहतर भविष्य का वायदा करती हों। वैकल्पिक आर्थिक नीतियों के आधार पर भाजपा को पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों में जनसमर्थन जुटाने का प्रयास करना चाहिए।  तीसरी बात यह है कि प्रत्येक राजनीतिक दल में सत्ता और पद के लिए अंदरुनी संघर्ष होता ही है। भाजपा को इस बात पर गर्व था कि वह एक अलग तरह का दल है। अनुशासन, नैतिकता और आर्थिक ईमानदारी को लेकर उसका अपना दावा था। इन मूल्यों को पहुंची क्षति की भरपाई के लिए तुरंत कदम उठाए जाने चाहिए।

संकट की घड़ी में आरएसएस ने सदैव भाजपा की मदद की है। अब उसे मूक दर्शक नहीं बने रहना चाहिए। भाजपा को पटरी पर लाने, अनुशासित करने और भविष्य के लिए नया दृष्टिकोण अपनाने में संघ को मदद करनी चाहिए। भाजपा जैसी कैडर आधारित पार्टी में अनुशासन और विश्वास की कमी का परिणाम बिखराव ही होता है। पार्टी के नेतृत्व को समझदारी और धैर्य से अपनी नीतियों में ऐसा बदलाव लाना होगा, जो भारत के बहुआयामी सामाजिक ढांचे के अनुकूल हो। यह काम चिंतन बैठक जैसे संकीर्ण उद्देश्यों से कहीं बड़ा है। ऐसा आर्थिक और सामाजिक समग्र कार्यक्रम तैयार करना, जो भेदभाव से ऊपर हो तथा विभिन्न राजनैतिक व सामाजिक संगठनों को आकर्षित करे, वर्तमान भाजपा नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती है।

देश का शहरी मध्यम वर्ग ऐसी नीतियों का समर्थन करेगा, जो भारत को विकसित देशों की कतार में खड़ा कर सके और इस प्रक्रिया से मिली समृद्धि का कुछ अंश उसके हिस्से में भी आए। भारत को एक सक्रिय और सशक्त विरोधी दल की आवश्यकता है। भाजपा आज इतिहास के चौराहे पर खड़ी है। मामूली शक्ित से सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाला दल या तो बिखर सकता है अथवा आधुनिक भारत की अपेक्षाओं के अनुरुप स्वयं को ढालकर फिर अपनी खोई ताकत पा सकता है। कौन सा मार्ग चुनना है, यह भाजपा को ही तय करना है।

nandu@ nksingh. com

लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केन्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं

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