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जिन्ना के बहाने बेस्ट सेलर

कोई आलेख या पुस्तक लिखते समय कुछ चटपटा मसाला भर देना या किसी भी धारणा अथवा विश्वास का बेदर्दी से विखंडन कर देना, सिर्फ इसलिए कि आलेख हिट हो जाए या पुस्तक बेस्ट सेलर बन जाए, किसी भी पहलू से उचित नहीं है। भाजपा के (अब भूतपूर्व) कद्दावर नेता जसवंत सिंह ने अपनी नवीन पुस्तक ‘जिन्ना : भारत विभाजन के आईने में’, देश विभाजन की सारी जिम्मेदारी नेहरू-पटेल के सर मढ़ दी है और पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना को सच्च धर्मनिरपेक्ष बता दिया है। उनकी पुस्तक तो बेस्ट सेलर बन जएगी और भाजपा से निष्कासन के बाद शायद उन्हें निशान-ए-पाकिस्तान से भी नवाज जाए, मगर यह तो कोई बताए कि विभाजन के दौरान जो लाखों लोग बेघर हुए, लूटे गए, मारे गए, हजरों अस्मतें लुट गईं, उस वहशीपन को बढ़ावा कैसे मिला?
 डॉ. आर. के. मल्होत्रा, नई दिल्ली

अपने ही हैं जनवरों के दुश्मन
कोलकाता के चिड़ियाघर से आठ ब्राजीलियन बंदरों की चोरी की घटना अप्रत्याशित है। इसके लिए चिड़ियाघर के कर्मचारी और सुरक्षाकर्मी दोषी हैं। इन्होंने रुपयों के लालच में आठ कीमती बंदरों को तस्करों के हाथों बेच दिया। इसलिए कोलकाता चिड़ियाघर प्रबंधन तुरंत दोषी कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों को हटाकर ईमानदार लोगों की नियुक्ति करे। ताकि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो। यह एक गंभीर अपराध है। इस पर सख्ती से केन्द्र सरकार को भी हस्तक्षेप करके पशु तस्करी पर रोक लगानी चाहिए।
अरुण गनेड़ीवाल, साकची, जमशेदपुर

शाहरुख का दम्भ
शाहरुख प्रकरण थोथे दम्भ का परिणाम है। यह दम्भ कि वे भविष्य में अमेरिका की जमीन पर पैर नहीं रखेंगे, ऐसा आत्म प्रचार है, जैसे ऊपर पैर करके सोने वाली चिड़िया समझती है कि उसने आकाश को थाम रखा है। आप मेंढक की तरह अपना कद कितना ही बढ़ा लें, पर भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब जैसे गणपति के आप नाखून के बराबर भी नहीं हैं। कलाम साहब से सीखिए ‘बूंद अघात सहे गिरी कैसे, खल के वचन संत सहे जैसे।’
ठाकुर सोहन सिंह भदौरिया, बीकानेर

सोनिया जी की अच्छी पहल
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक काबिले तारीफ कदम उठाया है। उन्होंने अपनी पार्टी के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों तथा पार्षदों से आग्रह किया है कि वे अपने वेतन का 20 प्रतिशत राष्ट्रीय कोष में दें। अच्छा होता यदि ऐसी ही व्यवस्था पदाधिकारियों के लिए भी की जती। और भी अच्छा होता यदि विपक्षी पार्टियां भी कुछ ऐसा ही कदम अपने यहां उठातीं। यह एक सराहनीय प्रयास होगा।
इन्द्र सिंह धिगान, दिल्ली

वो कौन से नियम हैं?
आपके अखबार में ‘दो टूक’ हमारी दुखती रग को छेड़ती है। कोई दवा या मल्हम का इंतजम भी आप करें तभी इलाज पूर्ण होगा। वे नियम कौन से हैं, जिनकी आड़ में ऑटो की कीमत पांच लाख तक पहुंच जाती है? हम लोग यदि थोड़ा सा सामान भी ऑटो में लाते हैं तो हमारे ऊपर और ऑटो वाले के ऊपर विभिन्न धाराएं लागू हो जती हैं, जिनकी आड़ में पुलिस वाले सवारी व ऑटो वाले को निचोड़ते हैं। 99 प्रतिशत ऑटो वाले गृहस्थ हैं। मेहनत करके रोटी खाते हैं, जबकि अधिकांश अधिकार व कर्मचारी बातों की खाते हैं। यह नाइंसाफी नहीं तो और क्या है?
महेश प्रकाश, नई दिल्ली

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