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संघ का संकट और इतिहास के सबक

इतिहास सत्य की खोज के साथ-साथ बदलता है। इतिहास में अजीब तरह का लचीलापन होता है, जो अमूमन वैचारिक पार्टियों और जिद्दी इंसानों में नहीं दिखता। ध्यान से देखें तो उसमें एक ध्रुव पर वल्लभभाई पटेल दिखते हैं तो दूसरे पर जवाहर लाल नेहरू। पटेल बीमार हैं और नेहरू उनको देखने गये हैं। पटेल नेहरू से कहते हैं कि तुम मुझ पर विश्वास नहीं करते। नेहरू पलट के कहते हैं कि मेरा तो खुद पर से ही भरोसा उठ गया है। नेहरू और पटेल दोनों अपने मतभेदों को इस हद तक नहीं ले गये कि टूट का संकट पैदा हो जाये।
 
भाजपा और संघ परिवार के मौजूदा विवाद के लिए इतिहास के इस टुकड़े को समझना बेहद आवश्यक है। इसने कई चीजें साफ कर दी हैं। एक, संघ परिवार एक लंबे संकट से गुजर रहा है। भाजपा उसका सबसे बड़ा चेहरा है, इसलिये भाजपा पर इस संकट की सबसे बड़ी छाप दिखाई दे रही है। दूसरे, संघ परिवार  का ये संकट पटेल-नेहरू की तरह वैचारिक ज्यादा है। भाजपा में दो तरह की धारायें एक दूसरे से टकरा रहीं हैं। एक वह जो मान रही है कि भाजपा लगातार दो चुनाव हारी क्योंकि वो अपने मूल वैचारिक चरित्र से भटकी। दूसरी वो है जो मानती है कि संघ परिवार को सर्वस्वीकार्य बनने के लिये जरूरी है कि वो अपने में बदलाव करे और उग्र हिंदुत्ववाद में लचीलापन लाये और अल्पसंख्यक तबके को अपना बनाने की कोशिश करे। तीसरा, ये संकट इस बात का भी प्रतीक है कि संघ में दो धाराओं के साथ-साथ दो पीढ़ियों का भी टकराव है।
नयी पीढ़ी अपने हिसाब से संघ को चलाना चाहती है, लेकिन पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को वो जगह नहीं दे रही है, जो उसे मिलनी चाहिये। साफ शब्दों में कहें तो संघ प्रमुख मोहन भागवत और लालकृष्ण आडवाणी के बीच सत्ता संघर्ष है। आडवाणी से उम्र में कम होने के बावजूद भागवत संघ और भाजपा को उग्र हिंदुत्ववाद की तरफ ले जाना चाहते हैं और पुरानी पीढ़ी के आडवाणी बदलते समाज और लोकतंत्र की जरूरत के मुताबिक विचारधारा के स्तर पर बदलाव की वकालत कर रहे हैं। चौथे, संघ परिवार सामाजिक और राजनीतिक संगठन का फर्क भी नहीं समझ पा रहा है, वो भाजपा को एक सामाजिक संगठन की तरह चलाना चाहता है, जो संभव नहीं है। सामाजिक संगठन में संगठनात्मक मजबूती तो होती है, लेकिन राजनीतिक संगठन की तरह सर्वशक्तिमान होने की संभावना नहीं होती है। आरएसएस एक सामाजिक संगठन है, उसके बिना भाजपा काफी कमजोर हो जायेगी, लेकिन बीजेपी अगर सत्ता में आ जाये तो उसका नेता देश का प्रधानमंत्री होगा और एक प्रधानमंत्री कितना भी कमजोर होगा, आरएसएस प्रमुख की ताकत उसका मुकाबला नहीं कर पायेगी। ये बात जब वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो सुदर्शन को समझ नहीं आयी और उनको लगता था कि वो नागपुर से भाजपा और वाजपेयी को हांक सकते हैं। शुरू में जसवंत सिंह को वित्तमंत्री न बनने देकर लगा वो कामयाब होंगे, लेकिन जब प्रधानमंत्री ने अपनी ताकत दिखायी तो संघ परिवार के पास वाजपेयी के सामने नतमस्तक होने के अलावा कोई चारा नहीं था। संघ परिवार ये मानता है कि नैतिक सत्ता के आगे राजनीतिक सत्ता को झुकना चाहिये, लेकिन वैदिक काल और कलियुग का अंतर न समझने की वजह से ही भागवत अब आडवाणी को अपने सामने झुकाना चाहते हैं, जो संभव नहीं। इस नासमझी की वजह से संघ परिवार ने जिद ठान ली है और वो पार्टी के अंदर हार के बाद होने वाले वैचारिक मंथन को भी बगावत की नजर से देख रहा है।

विचारधारा स्वभावत: तानाशाही होती है, चाहे वो साम्यवाद हो या फिर हिंदूवाद या फिर हिटलर का फासीवाद या अल कायदा का रैडिकल इस्लाम। संघ को ये समझना होगा कि देश बदला है और आम जनमानस में जबरदस्त परिवर्तन आया है, वो विचारों की स्वतंत्रता में अपने और अपने समाज की अस्मिता खोजती है और ऐसे में विचार पर पाबंदी लग जाये, वो कतई नहीं चाहेगी। इसके लिए सरदार पटेल से सबक लेना चाहिये, और शायद नेहरू से भी। सबको पता है कि नेहरू समाजवाद से प्रभावित थे तो पटेल दक्षिणपंथ से। रफी अहमद किदवई ने एक बार पटेल और उनकी दक्षिणपंथी नीतियों के चलते नेहरू को ये सुझाव भी दिया था कि उन्हें इन दकियानूसी लोगों का साथ छोड़ समाजवादी पार्टी बनानी चाहिये थी। दुर्गादास अपनी किताब ‘इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर’ में लिखते हैं कि रफी अहमद को पूरा भरोसा था कि अगर नेहरू नयी पार्टी बनायेंगे तो वो पहले आम चुनाव में आसानी से बहुमत ले आयेंगे। नेहरू ने तब जवाब दिया था कि अभी जरूरत आजादी को मजबूत करने की है और वो ये जानते थे कि वो और पटेल ये काम मिलकर कर सकते हैं, अकेले नहीं। ऐसा नहीं था कि दोनों में तकरार नहीं होती थी। कई बार दोनों नेताओं ने इस्तीफे तक देने की धमकी दे डाली थी। नेहरू की इच्छा के विरूद्ध पुरूषोत्तम दास टंडन जब कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये तो नेहरू ने पार्टी और सरकार दोनों से इस्तीफा देने का मन बना लिया था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, कुछ नेहरू के इतिहासबोध की वजह से और कुछ टंडन के बड़प्पन के कारण।

एक बार कैबिनेट की बैठक में नेहरू और पटेल के बीच कहासुनी हो गयी, नेहरू ने मेज पर मुक्का मारते हुए कहा पटेल तुम्हारे जो मन में आये करो। पटेल बहुत नाराज हो गये, उन्होंने दुर्गादास से कहा नेहरू पागल हो गये हैं और अब मैं उनको बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हूं। दुर्गादास के मुताबिक पटेल ने उनसे कहा कि वो गांधीजी के पास जा रहे हैं और उनसे कहेंगे कि वो इस्तीफा दे दें। दुर्गादास ने कहा कि गांधी जी उनको कभी भी छोड़ने नहीं देंगे, क्योंकि गांधी जी मानते हैं कि पटेल और नेहरू दो बैलों की जोड़ी है जो सरकार को खींच रहे हैं। तब झल्ला कर पटेल बोले बुड्ढा सठिया गया है। पटेल ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले एक जगह कहा भी है कि मैं नेहरू से बेहद स्नेह करता था, लेकिन नेहरू ने कभी भी मुझे इस लायक नहीं समझा। ये झगड़ा गांधी के समय भी था और उनके बाद भी बना रहा लेकिन अगर इस झगड़े में अहं का टकराव होता और अपने दरबारियों की बात मे आकर दोनों अपने रास्ते अलग कर लेते तो शायद भारत का इतिहास कुछ और होता। पर क्या आडवाणी और भागवत इससे कुछ सीख सकते हैं।

लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर हैं

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