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उनींदी हुई मंदी

क्या दुनिया भर की नींद उड़ा देने वाली मंदी अब खुद जम्हाइयां ले रही है? क्या पश्चिम में फिर से विकास के अंकुर फूट चले हैं? इशारे तो कुछ ऐसे ही मिल रहे हैं, लेकिन यह देखना दिलचस्प है कि स्वाइन फ्लू और माइकल जैक्सन की खबरों के बोझ से हांफ रहे विश्व मीडिया को महामंदी की सिकुड़न के संकेत उतना नहीं चौंका रहे, जितना कि उसके फैलाव के हादसों ने चौंकाया था।

न्यूज चैनलों के पास भले ही आज उनका नोटिस लेने की फुरसत न हो, लेकिन वे संकेत अब बड़े स्पष्ट हो चले हैं, जो बताते हैं कि विश्व अर्थव्यवस्था गहन चिकित्सा कक्ष से बाहर आ रही है और इसी वित्तवर्ष में उसे अस्पताल से छुट्टी मिल सकती है। नोबेल विजेता सुविख्यात अर्थशास्त्री पॉल क्रूगमैन का यह बयान खासा अहम है कि मंदी का अंत शुरू हो चुका है और पूर्ण रिकवरी ज्यादा से ज्यादा 24 माह की बात है। क्रूगमैन कह रहे हैं कि सरकारी प्रोत्साहन पैकेजों की बदौलत अब इकॉनमी स्थिर होने लगी है।

उधर ब्रिटेन में भी ‘द इंडिपेंडेट’ अखबार का ताजतरीन सर्वेक्षण बता रहा है कि शीर्ष कारोबारी हस्तियों में उन लोगों की तादाद तेजी से बढ़ी है, जो मानते हैं कि रिकवरी शुरू हो गई है और इसी साल के अंत तक तस्वीर पलट जाएगी। चूंकि इस वैश्विक मंदी की जड़ें अमेरिका और ब्रिटेन के हाउसिंग लोन बाजार की ओवरहीटिंग में ही हैं, इन दोनों मुल्कों से आते ये संकेत समूचे ग्लोबल अर्थतंत्र के लिए गहरे अर्थ रखते हैं।

खासतौर पर भारत और चीन जैसे एशियाई मुल्कों के लिए जिनकी अर्थव्यवस्था में इंजन की भूमिका निभाने वाला निर्यात सेक्टर पश्चिम की मंदी की वजह से ठिठका हुआ है। हालांकि घरेलू मोर्चे पर भारत में अच्छे इशारों की कमी नहीं है। सूखे की तमाम आशंकाओं के बावजूद वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस सप्ताह 9 फीसदी विकास दर की उम्मीद बंधाई है। स्टैंडर्ड एंड पूअर जैसी संस्थाएं भारत की रेटिंग सुधार रही हैं। शेयर बाजार में खासे सफल रहे आईपीओ इश्यू भी निवेशकों के भरोसे की बहाली दर्शा रहे हैं। बस उम्मीद यही है कि विदेशों से अशुभ खबरों की आमद इसी तरह थमी रहे ताकि भारत में फिर से कम ब्याज दरों और सस्ते पेट्रोल वाला सुहाना दौर लौटे और नेगेटिव मुद्रास्फीति आंकड़ों में ही नहीं, आम जिंदगी की हकीकत में भी महसूस की जा सके।

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