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समाज: आस्था के लिए खान-पान पर रोक

कुछ महीने पहले इटली से यह खबर आई कि वहां कबाब रेस्तरां पर पाबंदी लगाने की बात चल रही है। बताया गया कि सरकार इस प्रस्ताव पर गम्भीरता से सोच रही है कि क्या ऐसे रेस्तरां पर पाबन्दी लगायी जाए जो गैरइतालवी खाना परोसते हैं। पाबन्दी की हिमायत करने वाले एक पार्षद ने यहां तक कहा कि ऐसी दुकानों के मालिक आमतौर पर विदेशी होते हैं, जो घंटों काम करते हैं, जिससे एक तरह से इतालवी लोगों को असमान प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है। वहां के एक शहर में तो कबाब बेचनेवाली चार दुकानों को इस आधार पर लाइसेंस नहीं दिया गया था कि उनका भोजन ‘इटली की परम्पराओं’ के अनुकूल नहीं है। पिछले दिनों कुछ ऐसा ही विवाद उत्तर प्रदेश में भी उठा। प्रदेश सरकार ने जैन समाज के नौ दिनी उत्सव के अवसर पर समूचे प्रदेश में मीट की बिक्री पर पाबन्दी लगा दी। यह सकारात्मक था कि अगले ही दिन उसने इस आदेश को वापस ले लिया गया। इसके पहले मध्यप्रदेश में कुछ नगरों को पवित्र घोषित करके वहां अण्डों तथा मछली, मीट जैसे मांसाहारी खाद्य पदाथरें की बिक्री पर रोक लगाने का आदेश जारी हुआ था।

मध्य प्रदेश में इसके पहले जब उमा भारती मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने अमरकंटक तथा अन्य ‘धार्मिक नगरों में’ मांस-मछली आदि ही नहीं बल्कि अंडों की बिक्री और सेवन पर पाबन्दी लगा दी थी। उसी वक्त यह प्रश्न उठा था कि किस तरह एक वर्ग की आस्थाओं और जीवन शैली को बाकी सभी समुदायों पर लादा जा रहा है। अम्बेडकर आन्दोलन से जुड़े संगठनों ने तब भाजपा सरकार के इस कदम को ‘ब्राह्माणवाद’ लादने का प्रयास कहा था। वैसे धर्म के हिसाब से ‘पवित्रता’ को परिभाषित करने का काम सिर्फ हिन्दुवादी पार्टियां ही नहीं करती हैं। जिन दिनों पंजाब में अतिवादी सिख नेता भिण्डरावाले की गतिविधियों ने जोर पकड़ा था, उन दिनों उनकी तरफ से इसी किस्म की ‘आचारसंहिता’ लागू करवाने की बात की जा रही थी। तब सिखों के लिए पवित्र नगरों में खाने-पीने की किस तरह की चीजें बिक सकती हैं या नहीं, इसके बारे में भी फरमान जारी हुए थे।

महज दो साल पहले ही कांग्रेस के नेतृत्ववाली आंध्र प्रदेश सरकार ने तिरुमाला, तिरुपति और राज्य के 19 अन्य चर्चित मन्दिरों वाले नगरों में अहिन्दू आस्थाओं के प्रचार-प्रसार पर पाबन्दी लगाने के लिए अध्यादेश और उसी से सम्बधित दो सरकारी आदेश (जीओ) जारी किये गए थे। तब इसे ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ की तर्ज पर ‘विशेष धार्मिक क्षेत्रों’ के निर्माण की योजना कहा गया था, जहां बाकी धर्मो के लोगों के लिए किसी भी तरह की गतिविधि - यहां तक कि पूजा, सामाजिक काम, शैक्षिक संस्थाओं के संचालन पर रोक हो। आंध्र प्रदेश या मध्य प्रदेश के ये मॉडल अगर और जगह भी लागू होते हैं तो अन्य धर्मों के लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर देंगे। एक बहुधर्मीय समाज में एक विशेष धर्म के माननेवालों के आचार-विचारों को ‘पवित्रता’ के आधार पर वरीयता प्रदान करना अपने इतिहास को भी नकारना भी है, जहां विभिन्न
आस्थाओं को माननेवालों के आपसी मेलमिलाप ने एक साझी संस्कृति का आविष्कार किया है। लेकिन यह अवधारणा आस्था के उस अधिकार को भी नकारती है जो संविधान के अनुच्छेद 30 ने हमें दिया है।

यह भी विडम्बना है कि ऐसे मामलों में न्यायपालिका की भूमिका भी अपनी तमाम सदिच्छाओं के बावजूद संतुलित नहीं रह पाती। अगर विधायिका जनता की इच्छाओं का सम्मान करने के नाम पर ऐसे कदमों को सही ठहराती है तो कार्यपालिका अपने राजनीतिक आकाओं को खुश रखने के लिए उन पर अमल कराने में अधिक तत्परता दिखाती है तो न्यायपालिका भी उसी हवा में बहती दिखती है। मसलन पिछले साल हिंसा विरोधक संघ बनाम मिर्जापुर मोटी कुरेश जमात वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक फैसला। मामले की शुरुआत गुजरात सरकार के उस आदेश से हुई थी, जिसके अन्तर्गत जैन उत्सव के दौरान नौ दिनों तक मीट बेचने पर पाबन्दी लगाई गयी थी। अदालत ने स्वीकार किया कि संविधान की धारा 21 के अन्तर्गत कौन क्या खाए या न खाए यह हर व्यक्ति की व्यक्तिगत आजादी का मसला है। इसके बावजूद, उसने लोगों की भावनाओं के आधार पर इस पाबन्दी को उचित ठहराया। इसके पहले एक और मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ऋषिकेश में मीट, मछली या अंडे बेचने पर पाबन्दी को उचित ठहराया था। कहा जाता है कि 21वीं सदी अधिक समावेशी सदी रहेगी। दूसरी तरफ हम देख रहे हैं कि लोगों के खान-पान के आधार पर, उनकी आस्था के नाम पर उन्हें न सिर्फ नए-नए गड्ढों में ढकेला जा रहा है, बल्कि उनकी दरारों को बढ़ाया भी जा रहा है।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं
subhash.gatade@gmail.com

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