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कीमोथरेपी के मेंटल साइड इफैक्ट्स और रोकथाम

आजकल जिस प्रकार कैंसर के ज्यादा से ज्यादा मरीज कीमोथरेपी की वजह से जिंदा रहकर लगभग सामान्य जैसा जीवन जीते आ रहे हैं, उसे देखते हुए कीमोथरेपी के साइड इफैक्ट पर भी लोगों का ध्यान जाने लगा है, इसे ‘कीमो-ब्रेन’ का नाम दिया गया है। कैंसर का शायद ही कोई ऐसा मरीज होगा, जिसे चाहे कुछ समय के लिए ही सही, कीमोथरेपी के कारण याददाश्त या एकाग्रता कमजोर होने की शिकायत न हुई हो। लेकिन इनमें से 15 प्रतिशत मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें कीमोथरेपी की वजह से लंबे समय तक मानसिक गड़बड़ियों से जूझना पड़ता है। मेडिकल साइंस में इसे ‘कीमोथरेपी इंड्यूस्ड कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट’ कहा जाता है।

दिमाग पर वाकई होता है असर
इस मानसिक साइड इफैक्ट के लक्षण साफ हैं: मानसिक तौर पर अस्पष्टता की स्थिति, जैसे चीजें याद रखने में परेशानी, बोलते-बोलते शब्द भूल जाना, कहीं फोकस न कर पाना, किसी की कही गई बात को ठीक से ग्रहण न कर पाना, गणितीय क्षमता का ह्रास, अपनी प्राथमिकताएं तय न कर पाना वगैरह, वगैरह।

कीमोथरेपी का ऐसा विपरीत असर किस पर पड़ेगा, और किस पर नहीं, इस बारे में डॉक्टर भी कुछ नहीं कह पाते। लेकिन जो मरीज इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं, उनके दिमाग का कॉग्निटिव (यानी संज्ञान लेने वाला) तंत्र तकरीबन काम करना बंद कर देता है। इसके लक्षण ऐसे लोगों में ज्यादा दिखाई पड़ते हैं, जो बड़ी जिम्मेदारियां निभाते हैं, और जिन्हें एक साथ कई-कई तरह के काम करने पड़ते हैं।

दो साल पहले जेन ग्रोस ने ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में ‘कीमो-ब्रेन’ के बारे में लिखा था कि कई साल तक इसके वजूद से इनकार करने के बाद आखिर मेडिकल साइंस ने मान लिया है कि इसके लक्षण महज कपोल कल्पना नहीं हैं। कुछ मनोचिकित्सक ‘कीमो-ब्रेन’ के लक्षणों को कीमोथरेपी या हॉरमोन संतुलन के असर के बजाय एंग्जायटी, मानसिक अवसाद, तनाव, दबाव और भय या थकान का नतीजा मानते हैं। ताजा अध्ययनों में कई अन्य प्रभावों को शामिल करके इस बात का विश्लेषण किया गया है कि कैंसर के इलाज से पहले और बाद में मरीज का दिमाग किस प्रकार काम करता है। इनसे पता चला कि कीमोथरेपी का दिमाग पर वाकई असर पड़ता है, और कई मरीजों पर तो ये स्थायी होता है।

पढ़ने योग्य किताबें
अब इस विषय पर दो नई किताबें भी आ चुकी हैं: पहली, ‘बोस्टन ग्लोब’ की एडिटर ऐलेन क्लैग की ‘कीमो-ब्रेन’ और दूसरी डैनियल सिल्वरमैन और आइडैल डेविडसन की ‘योर ब्रेन आफ्टर कीमो’। सिल्वरमैन कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर में न्यूरो-न्यूक्लियर इमेजिंग सेक्शन के हेड हैं, जबकि हैल्थ जर्नलिस्ट डेविडसन स्वयं ब्रेस्ट कैंसर की मरीज रह चुकी हैं। ऐलेन क्लैग की किताब ज्यादा टैक्नीकल है, जिसमें रिसर्च की तफसील का इतना ज्यादा विश्लेषण किया गया है, कि आम पाठक इसका उपशीर्षक ‘हाउ कैंसर थरेपीज कैन अफैक्ट योर माइंड’ देखकर ही चकरा जाए। इसके बजाय दूसरी किताब ‘योर ब्रेन आफ्टर कीमो’ पाठकों के समझने के लिहाज से ज्यादा उपयोगी लगती है। इस किताब का सब-टाइटल ही सब कुछ कह देता है: ए प्रैक्टिकल गाइड टु लिफ्टिंग द फॉग एंड गेटिंग बैक योर फोकस। किताब में पूरे विवाद को समझते हुए रिसर्च रिपोर्ट्स का हवाला देकर बताया गया है कि ये समस्या असली है, हालांकि कीमोथरेपी के बगैर भी ऐसी समस्याओं से रूबरू होना पड़ सकता है।

सिल्वरमैन और डेविडसन की किताब में स्तन कैंसर की मरीज 34 साल की एक फोटोग्राफर को उद्धृत किया गया है। उसका कहना है: मुझे दिमागी काम करने में काफी जोर लगाना पड़ता है और लगता है कि दिमाग ने चीजों को ग्रहण करना ही बंद कर दिया है। इस किताब के मुताबिक - एक और मरीज, 58 साल के रेडियोलॉजिस्ट पैट्रिक को ‘नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा’ के इलाज के लिए तब अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी, जब उसे लगा कि वह गलतियां कर रहा है। पैट्रिक के शब्दों में: मैं बेवजह अपनी जगह से उठकर कहीं और चला जता, और जब फिर लौटकर आता, तो मुझे सैम्पल्स की जांच नए सिरे से शुरू करनी पड़ती।

इस किताब के अनुसार - एक बार तो ऐसा भी हुआ कि पैट्रिक घर का सामान खरीदने के लिए अपनी बीवी को लेकर सुपरमार्केट गए, सामान खरीदने के बाद दोनों मियां बीवी ने मिलकर ही सामान कार में लादा, लेकिन पैट्रिक महाशय बीवी को कार में बैठाए बगैर सिर्फ सामान लेकर ही घर लौट गए। इसी प्रकार वे एक बार गैस चूल्हे पर चढ़े कुकर को उतारना ही भूल गए, और हादसा होते-होते बचा। अपने ऐसे भुलक्कड़ स्वभाव से परेशान होकर पैट्रिक ने आत्महत्या की भी योजना बना ली। आखिर मनोचिकित्सक से इलाज करवाना पड़ा, जिससे डिप्रैशन तो ठीक हो गया, लेकिन विभ्रम की बीमारी से आज तक पैट्रिक का पीछा नहीं छूटा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

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